'खजूर पर अटके' और 'डेडपुल 2' फिल्म देखें या न देखें - जानें समीक्षा पढ़कर... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 19 मई 2018

'खजूर पर अटके' और 'डेडपुल 2' फिल्म देखें या न देखें - जानें समीक्षा पढ़कर...


फिल्म समीक्षा
टाइटल - खजूर पे अटके
निर्देशक - हर्ष छाया
कलाकार-मनोज पाहवा, सीमा पाहवा, विनय पाठक,डॉली आहलूवालिया, सना कपूर, अलका अमीन, नागेश भोंसले


*रवींद्र त्रिपाठी
हर्ष छाया फिल्मों और टेलीविजन के परिचित अभिनेता है। अब उन्होंने इस  फिल्म के साथ निर्देशन में भी कदम रख दिया है। ऐसा लगता है कि उनके भीतर कुछ कुछ सुभाष घई वाले तत्व भी प्रवेश कर गए हैं। मतलब ये कि जिस तरह सुभाष घई अपनी कई फिल्मों में खुद भी एक छोटे से किरदार के रूप में आते रहे हैं उसी तरह हर्ष छाया को भी आप इसमें ज़ॉगिंग करते और फोटो खिंचाते देखेंगे।
फिल्म की कहानी
बहरहाल, हर्ष छाया ने `खजूर पे अटके नाम से जो फिल्म बनाई है वह एक पारिवारिक कॉमेडी है। जैसा कि रोज के अनुभवों में दिखता है कि परिवार में जितना प्रेम होता है उतना ही द्वेष भी। खासकर संपत्ति के मामले में भाइयों में ठन जाती है और भाभियां इस ठनाठनी में घी डालने का काम करती रहती है। यहां भी वही हाल है। बड़े भाई जतिंदर शर्मा (मनोज पाहवा) को खबर मिलती है कि उसका भाई देवेंदर शर्मा मुंबई में बीमार पड़ा है और अब मरा-तब मरा की हालत में है। वह अपनी पत्नी (सीमा पाहवा) और बच्चों के साथ वहां जाता है लेकिन पत्नी के मन में है कि बीमार देवर मुंबई वाले फ्लैट में हिस्सा दिए बिना मर गया तो क्या होगा। मुंबई का फ्लैट तो पारिवारिक संपत्ति है। जतिंदर की पत्नी कहीं से ये खबर मिल गई है उसके देवर ने एक और फ्लैट खरीद लिया है और किसी को बताया नहीं है। एर और भाई रविंदर शर्मा (विनय पाठक) भी इसी उधेड़बुन में है कि अपने बीमार और अस्पताल में पड़े भाई को दखने मुंबई जाए या एक ठेके लेने की जुगत भिड़ाए। और मुंबई जाए तो किस दिन ताकि प्लेन में टिकट के लिए कम पैसे देने पड़े। एक बहन (डॉली आहलूवालिया) भी है जो अपने पति से झगड़कर अपने बीमार भाई को देखने पहुंचती है और एक बाबा की मदद से भाई को ठीक कराने के लिए टोटके करती है।
उधर भाइयों और बहन के बच्चे मुंबई में किसी और इंतजाम मैं। जतिंदर की बेटी (सना कपूर) हीरोइन बनने की जुगाड़ में है और एक फेसफुक- फ्रेंड से फिल्म पानी जुगत में लग गई है। भांजे लड़कियां ताड़ने में लग गए हैं और अवैध डांस बारों में बारगर्ल देखने जाते हैं। अस्पताल मे बिल बढ़ता जा रहा और बिल का भुगतान करने मे हिस्सा बटाया जाए या नहीं, इस पर दांवपेच हो रहे हैं। यानी फिल्म में पारिवारिक चालबाजियां भी हैं पीढ़ियों की लड़ाइयां भी। वक्त बीतने के सात परिवार में प्रेम कम होता है जाता है और हिसाब-किताब पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यही सब हल्के फुल्के अंदाज में दिखाया गया है। अस्पताल  में ही शादी के लिए लड़की देखने दिखाने वाले दृश्य हंसने का भरपूर मौका देते हैं।
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फिल्म समीक्षा
टाइटल - डेडपुल 2
निर्देशक - डेविड लीच
कलाकार - रियान रिनोल्ड्स, जूलियन डेनिसन, जोश ब्रोलिन, मोरेना बकारिन
*रवींद्र त्रिपाठी
दर्शक पहले तो भ्रमित हो जाएगा और सोचेगा कि कहीं हॉलीवुड के सुपरहीरो डेडपुल की आवाज को क्या हो गया है?  उसे ये भी अचरज होगा कि डेडपुल बॉलीवुड के हीरो रनबीर सिंह की आवाज में क्यों बोल रहा है? लेकिन जल्द ही उसे ये एहसास हो जाएगा कि ऐसा जानबूझकर किया गया है और आवाज भले रनबीर सिंह की हो शरीर डेडपुल का ही है। `डेडपुल 2 अमेरिकी सुपरहीरो श्रृंखला की दूसरी फिल्म है लेकिन एक्शन सीन भले हॉलीवुड वाले हैं संवादों का भारतीयकरण और हिंदीकरण कर दिया गया है। एक तरह से संवादों का रूपांतर कर दिया गया है और देखनेवाले को ये लगेगा कि हॉलीवुड और बॉलीवुड एक दूसरे के गले में वरमाला डाल रहे हैं यानी उनका मिलन हो रहा है। पर ये एक मार्केटिंग स्ट्रेटजी भी है जिसके भारतीय दर्शकों को लुभाया जा सके।
पर क्या फिल्म हिंदी (और अंग्रेजी में भी) में पूरी तरह कामयाब होगी क्योंकि सेंसर के कारण मूल फिल्म में बड़े पैमान पर कटाई छंटाई हुई है। फिर भी ये दर्शकों को हंसाने में कुछ हद तक कामयाब तो रहेगी क्योंकि इसमें कुछ ऐसे दृश्य हैं जो हर देश और भाषा के लोगों को हंसाने की ताकत रखते हैं। जैसे एक जगह ये दिखाया है गया है कि सुपरहीरो वेड विल्सन उर्फ डेडपुल के नीचे का हिस्सा एक हादसे कट गया है और वो फिर से उग रहा है। उसका नीचे वाला हिस्सा यानी पैर तो बच्चे जैसे हैं लेकिन ऊपर का धड़ एक वयस्क आदमी का।
कॉमेडी और एक्शन
`डेडपुल 2 में हंसी है  के साथ साथ जबर्दस्त एक्शन भी है। पर साथ ही इसमें नैतिक आवाज भी है। इसमें सुपरहीरो एक ऐसे  बच्चे को बचाने की कोशिश करता और उसमें कामयाब भी रहता है कि जो म्यूटांट है दूसरो को जलाकर खाक कर देने की क्षमता रखता है। फिल्म के जो संवाद हिंदी में है और बेहद चुटीले हैं। खासकर वनलाइनर यानी एक लाइन वाले।  सीजीआई  (कंप्यूटर जेनरेटेड इमाजरी) तकनीक और वीएफएक्स (कंप्यूटर से विजुअल इफेक्ट बनाने) तकनीक का फिल्म में बहुत अच्छा इस्तेमाल है जिसके कारण इसका क़ॉमिक प्रभाव काफी असरदार हो गया है।
*लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ एवं फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास संपर्क-9873196343

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