चीनी मां, हिंदुस्तानी पिता की इस 'स्टार बेटी' ने अपने अमेरिकन दूल्हा को 'ग्रैग' से 'गौतम' बनाया - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 15 जुलाई 2018

चीनी मां, हिंदुस्तानी पिता की इस 'स्टार बेटी' ने अपने अमेरिकन दूल्हा को 'ग्रैग' से 'गौतम' बनाया


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-39
 
अभिनेत्री राजश्री
पिछले दो हफ्ते जितेंद्र पर सीरीज के बाद यह भाग जरूरी हो जाता है...
सन् 1945 में जन्मीं राजश्री बेटी है राजकमल कलामंदिर की स्थापना करवाने वाली शांताराम की दूसरी पत्नी जयश्री की। कलकत्ते के चाइना टाउन में सन् 1921 मेँ जन्मी चीनी मूल की जयश्री सामाजिक मूल्यों से ओत-प्रोत फ़िल्म बनाने वाली उसी प्रभात फ़िल्म कंपनीमेँ काम करती थी जिसकी स्थापना शांताराम ने अपने कई साथियोँ के साथ मिल कर करवाई थी। बीसवीं सदी के पहले साल सन 1901 की 18 नवंबर को जन्मे उत्साही कल्पनाशील शांताराम वहां अभिनेता भी थे और निर्देशक भी। प्रभात का संचालन करते थे सेठ फ़तह लाल दामले। उनके लिए प्रभात एक पवित्र मंदिर था, जहां प्रेम जैसी किसी चीज़ का प्रवेश बंद था। लेकिन जयश्री और शांताराम एक दूसरे के प्रेम में दीवाने थे। दोनों ने मराठी शेजारी(1941), हिंदी शकुंतला(1943) जैसी फ़िल्मों में काम किया था। सुंदरी जयश्री से शादी की अनुमति नहीँ मिली तो शांताराम ने प्रभात फ़िल्म कंपनीछोड़ दी और अपनी नई कंपनी राजकमल कला मंदिरखोल ली, अपने से बीस साल छोटी जयश्री से शादी कर ली।
राजकमल बैनर के अंतर्गत एक के बाद कई बेहतरीन फ़िल्म बना कर नए भारत की मानसिकता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। उनमें से एक थी 1946  की डाक्टर कोटणीस की अमर कहानीजिसकी नायिका चिंगलान भारत-चीन मैत्री का प्रतीक बन गई। चीनी मूल की होने के कारण जयश्री के लिए बेहद आसान था, कहानी की नर्स चिंगलान बन जाना। फ़िल्म के अंत में ट्रेन मेँ बैठी कोटणीस की अस्थियां ले जाती चिंगलान के चेहरे पर स्वर्गीय कोटणीस के स्वर में हम हिंदुस्तान जा रहे हैं, चिंगलान वाक्य मुझे अब तक याद है।

