हिन्दी सिनेमा के 'चंद्रशेखर' ; अनोखा किरदार, अदभुत कहानी... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 20 मई 2018

हिन्दी सिनेमा के 'चंद्रशेखर' ; अनोखा किरदार, अदभुत कहानी...


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-31
अभिनेता चंद्रशेखर
बंबई में नया नया था। सांताक्रुज़ पश्चिम मेँ बाज़ार के पिछवाड़े सुरंग रेस्तरां के पीछे कई छोटे छोटे घरोँ के बीच एक बहुत बड़े बंगले की पहली मंज़िल मिल गई थी कुछ महीनोँ के लिए। दस पंदरह दिन बाद चार साल के सुमीत के साथ कुसुम भी आ गई थीँ। इस बीच निमंत्रण पर मेरे सहकर्मी महेंद्र सरल मुझे ले गए अंधेरी पश्चिम में मेरे लिए तब तक अनजान अभिनेता चंद्रशेखर के घर। भवदीप नाम का उनका बंगला मुझे प्रभावशाली लगा। वह हमेँ ले गए अपनी छत पर। सुहानी शाम थी। खुला वातावरण। जहां तक मुझे याद है ज़मीन पर फ़र्श बिछा था। कुछ था जो उन्हेँ और मुझे भा गया। सादगीखुलापनसौहार्द्र। ख़ुलूस।
कुछ दिन बाद मुझे अपना बंगला जल्दी ख़ाली करने का आदेश मिला। दलाल मुझेकुसुम और बच्चे सुमीत ले चला कई मकान दिखाने। चंद्रशेखर के घर के सामने घुसते ही गली के मोड़ पर छोटा सा सुंदर सा बंगला था। सामने घासघास पर गुजराती झूला और बादाम का पेड़। मकान मेँ दाएँ छोटी सी बैठकपीछे बैडरूमबाएँ लंबोतरे ड्राइंग रूम के पीछे रसोई। दाएँ बाएँ खुली जगह। कुसुम और मैँ मुग्ध। चंद्रशेखर के घर गए मालूमात करने। चंद्रशेखर और भाभी जी ने हमारे छोटे से परिवार को अपना बना लिया। उनकी बेटी रेणु और बेटोँ अशोक और अनिल को बच्चा सुमीत मिल गया। मैँने दलाल से किराया हाथ के हाथ तय कर लिया।
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चंद्रशेखर खाने खिलाने और पीने पिलाने के लिए मशूहर थे। भाभी जी के हाथ का वैज और नौनवैज खाना आधे ने नहीँ तो चौथाई बौलीवुड ने ज़रूर खाया होगा। वह सिर्फ़ पीते ही नहीँ थेख़ाली  बोतलेण सजाते भी थे ट्रौफ़ियोँ की तरह - ड्राइंग रूम की छत के कुछ नीचे चारोँ दीवारोँ पर बनी कारनिस पर। पता नहीँ कैसे और क्योँ - वह और मैँ एकदूसरे को मालिक कहने लगे।
सन 1965 की दीवाली बंबई मेँ मेरी पहली थी। खाने पीने के बाद गिनती के कुछ लोगों की ताश की महफ़िल जमी। दिल्ली मेँ दोस्तोँ के घर फ़्लैश का खेल मैँ ने देखा था। एक दो बार खेला भी था। किस के बाद पत्तोँ का कौन सा जोड़ बड़ा होता हैकई बार पूछना पड़ता था। पता चला था कि किसी खिलाड़ी के पास किसी एक अंक के तीन पत्ते होना बड़ी बात थी। तीन एक्के होना सब से बड़ा भाग्य था। बाज़ी’ जैसी फ़िल्मों मेँ कई ऐसे हाथ वालों का हारना भी देखा था। तो उस दीवाली मालिक ने मुझे भी शामिल कर लिया। देर तक छोटी बड़ी हार जीत होती रही। अब आख़री बाज़ी आ गई। उत्तेजना मेँ सब ने हाँ कर दी कि हर अगला खिलाड़ी पिछले की चाल से बोली दोगुनी कर देगा। सब ब्लाइंड चल रहे थे। मुझ से पहले गोले में बैठे थे नवोदित अभिनेता मैक मोहन के पिता माखीजानी। उन्होँ ने बोली लगाई – एक सौ अट्ठाइस। बड़े बेमन से मैँ ने एक एक कर के पत्ते देखे – ‘तीन बादशाह!’ दम में दम आया। अब मैँ बोलूँ तो ‘दो सौ अड़तालीस!’ इतने पैसे मेरे पास थे ही नहीँ। मुझे बार बार ‘बाज़ी’ फ़िल्म के सीन याद आने लगे। कहीँ किसी के पास निकले तीन इक्के!’ तो मैँ तो गयादो सौ अड़तालीस’ की बोली लगाते मेरी जान निकलने लगी। मैँ ने शो कर के खेल बंद करना ही ठीक समझा। सब मुझ पर हँस रहे थे। कुछ हमदर्दी भी दिखा रहे थे। कुल मिला कर जितना मिला मुझे काफ़ी था। इस के बाद फ़िल्म वालोँ के बीच मैँ ने न तो ताश और न ही कोई जूआ खेला।
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अरविंद कुमार
