गांधी जी ने एकमात्र फिल्म देखी थी जिसके डायरेक्टर ने भारत भूषण को स्टार बनाया था - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 29 जुलाई 2018

गांधी जी ने एकमात्र फिल्म देखी थी जिसके डायरेक्टर ने भारत भूषण को स्टार बनाया था


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-41

अरविंद कुमार अपने अध्ययन कक्ष में
भारत भूषण, भाग-दो
पंडित किदार शर्मा की गीता बाली वाली सुहाग रातमें भारत भूषण पहले पहाड़ी मज़दूर बेली बन चुका था। उसके बाद देवेंद्र गोयल की पहली फ़िल्म आंखेँ में वह सहनायक दिखाई दिया। आंखें क्या थी मेरठ परिवार था-निर्माता-निर्देशक देवेंद्र मेरठ के,वहीं से वह लाए अपने मित्र शेखर को नायक के रूप में और उस के साथ मेरठ का ही भारत भूषण।
उसे लोकप्रिय हीरो बनाने का सेहरा बंधा बैजू बावरा (1952) बनाने वाले विजय भट्ट के सिर। वह नरसी भगत (1940), भरत मिलाप (1942) और  रामराज्य(1943) बना चुके थे। यह वही ऐतिहासिक रामराज्य थी जिसका पहला गीत भारत की एक सन्नारी की हम कथा सुनाते हैं और उसका सवाल –यही राम दरबार–कहां वैदेही?” मेरी पीढ़ी की कमउम्र में घर घर गूंज रहा था (गीतकार थे रमेश गुप्ता)। यह वही एकमात्र फ़िल्म थी जिसके अंश महात्मा गांधी ने देखे थे। इसी फ़िल्म से सीता के रूप में शोभना समर्थ उभरी थीं जो नूतन और तनुजा की मां बनीं। और नायक श्रीराम बने थे प्रेम अदीब।