जितनी सादगी, उतना ग्लैमर
1964 में नायिका के रूप में बीस साल की नर्तकी राजश्री पहली बार एक नए अभिनेता जितेंद्र के साथ गीत गाया पत्थरों ने में आई। इससे पहले वह स्त्री,’‘नवरंग,’‘गृहस्थी और घर बसाके देखो में बाल कलाकार के रूप में आ चुकी थी। इसलिए फ़िल्म कैमरा उसके लिए कोई अजनबी मशीन नहीँ था। कैमरे के महारथी शांताराम ने चीनी-मराठी ख़ून वाली बेटी के अनोखे रूप को उत्कृष्टतम छवि में उभारने में अपनी पूरी कला वार दी थी। उसका शानदार स्वागत होना स्वाभाविक था। रातों-रात वह दर्शकोँ की प्यारी हो गई।
एक के बाद एक फ़िल्म आने लगी। पहले ही साल आईं जॉय मुखर्जी के जी चाहता है और विश्वजीत के साथ शहनाई। फिर तो झड़ी लग गई। 1965 में शम्मी कपूर के साथ जानवर, विश्वजीत के साध सगाई, हृषिकेश की विश्वजीत के साध दो दिल. 1966 में धर्मेंद्र के मोहब्बत ज़िंदगी है। और 1967 की जितेंद्र के साथ गुनाहोँ का देवता में वह पूरी तरह सध चुकी थी और जितेंद्र की आवारा मस्ती चमकने लगी थी, राज कपूर के साथ अराउंड द वर्ल्ड, शशि कपूर संजय ख़ान के साथ दिल ने पुकारा
शशि कपूर के साथ 1973 की कनक मिश्र निर्देशित नैना राजश्री की आख़िरी फ़िल्म थी। एक तरह से यह डाफ्नी दु मौरिए के उपन्यास रीबेका से प्रेरित थी। इसमें शशि की पहली पत्नी थी सीधी-सादी राजश्री और दूसरी पत्नी थी ऊंचे घराने की ऐरिस्टोक्रैट मौसमी चटर्जी।
शम्मी कपूर के साथ मुझे उसकी फ़िल्म ब्रह्मचारी बहुत अच्छी लगती है। नौजवान अनाथ ब्रह्मचारी शम्मी कपूर अपने घर अनाथ बच्चे पालता है। सारा ख़र्च उठाना उसके बस के बाहर होता जा रहा है। एक दिन वह देखता है कि एक युवती आत्महत्या करने वाली है। वह उसे यानी शीतल (राजश्री) को भी अपने घर ले आता है। शीतल अपने प्रेमी प्राण के लिए पागल है। ब्रह्मचारी बिछड़े प्रेमियोँ को मिलाना चाहता है, पर शीतल अब उसे चाहने लगी है। कहानी में अनाथ बच्चोँ की रोचक घटनाएं हैँ। ब्रह्मचारी की खटारा कार है, चक्के में चक्का, चक्के पे गाड़ी (शैलेंद्र) और आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर (हसरत) जैसे लोकप्रिय गीत हैँ।
संदर्भवश ब्रह्मचारी द्वारा अनाथ बच्चे पालने वाला प्रकरण मिस्टर इंडिया की थीम बना। उसमें एक वैज्ञानिक खोज के लिए मारधाड़ वाले प्रसंग डाले गए। ब्रह्मचारी में जो भूमिका राजश्री ने निभाई थी, उससे मिलता जुलता रोल नई अभिनेत्री श्रीदेवी ने किया।
'ब्रह्नचारी' में शम्मी कपूर और राजश्री

1967 में ही राज कपूर के साथ अराउंड द वर्ल्ड की शूटिंग अमेरीका में हो रही थी। वहां जर्मन मूल के अमेरीकी छात्र ग्रैग चैपमैन से उसकी मुलाक़ात क्या हुई उसकी ज़िंदगी बदल गई। तीन साल तक मेलजोल चलता रहा। फिर पूरी तरह मराठी रस्मो रिवाज में बंबई में दोनों की शादी हो गई। शादी की रस्में और समारोह पांच दिन चलते रहे। कहा जाता है कि लगभग पंद्रह हज़ार मेहमानों ने शिरकत की।
बंबई की ग्लैमर ठुकरा कर जयश्री अमेरीका के लॉस एंजिल्स में सामान्य नागरिक जीवन बिताने लगी। ग्रैग नाम बदल कर गौतम हो गया। वहां ग्रैग ने उच्च कोटि के परिधान बनाने और बेचने का व्यवसाय शुरू किया। तब से अब 73 साल की हो जाने तक राजश्री उस संस्थान से संचालन में सक्रिय भूमिका निभाती हैँ। उनकी एक बेटी है चंद्रिका। ग्रैग चैपमैन की कंपनी पचास सालों से बड़े से बड़े कंपनी अधिकारियोँ और हॉलीवुड के फ़िल्मी सितारोँ के लिए वेशभूषा सप्लाई करती आ रही है।
पिछले साल (2017) में राजश्री बंबई आई थी रयल पेरा हाउस में सलाम नौनी अप्पा के प्रीमियर पर। लेकिन अधिकांश फ़िल्मी सितारे उसे पहचान नहीँ पाए, न ही उसने अपन पहचाने जाने की कोशिश की।