1965, क्रिसमस डे। (इसके बहुत साल बाद सन 1973 का फ़िल्मवालों के साथ मेरा क्रिसमस आख़री था। उसका वर्णन वहां तक पहुंचने पर ही करूंगा।) बंबई में यह मेरी दूसरी पच्चीस दिसंबर थी। घनिष्ठ फ़िल्मवालों को क्रिसमस विश करने की रात! मुझे साथ ले कर वे। जल्दी ही हम माला सिन्हा के घर पहुंचे। बड़ी गरमजोशी से चंद्रशेखर का स्वागत किया गया। जाम उठाए गए। मेरा परिचय कराया गया। मेरा भी ज़ोर से स्वागत हुआ। मेरी पहचान के वहां सिर्फ़ जे.सी. जैन थेजो कभी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सर्वेसर्वा जनरल मैनेजर हुआ करते थे। मुझे देखकर वह ख़ुश हुए। जाम वाला हाथ उठाकर इस्तक़बाल किया। माला सिन्हा भी आगे बढ़ आईं। और फिर दौर शुरू हुआ नाच का। विलायती डांसों में चंद्रशेखर चाचाचा के उस्ताद माने जाते थे। उनकी आमद ने महफ़िल मेँ जोश भर दिया। मुझ से भी शामिल होने को कहा गया। जे.सी. जैन ने भी उकसाया। मैँ ठहरा निपट अनाड़ीमेरा साथ देने और सिखाने का ज़िम्मा नर्तकी बेला बोस पर डाला गयासब बेकार...।
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चंद्रशेखर किस तरह अपने पड़ोसियोँ से जुड़े रहते थे – यह देखने का मौक़ा मुझे 1965 में पाकिस्तान से तनाव और लड़ाई के दिनोँ देखने को मिला। रात के समय करफ़्यू लग जाता था। पाकिस्तानी एजेंटोँ के सक्रिय होने की ख़बरेँ या अफ़वाहेँ फैलती रहती थीँ। सब महल्ले वालों की ड्यूटी लगती थीरात में घूम कर चौकसी की। चंद्रशेखर और मेरी ड्यूटी साथ लगती । प्रसिद्ध अभनेता होने के बावजूद मालिक सब महल्ले वालोँ से बराबरी के लैवल पर मिलते थेउन के सुख दुख में शामिल होते थे।
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1964. फ़िल्म चाचाचा बन रही थी। मैँ उस के सभी गीतोँ की रचना का गवाह था। संगीतकार इक़बाल कुरैशी हैदराबाद से आए तो अपने साथ वहां के शायर मख़्दूम मोइनउद्दीन की मशहूर नज़्म एक चमेली के मंडवे तलेमयक़दे से ज़रादूर उस मोड़ पर / दो बदन प्यार की आग में जल गये’ ले कर आए थे और मशहूर हो गए थे। वह किसी और प्रौड्यूसर के पास थीपर इस्तेमाल नहीँ हुई थी। चंद्रशेखर जैसा इनसान माँगे तो कोई ना नहीँ करता था।
चाचाचा का अंधा नायक मंदिर में भजन गा रहा है। नायिका हेलेन को ग़लतफ़हमी हो जाती है कि वह उस पर तंज़ कर रहा है। अच्छी ख़ासी पिटाई कर डालती है। उस के अंधेपन का पता चलता हैतो ग्लानि से भर जाती है। आपरेशन से उसे आँखेँ मिल जाती हैँ। आगे की कहानी आप सब समझ सकते हैँ। पूरी फ़िल्म चा चा चा नृत्य पर चंद्रशेखर की मास्टरी दिखाने के लिए बनाई गई थी। नर्तक नायक की नायिका के लिए कोई हेलेन जैसी नर्तकी ही हो सकती थी। फ़िल्म सफल रही। एक पूरी रात चाचाचा’ के एक नाच की शूटिंग पर स्टूडियो मेँ रहा। घर लौट कर सोया तो पता नहीँ उस शाम जागा या अगले दिन।
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बंबई से मेरे चले आने के बाद भी हम लोगोँ का संबंध बना रहा। 1998 में कुसुम और मैँ महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादेमी की ओर से अखिल भारती हिंदी सेवा पुरस्कार’ लेने गए तो भवदीप में ही ठहरे। पूरा परिवार हमारी ख़ुशी में शामिल था। चर्चगेट के पास किसी सभागार मेँ फ़ंक्शन था। मालिक ने सब से बड़ी गाड़ी निकाली। मैँ भाषण देना नहीँ जानता। नाम पुकारा गया तो खड़ा होना पड़ा। सामने देखा। लगभग सही जाने पहचाने थे। वेद राही दिखे। पहले उनका नाम लिया। फिर औरफिर और...। भाषण हो ही गया। उसके उपरांत नाश्ता पानी था। महावीर अधिकारी मेरे भाषण से ख़ुश नहीँ थे। चंद्रशेखर ने कहाजो कभी बोला नहीँइतनी देर बोलता रहा– यह कम है क्या?
मेरी किताब शब्देश्वरी आई। एक प्रति मालिक को भेजी। उन्होँ ने वह मंदिर में रख दी। कहते, इस में सभी देवी-देवताओँ के नाम हैँएक साथ सब की पूजा हो जाती है                      
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)  

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