आई एम 102 Not Out : बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 5 मई 2018

आई एम 102 Not Out : बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप !


फिल्म समीक्षा
टाइटल - 102 नॉट आउट
निर्देशक - उमेश शुक्ला
कलाकार - अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, जिमित त्रिवेदी
रेटिंग – 3.5 स्टार


*रवींद्र त्रिपाठी
निर्देशक उमेश शुक्ला की नई फिल्म `102 नॉट आउट का मूल मंत्र है-`जब तक जियो मजे से रहे। यानी उम्र कितनी भी हो जाए - न हंसना छोड़ना है और न उत्साह में कमी आने देना है। काहे को चिंता करते हो कि ब्लड प्रैशर कितना है या डायबिटीज बढ़ गया है या घट गया। उनकी ज्यादा चिंता करोगे तो ज़िंदगी बेमज़ा हो जाएगी। और हां, बुढ़ापे में बेटे-बेटी देखभाल नहीं करते तो क्या हुआ, अपना जीवन तो शान से जीते रहे।
फिल्म की कहानी
फिल्म में अमिताभ बच्चन ने 102 साल के दत्तात्रेय बखारिया नाम के ऐसे किरदार की भूमिका निभाई है जो 102 साल का हो चुका है लेकिन ऊर्जा से भरपूर है। वह सोलह साल और जीना चाहता है। उसका बेटा बाबू लाल बखारिया भी 75 साल का हो चुका है मगर हमेशा इस बात से डरा रहता है कि कहीं बीमार न हो जाए! वह नहाता भी है तो घड़ी देखकर कि कितनी देर तक श़ॉवर के नीचे खड़ा रहना है। वह रोज सुबह डॉक्टर के पास नियत समय पर जाता है ताकि ब्लड प्रैशर के बढ़ने-घटने की जांच करा सके। बाबू लाल का एक बेटा है जो अमेरिका में रहता है और गाहे बगाहे फोन कर लेता है। एक दिन दत्तात्रेय बखारिया अपने बेटे को कहता है वह  एक वृद्धाश्रम में चला जाए। दत्तात्रेय का कहना है कि बाबूलाल के घर में रहने से उसके यानी दत्तात्रेय बखारिया के एक सौ अठारह साल जीने की योजना पर पानी फिर सकता है। बाबूलाल इसके लिए तैयार नहीं होता तो दत्तात्रेय उसके सामने अजी अजीब शर्ते रखता है। फिल्म उसके बाद जिस दिशा में मुड़ती है वह है कैसे बुढ़ापे में माता-पिता को भारत में छोड़कर भारतीय युवक अमेरिका या विदेश चले जाते हैं और फिर वहीं के हो के रह जाते हैं। ऐसे बच्चों के साथ माता पिता क्या सलूक करेँ?
अभिनय और निर्देशन
 फिल्म हंसी से भरपूर है। अमिताभ बच्चन की हर अदा, हर संवाद और हर भंगिमा  ठहाके लगाने की तरफ ले जाती है। इधर की कई फिल्मों में अमिताभ अभिनय की नई बुलंदी की तरफ जाते दिख रहे हैं और ये फिल्म भी उसी कड़ी में है। हालांकि ऋषि कपूर ने भी बहुत अच्छा काम किया है। उस टिपिकल उम्रदराज आदमी की तरह जो अपनी सेहत को लेकर हमेशा चिंतित रहता है। लेकिन एक तो अमिताभ के भीतर ही `सेंस ऑफ ह्यूमर इतना  अधिक है कि दर्शक उनसे सहज ही जुड़ जाते हैं और दूसरे फिल्म की कहानी ही कुछ ऐसी है कि दर्शक लगातार इसी बात पर मगन रहता है कि 102 साल के आदमी के भीतर इतनी जिंदादिली! जिमित त्रिवेदी का किरदार छोटा है लेकिन उसे उन्होंने बहुत अच्छे तरीके से निभाया है।


निर्देशक उमेश शुक्ला की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने संतानों द्वारा अपने माता-पिता की उपेक्षा को लेकर इतनी सरस और मजेदार फिल्म बनाई है। फिल्म का मूल विचार अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्म `बागवान से मिलता जुलता है हालांकि उमेश शुक्ला ने उसी बात को अलग ढंग से कहा है। फिल्म बनने से पहले एक सफल ये एक सफल गुजराती नाटक भी रहा है। हास्य के अलावा फिल्म जज़्बाती पहलुओं से भी भरपूर है कुछ पुराने फिल्मी गानों के सहारे इस बात को भी सामने लाती है कि जीवन के लंबा रास्ते पर कई ऐसे लम्हें आते हैं जब आपको अपनों की खास जरूरत रहती है और जब ये अपने (बेटा-बेटी, पति, पत्नी) दूर हो जाते हैं तो एक खालीपन आ जाता है जिसकी भरपाई संभव नहीं होती। फिल्म परिवार की धारणा को पुष्ट करनेवाली है।
अहम सवाल
एक सवाल दर्शकों के मन में खड़ा हो सकता है। वो ये कि क्या विदेश चले गए बेटे सच में ऐसे हो गए हैं जिनको देश में रह गए अपने माता-पिता की परवाह नहीं रहती? या इसका कोई दूसरा पहलू भी है? पर ये अलग सवाल है और इसके बावजूद इस फिल्म का दर्शकों से जुड़ाव रहेगा। भारतीय समाज में वृद्ध लोगों के पुत्रों से उपेक्षा की खबरें लगातार आ रही है। फिल्म उसी की तरफ ले जाती है।

*लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ व फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क-9873196343

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