ग्रैगरी चैपमैन से शादी की तस्वीर
जितेंद्र ने लिखा है कि राजश्री का दिल बहुत अच्छा था। सबसे प्रेम से पेश आती। शूटिंग में नखरे नहीं करती थी। जब कभी कोई बॉलीवुड वाला सितारा लॉस एंजिल्स गया, तो राजश्री ने तपाक से उसका स्वागत किया। बंबई में कारोँ में चलने वाली राजश्री वहां ख़ुशी ख़ुशी बसोँ में सफ़र करती थीं, वहीं के जीवन में रच बस गई। कभी कभी तो एअरपोर्ट में काम भी किया। वहां की ग़ुमनामी उसे रास आ गई थी।
और अंत मेँ:
एक प्रशंसक की स्वीकारोक्ति आज की पीढ़ी को राजश्री की लोकप्रियता समझाने के लिए 14  अगस्त  2011 को शम्मी कपूर के देहांत पर एक सिने प्रेमी रवींद्र कौल ने जो लिखा उसमें से राजश्री से संबंधित कुछ अंश यहां लिखे जाने लायक़ हैं:
शम्मी कपूर नहीँ रहा। उसका जाना मेरी शम्मी के या हू दिनों वाली पीढ़ी के लिए गहरे शोक का विषय है। वे दिन थे जब हम लोग कश्मीर में वे जगहेँ तलाशा करते थे, जहां उसकी शूटिंग होती थी। तमाम टीवी चैनलों पर जो गाने दिखाए जा रहे हैँ उनमें से एक मैं रूबरू हुआ राजश्री से जो मेरे दिल की धड़कन बन गई थी। राजश्री हमारे लिए आधुनिक देसी बार्बी गुड़िया ही थी – तब मैँ दस साल का जो था। मानोँ मैं उसमें समा जाता था (as a 10-year old, I used to get enveloped in her)। सर्वांग सुंदर स्त्री। वहां का साठादि दशक का फ़िरदौस सिनेमा अब नहीँ है। वहां मैंने देखी उसकी गीत गाया पत्थरों ने। दस साल का बच्चा मैं उसे पूजने और चाहने लगा। जब कभी मैँ उसके साथ शम्मी वाली जानवर देखता तो मुझे लगता परदे पर शम्मी नहीँ, मैँ हूं; जा गाए रहा हूं–लाल छड़ी मैदान खड़ी। अराउंड द वर्ल्ड में बुढ़ाता राज कपूर नहीँ, मैं कुल आठ डॉलरों के बल पर दुनिया की सैर कर रहा होता था।

अरविंद कुमार
युगोँ बाद मैं जिनेवा, पेरिस, रोम और लंदन में राज कपूर जहां अपनी प्रेमिका के पीछे नहीं जा रहा था, बल्कि किशोर अवस्था का मैं ही तो था। मुझे लगता, किसी तरह कहीँ से शर्माती राजश्री मेरे सामने आ खड़ी होगी। हाय शोक, तमाम दिवास्वप्न स्नो फ़्लेक से तिरोहित हो जाते। फिर भी उन जगहों पर जाना मेरे लिए तीर्थयात्रा जैसा ही था–आख़िर मेरी प्रिय राजश्री ने अपने चरण कमलोँ से उन्हें पवित्र जो कर दिया था
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर, भारतीय सिनेमा के अनछुए इतिहास से परिचित कराता वर्णन

    उत्तर देंहटाएं
  2. फ़िल्म - स्त्री , गृहस्थी और घर बसाके देखो में राजश्री की वयस्क भूमिकायें थीं । घर बसाके देखो और गृहस्थी में उनके नायक मनोज कुमार थे । स्त्री में वे राजनर्तकी की विशेष भूमिका में थीं । ‘ नवरंग ‘ में वे नहीं थीं । ‘ सुबह का तारा ‘ में अवश्य वे बाल कलाकार थीं ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. Rajshri ji ki filming me Ek film aur thi Jisme unhone behtareen acting ki thi... Film thi suhagraat

    उत्तर देंहटाएं

Post Bottom Ad