‘फ़िल्मफ़ेअर-यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स टैलेंट कॉन्टेस्ट’ के टॉपर राजेश खन्ना और उसका ‘आख़री खत’ - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 3 जून 2018

‘फ़िल्मफ़ेअर-यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स टैलेंट कॉन्टेस्ट’ के टॉपर राजेश खन्ना और उसका ‘आख़री खत’


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-33

आखरी खत

पिछले रविवार को अपने घनिष्ठ मित्र स्वर्गीय लेख टंडन और उन की राजेश खन्ना वाली फ़िल्म अगर तुम न होते की बात की।
तो इस बार राजेश खन्ना। जिन नए लोगोँ से मेरी मुलाक़ात हुई उनमेँ 1965 मेँ राजेश भी एक था। फ़िल्मफ़ेअर-यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स टेलेंट कॉन्टेस्ट में वह पहले नंबर पर आया था।
(आज की पीढ़ी की जानकारी के लिए यूनाइटड प्रोड्यूसर्स बंबई के ग्यारह फ़िल्म निर्माताओँ की एक संस्था का नाम था, जिसमेँ जी.पी. सिप्पी, बी.आर. चोपड़ा, शक्ति सामंत, देवेंद्र गोयल जैसे लोग शामिल थे।)
इस कॉन्टैस्ट के बारे मेँ राजेश ने कहा है, मुझे अभिनय का नमूना पेश करने के लिए एक लिखित संवाद दिया गया। मैँ कनफ़्यूज़्ड था। भीतर गया तो देखा सामने बड़े बड़े लोग बैठे थे। मैँ कुछ कुछ नर्वस भी था। मैँने कहा, ‘डायलॉग तो अच्छा है, लेकिन कहीँ यह नहीँ बताया गया है कि यह बोलने वाला कौन है, उसका चरित्र क्या है, संदर्भ क्या है?’ इस पर एक जज ने पूछा, ‘आप रंगमंच पर काम करते हैँ?’ मैँने कहा, हां। वे प्रभावित हुए। बोले, ‘अपनी पसंद का ही कोई संवाद बोलो। सौभाग्य से मुझे अपना एक भावुक डायलॉग याद आ गया। सब तालियां बजाने लगे। मैँ पसंद कर लिया गया।

ऐ हे...!आ हा...!!

कॉन्टैस्ट के पुरस्कारोँ मेँ से एक अन्य था पांच साल तक इनकी फ़िल्मोँ मेँ काम करना – मतलब इनसे बाहर किसी और कंपनी मेँ काम करना हो तो इन से अनुमति लेना। एक और पुरस्कार था चेतन आनंद की एक फ़िल्म मेँ काम। तब चेतन आनंद ने उसे अपनी आगामी फ़िल्म आख़री ख़त के लिए साइन कर लिया था।
तब वह कोई इक्कीस बाईस साल का रहा होगा। जब भी मिलता पंजाबी आदत के अनुसार घुटने छूने को झुकता। उसकी यह आदत छुड़ाने में मुझे कई मुलाक़ातें लगीँ। उन्हीँ दिनोँ की एक याद। फ़िल्मफ़ेअर के संपादक मंडल मेँ नवनियुक्त पत्रकार देवयानी चौबल को संपादक करंजिया ने निकाल दिया था। काम के लिए वह मेरे पास आई। करंजिया से निष्कासित किसी को रखना अनुचित होता। कुछ महीने पहले टाइम्स के पुराने जनरल मैनेजर जे.सी. जैन ने गुलशन ईविंग के संपादन मेँ स्टार ऐंड स्टाइल पत्रिका आरंभ की थी। उन्हेँ फ़ोन करके मैंने देवयानी को भेजा। देवयानी वहां की सीढ़ियां चढ़ रही थी तो एक नौजवान भी यही कर रहा था। यह था राजेश खन्ना। दोनोँ की दोस्ती पक्की हो गई। नकचढ़ी देवयानी अपनी तीखी टिप्पणियोँ के लिए बदनाम होने लगी, तो मैँ ने जे.सी. को फ़ोन कर के अफ़सोस प्रकट किया। जे.सी. ने कहा, अफ़सोस किस बात का, देवयानी की वज़ह से पत्रिका का सरकुलेशन बढ़ रहा है। वैसी रिपोर्ट मैँ माधुरी में कभी न छापता। अच्छा हुआ कि माधुरी उस से बच गई।

