EXCLUSIVE : कानपुर की गलियों में 50 रुपये में स्टेज शो करने वाले राजू श्रीवास्तव के स्ट्रगल की अनसुनी कहानी - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

EXCLUSIVE : कानपुर की गलियों में 50 रुपये में स्टेज शो करने वाले राजू श्रीवास्तव के स्ट्रगल की अनसुनी कहानी



स्टैंड-अप कॉमेडी को पतली गलियों के मंच से निकालकर टीवी स्क्रीन पर पहुंचाने वालों में सबसे पॉपुलर नाम है राजू श्रीवास्तव। उनसे बात की फिल्म पत्रकार संजय सिन्हा ने
 
राजू श्रीवास्तव की विभिन्न मुद्राएं
आज की भागदौड़ भरी  ज़िन्दगी में लोग हंसने का वक्त कम निकाल पा रहे हैं। दिन भर की थकान के बीच अगर चंद  पलों के लिए भी हंसी आ जाए तो दिल को बहुत सुकून मिलता है। देश के लोकप्रिय स्टैंड-उप कॉमेडियन कलाकार राजू श्रीवास्तव वैसे तो कानपुर के रहने वाले हैं लेकिन अब उनका बसेरा मुंबई है। राजू श्रीवास्तव से मुंबई  में अंधेरी (वेस्ट) स्थित उनके कार्यालय में लम्बी बातचीत के मुख्य अंश-

संजय - आज की तारीख में लोग हंसना भूल-से गए हैं,ऐसे में आप लोगों को खुलकर हंसा रहे हैं, यह बहुत बड़ी बात है। इस नेक काम के लिए आपको बधाई। कैसा महसूस करते हैं आप?
राजू श्रीवास्तव - मुझे बहुत सुकून मिलता है लोगों के चेहरों पर मुस्कराहट और हंसी देखकर। सबकी ज़िन्दगी में इतनी टेंशन है कि मुस्कुराना तक दूभर हो गया है। ऐसे में पल-दो पल के लिए ही सही, उन्हें हंसी का तोहफा देकर मुझे सुख मिलता है।

संजय - ज़िन्दगी में लोग बहुत कुछ करना चाहते है। आपने स्टैंड-अप कॉमेडियन बनकर ही लोगों को हंसाने का क्यों सोंचा?
राजू श्रीवास्तव - स्कूल के ज़माने से ही मुझे नक़ल करने की आदत-सी थी। मैं किसी की नक़ल तुरंत उतार लेता था। अपने शिक्षकों की नक़ल उतारने में माहिर था। उनका चलना, बोलना, उठना, बैठना, हंसना, डांटना...सभी की नक़ल करता था मैं। इस चक्कर में मुझे डांट भी  मिलती थी। लोग कहते थे कि शिक्षकों का मज़ाक उड़ाना अपमान है,लेकिन मेरे स्कूल के प्रिंसिपल ने मेरी इस कला को समझा और मुझे प्रोत्साहित भी किया। उस ज़माने में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन से मैं बहुत प्रभावित था। उनकी फ़िल्में देख-देखकर मैंने अभिनय करना शुरू किया और लोगों की नक़ल करने लगा। मैं अमिताभ बच्चन की हूबहू नक़ल करने लगा। उनकी तरह चलना, मुस्कुराना, कमर पर हाथ रखकर डांस करना आदि।  मेरी इस कला से लोग ठठाकर हंसने लगे। इससे मेरा हौसला बढ़ता गया। मैंने सोच लिया कि एक सफल स्टैंड-अप कॉमेडियन बनकर लोगों को हंसाऊंगा। उधर मेरे घर वाले नाराज़ रहने लगे। दोस्तों और पड़ोसियों की पार्टियों में मेरा बुलावा आने लगा। मैं लोगों को हंसाने लगा। इस चक्कर में घर आते-आते रात को देर भी हो जाती थी, लिहाज़ा घर वाले परेशान रहने लगे। वे दुखी और हैरान थे कि कायस्थ का बच्चा पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर ये क्या करने लगा। भला हंसी-ठट्ठा करना भी कोई काम होता है!

