इरफ़ान खान की भावुक चिट्ठी एक चर्चित फिल्म के ओपनिंग इंट्रोडक्शन की याद दिलाती है...! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शुक्रवार, 22 जून 2018

इरफ़ान खान की भावुक चिट्ठी एक चर्चित फिल्म के ओपनिंग इंट्रोडक्शन की याद दिलाती है...!

फिल्म अभिनेता इरफान खान का यह पत्र जीवन और जीवंतता तथा सांसारिकता और संघर्ष को करीब से देखने का भावुक अनुभव बयां करता है। यह पत्र मीडिया में वायरल हुआ है। 
संक्षिप्त रुपांतर...

इरफान खान
यह बात कुछ समय पहले की है जब मुझे पता चला कि मैं हाई ग्रेड न्यूरो एंडोक्राइन कैंसर से ग्रस्त हूं। ये नाम मेरे शब्दकोष में बिल्कुल नया है। मुझे जानकारी मिली ये एक दुर्लभ किस्म की बीमारी है और इसके बारे में और इसके उपचार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। और इसी वजह से इसके उपचार पर संदेह भी अधिक है। मैं इस ट्रायल और एरर गेम का एक पार्ट बन गया हूं।
मैं अपने जीवन के दूसरे ही गेम में उलझा था जहां मैं अपने हाईस्पीड ट्रेन में सफर कर रहा था। मेरे सपने थे, मेरी ख्वाहिशें थीं, कुछ अरमान थे, और इन कामों में मैं पूरी तरह से बिजी था। तभी अचानक कोई पीछे से आकर मेरे कन्धों पर थपथपा कर मुझे बुलाता है। मैंने पलटकर देखा तो वह टीसी था जो मुझे कह रहा था कि तुम्हारा ठिकाना आ गया है, अब ट्रेन से उतर जाओ। लेकिन मैं कंफ्यूज रहता हूं और कहता हूं कि नहीं, मेरी मंजिल तो अभी नहीं आई है।
इन सब भागदौड़ के बीचमैं डरा सहमा सा अपने अस्पताल विजिट के दौरान एक बार अपने बेटे से कहता हूं, ‘मैं खुद से बस यही चाहता हूं कि इस समय मैं इस तरह से परेशान न होऊं और मुझे अपने पांव जमीन पर रखना चाहिए। डर और परेशानी को मुझपर हावी होने नहीं देना चाहिए क्योंकि ये हालत को और भी बिगाड़ देंगे।
यही मेरा मकसद था और तभी दर्द ने दस्तक दी, जैसेकि अभी तक आप दर्द के बारे में केवल जान ही रहे थे। सबकुछ निष्क्रिय सा था। कोई हौसला काम नहीं कर रहा था। सारे हालात एक जैसे हो गए थे। महज दर्द ही दर्द का अहसास था।


'लाइफ ऑफ पाई' में इरफान खान
अस्पताल में दाखिल होने के दौरान मुझे इस बात का अनुमान ही नहीं था कि मेरे अस्पताल के विपरीत में लॉर्ड्स स्टेडियम है जोकि मेरे बेटे के सपनों का तीर्थस्थल है। दर्द के दौरान ही मैंने विवियन रिचर्ड्स की मुस्कराती हुई तस्वीर देखी और फिर ऐसा लगा जैसे कुछ हुआ है नहीं। मानो ये दुनिया मेरी कभी थी ही नहीं। अस्पताल में एक कोमा वॉर्ड भी था। एक बार अपने अस्पताल की बालकनी में खड़ा था जब इस अहसास ने मुझे जकड़ लिया कि जिंदगी और मौत के दरम्यान बस एक रास्ता था। एक तरफ अस्पताल था तो दूसरी तरफ स्टेडियम।  
मैं इस यूनिवर्स की अपार ताकत और बुद्धिमत्ता के साथ हो गया था। मेरे अस्पताल के स्थान की विशिष्टता मुझे उत्प्रेरित करती थी। महज यही अनिश्चित था। मैं बस इतना ही कर सकता था कि इस गेम को आत्मसात कर इसे और अच्छे से खेल सकता था।
इस समझ ने मुझे समर्पित करने और विश्वास करने पर मजबूर कर दिया, चाहे इसका नतीजा चाहे जो भी हो और चाहे वो मुझे जहां भी ले जाता। अभी से चाहे 8 महीनेया फिर 4 महीने या फिर दो साल। ये सभी चिंताएं पीछे हट गईं और धूमिल हो गईं और मेरे जेहन से बाहर आ गईं।
पहली बार मुझे इस बात का अंदाजा हुआ कि आजादी क्या होती है। यकी
नन किसी विजय का अहसास कराती है। मानों जिंदगी का मैं पहली बार स्वाद ले रहा था और इसके जादुई पक्ष को देख रहा था। युनिवर्स की विराटता पर मेरा विश्वास बढ़ गया। मुझे लगा कि मैं अपने हरेक सेल में प्रवेश कर गया हूं। 
ये तो वक्त ही बताएगा कि ये रहेगा या नहीं लेकिन फिलहाल मुझे कुछ ऐसी अनुभूति हो रही है।  
अपनी इस यात्रा के दौरानलोगों ने मेरी सेहत के लिए मुझे विश किया और मेरे लिए प्रार्थना भी की। वो लोग जिन्हें मैं जानता हूं और जिन्हें नहीं भी जानता हूं। लोग अलग-अलग जगहों से अलग-अलग समय पर मेरे लिए प्रार्थना कर रहे थे और मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं एकजुट हो गई हैं। एक बड़े से फोर्स की तरह मेरे स्पाइन से लेकर मेरे मस्तिष्क तक समा गई है। ये बढ़ रहा हैएक पत्ते और कली के समान। मैं इसे पास रखता हूं और देखता रहता हूं। वो हर एक दुआ जो मेरे सामने एक पत्ते और कली के रूप में आई है वो मुझे चकित कर देती है और मुझे अहसास कराती है कि कॉर्क को कुछ भी कंट्रोल करने की जरूरत नहीं। आपको कुदरत के इस झूले में सुकून से झुलाया जा रहा है। 
(साभार, मीडिया रिपोर्ट्स)

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