अब ‘मुगले आजम’ के 'अकबर' जैसे कड़क बाप नहीं होते; किस फिल्म से आज के पिता का मिजाज ही बदल गया...? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 17 जून 2018

अब ‘मुगले आजम’ के 'अकबर' जैसे कड़क बाप नहीं होते; किस फिल्म से आज के पिता का मिजाज ही बदल गया...?


फादर्स डे पर विशेष

सिनेमा की बात अजय ब्रह्मात्मज* के साथ

'मुगले आजम' का अकबर यानी पृथ्वीराज कपूर- हिन्दी सिनेमा का सबसे ऊंची शान वाला पिता

सवाल- हिंदी फिल्मों में रोमांटिक नायक का अपना प्रभुत्व रहा है लेकिन इसी के बरअक्स पिता की भूमिकाओं को भी हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। क्लासिक फिल्मों के दौर से लेकर आज तक हिन्दी सिनेमा में पिता की बदलती भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?
अजय ब्रह्मात्मज - भारतीय सिनेमा परिवार जैसी परम्परा पर निर्भर रहा है। एक समय था जब लगभग सारी ही फ़िल्में पारिवारिक हुआ करती थीं। उसके बाद धीरे-धीरे उसमें बदलाव आते गए और अमिताभ बच्चन के समय से पिता की भूमिका थोड़ा बदलनी शुरू हुई। पहले सब पिता केंद्रित ही था माता केंद्रित या मां को आधार बनाकर मदर इंडिया जैसी फिल्में तो बहुत बाद में आईं।  हालांकि समाज मे देखा जाए तो मां और बाप दोनों की भूमिका समान होती है। कोई किसी से कम नहीं होता। दोनों अपनी जगह विशिष्ट हैं। लेकिन फिल्मों में एक पिता को खलनायक दिखाना एक फार्मूला रहा है। जिसमें हीरो को डांटना, फटकारना आम बात हुआ करती थी। उड़ान जैसी फिल्मों को देखें या मां की भूमिका को आप पिता के समक्ष रखें तो मां को हमेशा त्याग, प्रेम, करुणा की प्रतिमूर्ति ही दिखाया गया है। यह एक स्थापित फार्मूला है और इसके बनिस्पत समाज में आकर देखें तो फिल्मी दुनिया और रियल लाइफ की दुनिया दोनों में बहुत अंतर दिखाई देता है। वहां पिता खलनायक कम ही दिखते हैं। तो
 
बलराज साहनी-आदर्शवादी पिता की मिसाल
सवाल- हाल ही में 102 नॉट आउट फ़िल्म आई जिसमें बाप बेटे को वृद्धाश्रम भेजना चाहता है और इससे पहले ऐसा बहुत कम फिल्मों में देखने मिलता है। राजेश खन्ना की अवतार एक ऐसी ही फिल्म याद आती है। ऐसी फिल्में क्या संदेश देना चाहती है आज की पीढ़ी को?
अजय ब्रह्मात्मज- 102 नॉट आउट मनोरंजनपरक सिनेमा है। उसमें कहीं भी गम्भीरता नहीं दिखाई देती। एक रूढ़िवाद सा जरूर नज़र आता है जिसमें दादा का भड़कना है और दूसरी और बेटे का पक्ष है। जो यह दिखाता है कि किस तरह उसने अपने बेटे को बचपन में पाला। ये सब दादा के बताने पर ही सामने क्यों आया पहले नहीं आया? दादा बताता है बेटा स्वार्थी हो गया है, उसकी मानता नहीं है। ये सब देखकर बागवां फ़िल्म की ही याद आती है और इस फ़िल्म पर भी बागवां का ही प्रभाव नज़र आता है मुझे। बेवजह संतान को कोसना, ताने देना, वे लायक नहीं हैं, परवाह नहीं करती, उनसे बदगुमान हैं। तो ये सब घिसी पिटी सोच है। उन्हें भी देखना चाहिए गांव से अगर कोई शहर आ रहा है तो उसके संघर्ष भी साथ आते हैं। वह शहर में किसी वजह से परेशान भी हो सकता है। हो सकता है उस समय वह किसी मुसीबत में हो और घर पर बात न कर पाए। ये तमाम बातें उसके साथ घटित हो सकती हैं। ये सब पुरानी मान्यताएं और रूढ़ियां हैं, जिनसे हमें बाहर आने की आवश्यकता है। उम्मीदें पालना अब ठीक नहीं होगा। घर छोड़ कर कैरियर को तरजीह देना भी युवा पीढ़ी के मन में है जो कतई गलत भी नहीं। युवा पीढ़ी को हर बात पर दोषी ठहराना गलत हो सकता है।
DDLJ में अमरीश पुरी। 'जा सिमरन जी ले अपनी ज़िंदगी' कहने वाले इस किरदार ने भविष्य के फिल्मी पिताओं को बदल दिया
सवाल - क्लासिक फिल्मों में पिता की भूमिका देखें तो डीडीएलजे के अमरीश पुरी को कौन भुला सकता है? क्या वैसी भूमिका और कहानी आज कही जा सकती है?
अजय ब्रह्मात्मज- डीडीएलजे हो या कोई और क्लासिकल फ़िल्म सब अपने-अपने समय, समाज की कहानी को लेकर चलती है और वही उनकी विशेषता भी होती है। मुगले आज़म आज के दौर में बनाई जाए तो कहां तक सही होगा? मेरे ख़्याल से आज वैसी फिल्मों की आवश्यकता ही नहीं या फ़िर उन्हें कोई उतना सराहेगा नहीं। ख़ैर, किसी भी फ़िल्म की कहानी उसके किरदार, उनकी भूमिकाएं समय सापेक्ष ही अच्छी लगती हैं। हां, ये बात अलग है कि वे फिल्में सदाबहार हैं कुछ लोगों के लिए।

