विनोद खन्ना से पहले इन फिल्म शख्सियतों को मिल जाना चाहिये था दादा साहेब फाल्के सम्मान... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 14 अप्रैल 2018

विनोद खन्ना से पहले इन फिल्म शख्सियतों को मिल जाना चाहिये था दादा साहेब फाल्के सम्मान...

अपने ज़माने के हैंडसम हंक अभिनेता विनोद खन्ना  (1946-2017)  


साल 2000 में गायिका आशा भोंसले के बाद हिंदी फिल्म की किसी महिला शख्सियत को नहीं मिला दादा साहेब फाल्के सम्मान
 सिनेमा की बात
*अजय ब्रह्मात्मज/संजीव श्रीवास्तव

संजीव श्रीवास्तव – अजय जी, 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है। खासतौर पर इस बार के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार को लेकर क्या कहना चाहेंगे? विनोद खन्ना को निधन के पश्चात् यह सम्मान दिया जाना कितना वाजिब है?

अजय ब्रह्मात्मज – देखिये, दादा साहेब पुरस्कार को लेकर कोई तय मापदंड नहीं है कि किसको, कब दिया जाये। यह पुरस्कार किसी कलाकार को उनके पूरे जीवन के योगदान को ध्यान में रखकर दिया जाता है। इस हिसाब से देखा जाये तो विनोद खन्ना जी को यह सम्मान मिलना चाहिये। लेकिन हां, यह सही है कि अभी विनोद खन्ना से भी कई सीनियर कलाकार जीवित हैं। और उनका योगदान विनोद खन्ना से कम नहीं है। जैसेकि वहीदा रहमान, वैजयंती माला के अलावा दक्षिण भारतीय सिनेमा में कई कलाकार हैं। मैं तो इस संबंघ में महेश भट्ट जी का भी नाम लेना चाहूंगा। महेश भट्ट को यह सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिये? विनोद खन्ना से कहीं ज्यादा योगदान महेश भट्ट का है। लेकिन अगर एक्टिंग श्रेणी में ही देखें तो वहीदा रहमान और वैजयंती माला के अलावा धर्मेंद्र भी हैं जिनको यह सम्मान पहले मिलना चाहिये था।
बैजयंती माला - क्या राजनीतिक वजहों से नहीं मिला अब तक दादा साहेब सम्मान ? 
संजीव श्रीवास्तव – धर्मेंद्र जिस वक्त स्टार थे, उस वक्त विनोद खन्ना विलेन बनकर फिल्मों में प्रवेश पा रहे थे - जैसे मेरा गांव मेरा देश...।

अजय ब्रह्मात्मज – जी बिल्कुल। इससे साफ जाहिर होता है कि विनोद खन्ना को केवल इसलिये यह सम्मान दिया दया है क्योंकि उनका संबंध बीजेपी से था। जरा सोचिये कि उनका देहांत हो चुका है, अब उनको यह सम्मान देने से क्या होगा? मैं इस संबंध में यह अपील करना चाहता हूं कि अगर किसी को मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाता है तो साथ में एक जीवित कलाकार को भी सम्मान देना चाहिये। हिंदी के अलावा दूसरी भारतीय भाषाओं में इतनी अच्छी फिल्में बन रही हैं - इतने अच्छे कलाकार हैं - उन सबको देखते हुए  एक साथ दो कलाकारों को दादा साहेब फाल्के सम्मान देने में क्या हर्ज है?

वहीदा रहमान- दादा साहेब फाल्के सम्मान की प्रबल दावेदार
संजीव श्रीवास्तव – गुज़रे जमाने की बात करें तो मोतीलाल को यह सम्मान नहीं मिला। सुनील दत्त और यहां तक राजेश खन्ना को भी यह सम्मान नहीं मिला। पूरी सूची पर ध्यान दें तो साल 2000 में आशा भोंसले के पश्चात् हिंदी फिल्मोद्योग की किसी महिला कलाकार को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार नहीं मिला।  

अजय ब्रह्मात्मज – बहुत चौंकाने वाले ये तथ्य हैं। इस लिहाज से भी देखें तो वहीदा रहमान, वैजयंती माला या हेलन जी का नाम अब तक आ जाना चाहिये था।

संजीव श्रीवास्तव – दूसरी श्रेणी के पुरस्कारों पर बात करें तो श्रीदेवी को मॉम फिल्म में अभिनय के लिए बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड के लिए चुना गया है।

अजय ब्रह्मात्मज – ये तो गलत पुरस्कार हुआ है। मेरी राय में एक तो मॉम बहुत अच्छी फिल्म नहीं थी दूसरे कि श्रीदेवी इससे पहले काफी अच्छे काम कर चुकी हैं। मेरे हिसाब से श्रीदेवी का नाम बेहतरीन कार्य के लिए नहीं बल्कि सहानुभूतिस्वरूप चुना गया है। शेखर कपूर जी का भी यह वक्तव्य आया है कि उन्होंने इस नाम पर विचार नहीं करने के लिए कहा था।

हेलेन - इनकी याद कब आयेगी?
संजीव श्रीवास्तव – क्या इसका लब्बोलुआब यह माना जाये कि खासतौर पर शीर्ष राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए नाम के चयन को लेकर कहीं ना कहीं सत्ता का हस्तक्षेप रहता होगा? अभी के हों या पहले के?

अजय ब्रह्मात्मज – निश्चित तौर पर रहता होगा। इसके अलावा कई बार ज्यूरी अध्यक्ष की पसंद, नापसंद भी इसके पीछे की बड़ी वजह होती है। हालांकि इस बार के पुरस्कार में कुछ अच्छा काम भी हुआ है। मेनस्ट्रीम से हटकर इलाकाई फिल्मों को पुरस्कार देना प्रशंसनीय है। इस बार कमजोर हिंदी फिल्म को पुरस्कार नहीं दिया गया है-ये अच्छी बात हुई है। इसी संदर्भ में एक बात और जोड़ना चाहता हूं कि राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त फिल्मों का प्रदर्शन पूरे भारत में किया जाना चाहिये। हालांकि केंद्रीय फिल्म निदेशालय द्वारा कुछ शहरों में यह काम किया भी जाता है। लेकिन मेरी गुजारिश है कि राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत फिल्मों का देश भर में अनिवार्यत: दस दिन का फेस्टिवल आयोजित कराये-ताकि हिंदी वाले तमिल फिल्मों को देख सकें - और बांग्लावाले मराठी और उड़िया फिल्म देख सकें। सरकार अध्यादेश बनाकर देश भर के मल्टीप्लेक्स को यह आदेश दे कि वहां कम से कम एक हफ्ते का राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त फिल्मों का फेस्टिवल आयोजित हो। ताकि लोग उन फिल्मों के संदर्भ और संदेश को ग्रहण कर सके।

नायक -धर्मेंद्र, खलनायक -विनोद खन्मा; फिल्म -मेरा गांव मेरा देश

*(अजय ब्रह्मात्मज चर्चित फिल्म समीक्षक हैं। सिनेमा संबंधी कई पुस्तकों के लेखक हैं। विश्वविद्यालयों में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं।
मुंबई में निवास। संपर्क-9820240504;
संजीव श्रीवास्तव पिक्चर प्लस के संपादक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क – pictureplus2016@gmail.com)

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