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रविवार, 22 जुलाई 2018

अपने दोस्त को आलीशान बंगला गिफ्ट करने वाले उस कलाकार को अमिताभ ने बस की लाइन में खड़े देखा

ठाठ के दिन यार को बंगला किया गिफ्ट, तंगहाली में जितेंद्र के हाथों बिका मकान, फटेहाली में अमिताभ ने बस की लाइन में खड़े देखा, बीच सड़क पर मरे तो कोई पहचान न सका-ऐसे थे सिल्वर स्क्रीन के बैजू

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-40
 
अरविंद कुमार


सुहाग रात के बेलीबैजू बावरा के बैजू, बरसात की रात के अमान,मिर्ज़ा ग़ालिब के ग़ालिब का हुआ दुखद अंत

भाग 31 में मैंने चंद्रशेखर के बंगले भवदीप का ज़िक्र किया था। यह कभी भारतजी का था। नया बंगला बनवाया तो भवदीप अपने यार को दे गए।
भारतजी के पाली हिल वाले नए शानदार बंगले पर मैं कई बार गया था। पिछवाड़े बहुत बड़ा घास मैदान था। संगमरमर का मंच था। उसकी संगमरमर की नक़्क़ाशीदार पीठ थी। दाहिने बाएं संगमरमर की नीची दीवार थी। बड़े-बड़े उस्ताद उस पर विराज कर संगीत की महफ़िल सजाते। सुनने वालोँ में भारत जी के साथ उनके निजी मित्र और सितारे होते थे। बंगले में एक बड़े कमरे की आलमारियां हिंदी और इंग्लिश की साहित्यिक किताबों से लदी थीँ। लोग कहते थे कि ये सब किताबें दिखावा हैं। पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वे सच्चे साहित्य प्रेमी थे। असंख्य कविताएं और ग़ज़लें उन्हें कंठस्थ थीं। ज्ञान का यह हाल था कि परमाणु क्षेत्र की पूरी जानकारी भी उनके पास होती थी।

'फागुन' में भारत भूषण और मधुबाला 
पैसा बहुत था। खर्चीला हाथ था। ऐसा ही आदमी दोस्त को पूरा बंगला भेंट कर सकता था। ख़र्चे इतने बढ़े कि आर्थिक संकट में वह आलीशान बंगला बेचना पड़ा। ख़रीदने वाला था नवोदित जितेंद्र। उसने वहां चौदह-मंज़िला इमारत खड़ी कर दी।
भारत जी का स्नेहभाव मिला तो शायद इसलिए भी कि वह जानते थे कि मैं भी मेरठ का हूं। पर मैंने उन्हें कभी यह याद नहीँ दिलाया कि हमारा दूर का रिश्ता भी था। उनके पिता थे लालवालों की पत्थरवाले शाखा के सरकारी वकील राय बहादुर मोतीलाल थे, और पहली पत्नी शारदा के पिता थे बड़े जमींदार राय बहादुर बुधप्रकाश जिनका पुश्तैनी मकान (मेरे वाले) लाला के बाज़ार के टी पाइंट पर था। सिविल लाइंस मेँ उनकी बड़ी कोठी थी। वहां कोठी से हट कर एक बड़ा हौज था। उसमें तमाम रिश्तेदार नहाने का मज़ा ले सकते थे। बचपन में मैं पिताजी के साथ कई बार नहाया था। वह हौज अभी तक मेरे मन में है।
भारत भूषण चार साल के थे कि उनकी मा का देहांत हो गया। तब बड़े भाई आर. चंद्रा का लखनऊ में फ़ोटो स्टूडियो था। दोनों भाई अपने बाबा के पास रहने अलीगढ़ चले गए। भारत ने वहीं बी.ए. पास किया। उन्नीस साल के भारत को सिनेमा में काम करने की लगन लग गई। पिताजी के विरोध के बावजूद वह कलकत्ते जा पहुंचे। पंडित किदार शर्मा की 1941 की चित्रलेखा में एक छोटी सी भूमिका मिली। उसके लगभग दस साल इधर उधर भटकने में बीते।
 भारत जी की सबसे ज़्यादा याद की जाने वाली फ़िल्म है 1952 की बैजू बावरा। चंद्रशेखर इसके बारे में कई क़िस्से सुनाते थे। निर्देशक थे रामराज्य जैसी महान फ़िल्मोँ वाले विजय भट। लेकिन चंद्रशेखर का कहना था कि यह पूरी फ़िल्म नौशाद की थी। कहानी पर नाम किसी का हो, निर्देशक का नाम कुछ भी हो–सब कुछ नौशाद का था। हो, संवाद ज़रूर ज़िया सरहदी के थे, जिन्हें मांजा था नौशाद ने। तो चंद्रशेखर के अनुसार एक दिलीप कुमार गए बैजू का रोल मांगने। जो कारण बताया वह नौशाद को पसंद नहीँ आया। उन्होंने कहा, तू ऐक्टिंग करेगा, बना बनाया बैजू है भारत भूषण।