अच्छे दोस्त
बात राजेश की है। तो उस के ख़ास दोस्त जितेंद्र का ज़िक्र करना मौजूँ रहेगा। दोनोँ का जन्म सन 1942 मेँ अमृतसर मेँ हुआ, दोनोँ वहां से बंबई आए, और राजेश खन्ना के.सी. कॉलेज मेँ पढ़ रहा था तो जितेंद्र सिद्धार्थ कॉलेज मेँ। दोनोँ को अभिनय मेँ दिलचस्पी थी। जितेंद्र को स्क्रीन टैस्ट मेँ जाना था, तो उसकी कोचिंग राजेश खन्ना ने की थी। राजेश खन्ना की 18 जुलाई 2012 में मृत्यु तक दोनोँ की दोस्ती क़ायम रही। शांताराम की गीत गाया पत्थरोँ ने (1964) मेँ उनकी बेटी राजश्री के साथ आ कर जितेंद्र लोकप्रिय तो हो चुके थे, पर पैर नहीँ जमा पाए थे।
1942 की बात करेँ तो उसी साल जन्मे अमिताभ बच्चन भी चार पांच साल बाद आने वाले थे। और दोनोँ को पछाड़ने वाले थे। पर वह लगातार उतनी सफल फ़िल्मेँ नहीँ दे पाए जितनी का रिकॉर्ड अभी तक राजेश के नाम है - 1969 से 1971 तक एक के बाद एकल हीरो के रूप मेँ उसकी 15 सुपर हिट फ़िल्मेँ आईं। पढ़ते पढ़ते राजेश रंगमंच पर सक्रिय था। धर्मवीर भारती के अंधा युग की किसी प्रस्तुति मेँ उसने कुरुक्षेत्र के युद्ध मेँ हार के बाद हस्तिनापुर लौटते थके-हारे घायल सैनिकोँ मेँ से एक का रोल किया था, जो बहुत सराहा गया था। तभी किसी ने कहा था कि उसे फ़िल्म जगत की ओर ध्यान देना चाहिए।
आख़री ख़त वाले राजेश के फिर से लिखने के बजाए मैँ दैनिक अमर उजाला मेँ छपी एक टिप्पणी पेश कर रहा हूं।
आख़री ख़त के बारे मेँ राजेश का कहना है, यह मेरे शुरूआती दिनोँ की यादगार फ़िल्म है। ऐसी फ़िल्मेँ कलाकारोँ की कम और निर्देशक की ज़्यादा होती हैँ। चेतन साहब ग़ज़ब के कल्पनाशील थे। अपनी हर फ़िल्म के हर शॉट को वह भावनाओँ से ओत-प्रोत करते थे। मुझे अच्छी तरह याद है उसके अब ना जा गीत का फ़िल्मांकन मशहूर फ़ोटोग्राफ़र जाल मिस्त्री ने कैसे किया था –मैँ था और इंद्राणी मुखर्जी थीँ। दोनोँ के कुल पांच छह क्लोज़अप थे-लेकिन हमारे पीछे चलता था हिमालय का पैनोरामा – भावनाओँ से भरपूर, परफ़ैक्ट। फ़िल्म में मेरा सबसे चुनौती भरा दृश्य बिल्कुल अंत मेँ था। मैँ बेहद उदास हूं। हर तरफ़ शांति है। अपने बेटे बंटू को पहचानता हूं। मैं खिल उठता हूं। देर रात चेतन जी फ़ोन कर के जगा देते ताकि जब सैट पर पहुंचूं तो मेरा चेहरा ग़मज़दा नज़र आए।
अगले रविवार को भी राजेश खन्ना – और रूप और यादें...

अरविंद कुमार

सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

1 टिप्पणी:

  1. बहोत ख़ूब....मेरे आदर्श राजेश खन्ना के बारे में पढ़ और जानकर अच्छा लगा !!
    धन्यवाद् ��

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