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रविवार, 1 जुलाई 2018

समय ‘खलनायक’ को ‘नायक’ बनाता है और फिल्ममेकर ‘नायक’ को ‘खलनायक’!


सिनेमा की बात *अजय ब्रह्मात्मज के साथ

राजकुमार हिरानी और संजय दत्त के बीच हुई दो सौ घंटे की बातचीत से निकली है संजू की कहानी

रियल और रील का 'संजू'

सवाल- रिलीज से पहले संजू के प्रमोशन में जो जो कहा गया, क्या फिल्म में वे सारी चीज़ें दिखाई देती हैं? लोग आखिर इस फिल्म को क्यों देखे?
अजय ब्रह्मात्मज दर्शक संजय दत्त के जीवन के बहुत सारे तथ्य जानते नहीं हैं इसलिए उन्हें अवश्य फ़िल्म देखने जाना चाहिए। उन्होंने आजतक जो कुछ भी जाना है केवल शब्दों के माध्यम से जाना है। ये शब्द उन्हें मीडिया से मिले हैं। यानी उन्होंने उस चीज़ को करीब से नहीं देखा है। ऐसे में दर्शक फ़िल्म देखने जाएंगे। हालांकि कोई भी फ़िल्म अगर बॉयोपिक फॉर्मेट में हो तो भी आप उसमें उसकी जिंदगी को सम्पूर्ण रूप से नहीं दिखा सकते। इसलिए कुछ एक अहम हिस्से को चुना जाता है। दूसरी बात कि यह किसी फिल्मकार की अपनी आज़ादी है कि वे फ़िल्म में क्या दिखाएं और क्या नहीं। इसमें फ़िल्ममेकर्स की या उस व्यक्ति की जिस पर बॉयोपिक बन रही है उनकी आपसी रजामंदी भी होती है। रही बात प्रमोशन और फ़िल्म के अधूरापन की तो जेल में क्या हो रहा था संजय दत्त के साथ दिन प्रतिदिन, वो तो सब ज्यों का त्यों नहीं दिखाया जा सकता। और ना ही फ़िल्ममेकर्स उसे दिखाना चाहेंगे।

सवाल-आपको क्या लगात है कि संजय की तरफ से अपनी कहानी बताने में और हिरानी द्वारा उसे पर्दे पर उतारने में ईमानदारी को कितना ख्याल रखा गया होगा?
अजय ब्रह्मात्मज–ईमानदारी वास्तव में दोनों के बीच का मसला है। ये तो वे दोनों ही जानते हैं या इसके अलावा संजय दत्त के परिवार और संजय दत्त के खुद के करीबी लोग ही इस पर कुछ बता सकते हैं। आप और हम जैसे तो बस दर्शक और समीक्षक हैं। वैसे कहा गया था कि 200 घंटे की बातचीत उनके बीच रिकॉर्ड हुई है तो 200 घंटों को 3 घंटे या उससे कुछ कम में दिखा पाना बड़ा मुश्किल काम है। हिरानी जी इसमें पूरी तरह सफ़ल कहे जा सकते हैं।

सवाल-फ़िल्म निर्माण की टेक्निक, वेशभूषा, मेकअप और इसके गानों को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे? रणबीर का संजय दत्त के रूप में मेकओवर किया जाना कितना सटीक लगा?
अजय ब्रह्मात्मज-वेशभूषा अच्छी है और किसी पीरियड फ़िल्म जैसी सी लगती है। विक्रम गायकवा ने मेकअप के क्षेत्र में अच्छा काम किया है। वे बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने संजय दत्त को रणबीर कपूर में और सुनील दत्त को परेश रावल में बख़ूबी ढाला है। तारीफ़ कॉस्ट्यूम डिजाइनर की भी की जानी चाहिए। ये सभी काम कॉस्ट्यूम प्रोडक्शन की जिम्मेदारी होती है जिसमें भी वे सफ़ल दिखाई देते हैं। दूसरी बात फ़िल्म आपको हंसाती है, रुलाती है और लगातार इसका क्रम बना रहता है।