अमिताभ-अभिषेक-आदर्श पिता-पुत्र
सवाल - क्लासिक फिल्मों के पिता और आज की पेशेवर फिल्मों के पिता में कितना बड़ा अंतर है? ‘दो बीघा जमीन’, ‘बाप नंबरी बेटा दस नंबरी और दंगल जैसे पिताओं को केंद्र में रखा जाए तो?
अजय ब्रह्मात्मज -  देखिए सिनेमा हमेशा से बिजनेस रहा है। वह आज ही पेशेवर या व्यावसायिक नहीं बना है। उसका एक मुख्य उद्देश्य व्यवसाय करना, बिजनेस करना भी है। बाकी क्लासिक फिल्मों की या आज की पेशेवर फिल्मों की बात करें तो क्लासिक सिनेमा जिसे आप कहते हैं वे उस समय की कहानियां हैं, उस दौर के लोगों की सोच है, लेखकों का लेखन कर्म है। ये सब समाज से ही प्रभावित रहा है। ऐसी मां होगी, ऐसा पिता होगा। सबकी भूमिकाएं बराबर और एक निश्चित ढर्रे पर बंधी हुई सी है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा फिल्मों का अपना एक फार्मूला होता है। बाकी पिता पिता ही है और हमेशा एक पिता ही रहेगा। नेगेटिव, पॉजिटिव या सकारात्मक, नकरात्मक होना सब समयानुकूल है। 
शाहरुख अपने बेटे साथ
आज के समय में बेटियों को पढ़ाना, लिखाना, क़ाबिल इंसान बनाना और समाज में उन्हें अपनी एक अलग पहचान बनाने देना इन सबकी छूट है। लेकिन पहले के ज़माने को देखें या 70,80 के दशक की बात करें और नब्बे के दौर तक भी ये सब संभव नहीं था। बेटियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। आज समय बदला है तो जाहिर सी बात है क्लासिक या पेशेवर सिनेमा जिसे आप कहते हैं उसमें भी उसी अनुरूप परिवर्तन तो होंगे ही।

सवाल - बॉलीवुड के रील लाइफ़ और रियल लाइफ़ बाप बेटे की आदर्श जोड़ी के रूप में आप किनको रखना चाहेंगे?
अजय ब्रह्मात्मज
अजय ब्रह्मात्मज- बदलते समाज के साथ हमें भी बदलना चाहिए लेकिन पुरानी फिल्मों के बाप अगर आज की हक़ीक़त बनकर उतर आएं तो क्या होगा? कुछ भी नहीं, क्योंकि ऐसा संभव नहीं। यही बात रील लाइफ़ और रियल लाइफ़ के बारे में भी है। पर्दे पर बाप-बेटे का रिश्ता अपने-अपने हिसाब से हर किसी ने दिखाने का प्रयास किया है। वहां निर्माता, निर्देशक और लेखक सभी को पूरी छूट होती है। लेकिन रियल लाइफ़ तो रियल है। बाकी आदर्श बाप-बेटे की जोड़ी में आप आज के समय में शाहरुख खान और अब्राम की जोड़ी को देख सकते हैं। वे अपने बेटे का हर सम्भव ख़्याल रखते हैं और उनके बीच रिश्ते एक बाप- बेटे से कहीं बढ़कर दोस्त जैसे भी नज़र आते हैं। जो इस रिश्ते की खूबसूरती को बयां करता है। इसके अलावा अमिताभ बच्चन और अभिषेक को भी आप इसी कैटेगरी में रख सकते हैं। 
तेजस पूनिया
वहीं दूसरी ओर रणवीर कपूर, ऋषि कपूर के रिश्तों में भी कुछ अच्छा नहीं है। इसी तरह संजय के रिश्ते भी हैं। बाकी हिंदी फिल्म उद्योग के कई सारे रिश्ते तो सार्वजनिक हो ही नहीं पाते। तो उनके बारे में भी ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।
 प्रस्तुति-तेजस पूनिया
(राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, जयपुर, हिंदी विभाग में छात्र। संपर्क-9166373652)

*अजय ब्रह्मात्मज प्रख्यात फिल्म समीक्षक हैं। इन्होंने सिनेमा पर कई पुस्तकें लिखी हैं। विश्वविद्यालयों में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं।
मुंबई में निवास। संपर्क-9820240504


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