संजय - इसके बाद आपने क्या किया?
राजू श्रीवास्तव- मैंने इस काम को नहीं छोड़ा। लगातार इस काम में लगा रहा। घरवालों के विरोध के बावजूद मैं 1982 में मुंबई चला आया। मुंबई में संघर्ष का दौर शुरू हो गया। मेरी मुलाक़ात संगीतकार रवींद्र जैन से हुई, तबस्सुम  से हुई। दोनों ने मुझे प्रोत्साहित किया। इनके कार्यक्रमों में मैं हास्य कलाकार की हैसियत से जाने लगा। एक कार्यक्रम में मेरी मुलाक़ात गुलशन कुमार जी से हुई। दरअसल वह गायिका अनुराधा पौडवाल से मिलने आये थे। उन्होंने मुझे भी सुना और  अपना कार्ड देकर मिलने को कहा। मैं उनसे मिला, तो उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया। उनकी म्यूजिक कंपनी टी सीरिज़ से मेरा पहला ऑडियो कैसेट रिलीज़ हुआ-'हंसना मना है'। इस ऑडियो कैसेट ने मुझे एक नई पहचान दी और मैं देश भर में लोकप्रिय हो गया। इसके बाद दूसरी कम्पनीज से भी कई कैसेट्स रिलीज़ हुए। फिर मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक दिन मेरा कैसेट गायिका आशा  भोंसले का ड्राइवर सुन रहा था, तो आशा जी ने पूछा-ये क्या सुन रहे हो?,उसने कहा-कॉमेडी सुन रहा हूं। इसके बाद आशा जी ने भी सुना,तो उनको भी हंसी आ गई। वह मुझसे मिलीं और मैं उनके साथ भी शोज करने लगा। आशा जी ने मेरे बारे में गायक किशोर कुमार को बताया, लिहाज़ा किशोर दा से मिलने का सौभाग्य मिला। उनके साथ मैंने लंदन में एक शो किया। बहुत मज़ा आया। मुझे अपने काम में सफलता मिल रही थी मगर मेरे घरवालों को और शहर के लोगों को क्या पता कि मैं क्या करता हूं,क्योंकि उस वक़्त मीडिया इतना तेज़ नहीं था और ना ही सोशल मीडिया  का दौर था। उन्हें यकीन तब होता जब मैं टीवी पर आता या फिल्मों में दिखता। बाद में जब मुझे जब यहां के लोगों ने टीवी पर देखा,फिल्मों  में देखा तब मेरी पहचान बनी और घरवालों ने भी मुझे दिल से कुबूल कर लिया।

राजू श्रीवास्तव के साथ संजय सिन्हा

संजय - लम्बे संघर्ष के बाद सफलता के इस मुकाम पर पहुंचकर कैसा अनुभव होता है?
राजू श्रीवास्तव - संघर्ष तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन उन्हें मुकाम नहीं मिल पाता है। मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे मेरी मंज़िल मिली। मुझे लगता है मेहनत और लगन के साथ लक भी ज़रूरी है। कानपुर में मैं पचास रुपए में स्टेज शोज करता था, फिर एक सौ रुपए मिलने लगे और आज ये मुकाम मिला। इसमें ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा है। मैंने सोचा भी नहीं था कि इस मुक़ाम पर पहुंचूंगा।

संजय - आप अपने मसालेदार आइटमों से पूरी दुनिया को हंसाते हैं। आपकी नज़र में हंसी की परिभाषा क्या है?
राजू श्रीवास्तव - हंसी के बिना ज़िन्दगी अधूरी है। अगर ट्रेजडी है तभी हंसी है। एक व्यक्ति केले के छिलके से फिसलकर धड़ाम से गिर जाता है,लेकिन इस दृश्य को देखने वाले लोग अपनी हंसी नहीं रोक पाते।

संजय-हंसी के लिए आप इतने सारे मटेरियल्स कहां से लाते हैं?
राजू श्रीवास्तव - (हंसते हुए) राजनेताओं से जनता को भले ही कुछ नहीं मिलता हो मगर मुझे हमेशा उनसे मसाले मिलते रहे हैं। चाहे लालू जी हों, मुलायम जी हों या मोदी जी। मैं बहुत लकी हूं कि इन नेताओं की नक़ल मैं उनके सामने ही करता हूं और वे भी इसका आनंद लेते हैं।

संजय - खाली वक़्त में क्या करते हैं आप?
राजू श्रीवास्तव - अपने दोस्तों से मिलता हूं। जी भरके उनसे बातें करता हूं और पुराने गाने सुनता हूं। मुझे किशोर कुमार के गाने बहुत पसंद हैं। मैं उन्हें ही सबसे बड़ा कॉमेडियन मानता हूं। कॉमेडियन और सिंगर,दोनों करैक्टर में वह फ़ीट थे, इसलिए मैं उनका फैन हूं।

संजय-आपने पॉलिटिक्स ज्वाइन किया था, चुनाव भी लड़ा, फिर राजनीति से अलग क्यों हो गए?
राजू श्रीवास्तव - शोज के दौरान राजनेता मुझे सुनते थे तो उन्हें लगता था कि राजू को पॉलिटिक्स में आना चाहिए, क्योंकि उसका अच्छा-खासा क्रेज है, लोग उसे जानते हैं। मुझे भी ऑफर किया गया। मैंने कानपुर से चुनाव भी लड़ा,मगर पॉलिटिक्स मुझे रास नहीं आया। मूलतः मैं एक कलाकार हूं,कलाकार ही रहना चाहता हूं।

संजय-अपने शुभचिंतकों और प्रशंसकों को क्या संदेश देना चाहेंगे?
राजू श्रीवास्तव - हंसते रहें और हंसाते रहें। हंसी से बड़ा कोई टॉनिक नहीं।

(साक्षात्कारकर्ता वरिष्ठ पत्रकार व फिल्म अभिनेता भी हैं।
संपर्क-9800184662/9832757050 
www.sanjaysinha.co.in
)

1 टिप्पणी:

  1. राजु श्रीवास्तव मेरे प्रिय हास्य कलाकार हैं..!! कभी मौका मिला तो उनको अपनी फ़िल्म में ज़रुर लूंगा.... !

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