जो वर्तमान में है उसी की 'मान्यता' है
सवाल-क्या आपको फिल्म देखने के बाद नहीं लगता कि यह फ़िल्म उनकी ईमेज बिल्डिंग के लिए बनाई गई है? इसके अलावा फिल्म रिलीज से पहले जो खबरें थी कि इसमें तथ्य होंगे अफवाहें नहीं, इस सब के बारे में आपकी क्या राय है?
अजय ब्रह्मात्मज-अच्छी बात पूछी है आपने लेकिन जितना यह सवाल कठिन है उतना ही जवाब भी। इसमें दो बातें हैं-एक संजय दत्त की छवि और दूसरा उसके साथ रेस लगाने की कोशिश। दरअसल फ़िल्म इसलिए बनी है कि हमारी धारणा जो अब तक संजय दत्त को लेकर बनी हुई है उसे तोड़ा जा सके और इसमें राजू हिरानी सफ़ल होते हैं। संजय दत्त के साथ जो कुछ भी हुआ वह समय और परिस्थितियों का खेल था। इसके बाद हम देखते हैं उन्हें पश्चाताप भी नहीं है। बेहतर होता फ़िल्म के अंत में संजय दत्त खुद आते और समझाने का प्रयास करते कि हमें गैरकानूनी काम नहीं करना चाहिए। शायद ये सब कहीं न कहीं वे खुद भी महसूस करते तभी हो पाता। मुझे इस फ़िल्म में सबसे ज्यादा नागवार गुजरा है मीडिया द्वारा आरोप लगाना। शायद इसीलिए फ़िल्म के आखिर में मीडिया को लेकर गीत लिखा गया है जो निर्देशक या संजय दत्त की अपनी कला प्रतीत होती है। पूरी फ़िल्म में असल खलनायक की कमी है और जो खलनायक स्थापित होता है वह है मीडिया।  

सवाल–हाल के समय मे जितने भी बॉयोपिक बने हैं, उनके मुकाबले संजू आधे अधूरे सच के साथ सामने आती है, क्या यह प्रवृति आने वाले समय में बॉयोपिक बनाने वालों को प्रभावित कर सकती है?

अजय ब्रह्मात्मज
अजय ब्रह्मात्मज-देखिए दो घंटे में भले बॉयोपिक हो या इतिहास। सभी में फ़िल्म मेकर्स यही करते हैं और यही सब आप और हम लोग किसी लेख को लिखते समय करते हैं। जिस तरह किसी लेख के लिए शब्द सीमा होती है उसी तरह फिल्मों की भी समय सीमा होती है। उसी के चलते इस फ़िल्म में विशेष रूप से दो ही पहलू हैं। हां, अगर यह कोई टीवी शो होता तो शायद समय सीमा जैसा कोई बंधन नहीं होता और तब हम पूरा जीवन देख पाते। फ़िल्म में उनके फिल्मी करियर को भी तरजीह दी गई है। पहली फ़िल्म रॉकी की शूटिंग और उसके रिलीज से लेकर अन्य कुछ एक फिल्मों पर चर्चा ये सब मेरे ख्याल से इतना जरूरी नहीं था लेकिन इसे भी दिखाया है। कुल मिलाकर फ़िल्म अच्छी है। देखने लायक है और निर्माता, निर्देशक से लेकर अभिनय तक सभी कुछ अच्छा है। मनीषा कोइराला भी नरगिस की भूमिका में फिट हैं इसी तरह परेश रावल, रणवीर कपूर और अन्य सहयोगी अभिनेताओं ने भी अच्छा काम किया है।
प्रस्तुति - तेजस पूनिया
(राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग, एमए के छात्र।
संपर्क- 9166373652)

*अजय ब्रह्मात्मज प्रख्यात फिल्म समीक्षक हैं। इन्होंने सिनेमा पर कई पुस्तकें लिखी हैं। विश्वविद्यालयों में सिनेमा पर व्याख्यान देते हैं। मुंबई में निवास। संपर्क-9820240504

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