बैजू बावरा भारत जी की पंदरहवीं फ़िल्म थी।

(बैजू बावरा और भारत जी पर मैं एक अलग क़िस्त लिखूंगा, इसलिए यहां और अधिक नहीं लिख रहा। यहां मेरा फ़ोकस भारत जी के जीवन पर है।)

बैजू बावरा का ज़माना था देव आनंद, राज कपूर और दिलीप कुमार का। उनके बीच भारत एक अनोखा हीरो था जिस पर लड़कियां दीवानी थीँ। उनके बिखरे बालों वाला मन तड़पत हरि दर्शन को आज गाने वाला मध्ययुगीन गायक।
भारत जी की बेहद लोकप्रिय बरसात की रात (1960) के गीत लिखे थे साहिर लुधियानवी ने। साहिर का कहना था-एक भला मानस मेरा फ़ोटो देख कर बड़ा निराश हुआ, बोला आप शायर तो कहीँ से नहीँ लगते। मैंने कहा-शायर का फ़ोटो चाहिए तो भारत भूषण का लो।
मुझे याद है, जब उनकी फ़िल्में कम चल रही थीं तो उन्होंने निर्माता के रूप में एक बहुत बड़ी फ़िल्म का महूरत किया। उसका नाम अब याद नहीँ आ रहा। हीरो कोई नया था। उत्सुकता जगाने के लिए नाम नहीँ बताया जा रहा था। कहा गया कि महूरत पर ही रहस्य खुलेगा। वह नया हीरो कोई और नहीँ संजीव था। वह फ़िल्म तो नहीँ बन पाई, पर संजीव सबकी आंखों में चढ़ गया।
बंगला बहुत पहले बिक चुका था। 1980 वाले दशक तक भारत जी पूरी तरह कंगाल हो चुके थे। बोरिवली की किसी गंदी बस्ती में रहते थे। अमिताभ ने किसी ब्लॉग में लिखा है, मैं सांता क्रुज़ से गुज़र रहा था। कार से देखा-बड़ी बड़ी गीत संगीत से भरी फ़िल्मों का नायक बस की लाइन में खड़ा है। सामान्य सा बाशिंदा। केला, अनपहचाना, बेनाम, ग़ुमनाम। किसी को नहीं पता था, वह कौन है।
वक़्त का मारा 27 जनवरी 1992 को बोरिवली में इकहत्तर साल का वह बूढ़ा अपने घर से निकला, अकेले ही अस्पताल जाना था। रिक्शा में सवार हुआ। रास्ते में ही मर गया। जो लोकप्रिय रोल उसने अदा किए थे उनमें से किसी एक के अंत की तरह उसका अंत हुआ। मरने के बाद उसकी तारीफ़ से पत्र-पत्रिकाओं के पन्ने भर गए।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)  

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