'बैजू बावरा' में भारत भूषण
बैजू बावरा विजय भट्ट की ग्यारहवीं और भारत भूषण की पंदरहवीं फ़िल्म थी। और इसमें वह टाइपकास्ट हो गए भक्तों या शायरों के रोल में। अगले ही साल भट्ट ने उन्हें चैतन्य महाप्रभु बना दिया जिसके लिए मिला फ़िल्मफ़ेअर का श्रेष्ठ अभिनेता अवार्ड।
विजय भट्ट ही प्रकाश पिक्चर्स के लिए लैदरफ़ेस (1939) में मीना कुमारी को ला चुके थे। बैजू बावरा साबित हुई मीना कुमारी को भी स्टार बनाने वाली फ़िल्म।
पूरी तरह शास्त्रीय संगीत से भरी फ़िल्म बनाना ख़तरे का खेल था। बॉलीवुड में सब आशंकित थे। लेकिन आत्मविश्वासी विजय भट्ट ने एकत्रित की थी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा। कहानी थी रामचंद्र ठाकुर की, पटकथा आर.एस. चौधरी की और संवाद लेखक थे ज़िया सरहदी (जिन्होंने हमलोग (1951) और फ़ुटपाथ (1953) निर्देशित की थीं।)
इस फ़िल्म से दर्शकों की रुचि बदलने का दावा करने वाले नौशाद को संगीत सौँपा गया था। समझदार विजय भट्ट की महानता है कि नौशाद को पूरी छूट दी। बैजू के लिए भारत भूषण के चुनाव में भी नौशाद का दख़ल माना जाता है, वरना भट्ट की पहली पसंद थे दिलीप कुमार। नौशाद ने अपने साथ लिए गीतकार शकील बदायूनी, गायक मोहम्मद रफ़ी (मन तड़पत हरि दर्शन को आज राग मालकौंस, ओ दुनिया के रखवाले राग दरबारी, इनसान बनो राग टोड़ी), तानसेन और बैजू के मुक़ाबले के लिए गायक थे उस्ताद आमिर ख़ां और पंडित डी.वी. पलुस्कर)।
कहानी का आधार थीं किंवदंतियां। स्वयं तानसेन, बैजू बावरा, अकबर, स्वामी हरिदास इतिहास भी हैं और किंवदंती भी। किंवदंती भी ऐसी जो इतिहास बन गई हैं जैसे यूरोप में रोमियो जूलियट और हैमलेट। तानसेन-बैजू के मुक़ाबले भी प्राचीन संगीत की उसी तरह की किंवदंतियां हैँ, जैसेकि संगीत से हिरन मोहित हो जाते हैं, पानी में आग लग जाती है, पत्थर पिघल जाते हैं। स्वामी हरिदास भी हमारी सांस्कृतिक किंवदंतियोँ के अंग हैँ।
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तानसेन के रियाज़ के समय आसपास किसी को शोर मचाने या गाने बजाने की छूट नहीं थी। एक घुमंतू संत की गाती बजाती टोली तानसेन के घर के सामने से गुज़र रही थी। चौकीदारों ने उस पर हमला कर दिया। मरते मरते संत ने बेटे वैद्यनाथ (बैजू) से वादा लिया कि वह तानसेन से बदला लेगा। बालक बैजू पर यही धुन सवार हो गई। अनाथ बैजू को शरण मिली यमुना तट पर किसी गांव के पुजारी के पास। गांव के आरंभिक दृश्यों में लगातार यमुना में नावें दिखाई जा रही हैं। नाविक की बेटी भी नाव में दिखती है। ये दृश्य ज़मीन तैयार करते हैँ क्लाईमैक्स में बाढ़ग्रस्त यमुना मॆं नाविक की जवान बेटी गौरी (मीना कुमारी) और गायक बैजू के विलीन होने की।
तू गंगा की मौज मैं यमुना का धारा (राग भैरवी–मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर) संभवतः संगम के मेरे मन की गंगा तेरे मन की यमुना की आधार भूमि तैयार करने वाला गीत है।
एक डाकू सरदारनी हमला करती है, पर बैजू के गीत इनसान बनो की दीवानी हो जाती है। गांव वाले दया की भीख मांगते हैँ तो बैजू को साथ ले जाने की शर्त पर बख़्श देती है। डकैत बाला अपने जागीरदार पिता की हत्या का बदला ले रही है। उसकी कहानी से जवान बैजू को याद आता है अपने पिता को दिया गया वचन। इससे आगे की फ़िल्म का मुख्य भाग इसी पर केंद्रित है।
मौक़ा मिलने पर बैजू हमला करता है। तानसेन (सुरेंद्र) कहता है, मुझे जीतना है तो मुझसे बड़े गायक बनो। बैजू स्वामी हरिदास की शरण जाता है। पूरी कहानी बयान करना मेरा उद्देश्य नहीँ है। यह सब इसलिए लिखा कि आज की पीढ़ी को बैजू बावरा का कुछ अंदाज़ा हो जाए।
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भारत भूषण की बाद की फ़िल्मों में यादगार थीं और हैं–सोहराब मोदी की मिर्ज़ा ग़ालिब (1954) (नायिका–सुरैया)और बड़े भाई आर. चंद्रा निर्मित प्यारेलाल संतोषी निर्देशित बरसात की रात (1960) (नायिका–मधुबाला)।
बैजू बावरा की ही तरह बरसात की रात भी गीत संगीत पर आधारित फ़िल्म है। हर गीत की अपनी जगह है। कोई भी गीत बेवज़ह या बस यूं ही नहीँ है। निर्धन नायक अमान शायर एक कव्वाल के घर रहता है जिसकी बड़ी बेटी अमान की दीवानी है। बरसात का मौसम है। पहला गीत है बरसात की अगवानी का– गरजत बरसत सावन आयो रे। रेडियो पर कविता पाठ के लिए अमान हैदराबाद जा रहा है। अपने पुराने दोस्त पुलिस अफ़सर शेखर (चंद्रशेखर) के घर ठहरता है। नई तरह के कलाम की प्रेरणा के लिए वहां झील किनारे टहल रहा है। बादल घुमड़ आए। भागता है, बचने के लिए रुकता है। वहीँ नायिका शबनम (मधुबाला) भीग रही है, शरमाती लजाती सिकुड़तीसी आंचल निचोड़ रही है। अगले दिन शायर अमान की प्रशंसक शबनम रेडियो खोलती है। वह नज़्म पढ़ रहा है– जिंदगी भर नहीँ भूलेगी वह बरसात की रात। (ऐसा ही एक गीत फ़िल्माया गया था मधुबाला पर एक लड़की भीगी भागी सी चलती का नाम गाड़ी।)

'बरसात की रात' का एक दृश्य
अगर भारत भूषण को सफल नायक बनाने का सेहरा विजय भट्ट के सिर है, तो बरसात की रात की रात को हिट करने का सेहरा संगीतकार रोशन के सिर है। (बरसात की रात की रात को हिट करने का सेहरा संगीतकार रोशन के सिर बांधने का मतलब यह नहीं है कि फ़िल्म में और कुछ था ही नहीं। हर चीज़ कहानी, निर्देशन, कैमरा, अभिनय सब सही और अच्छा था। सबसे अच्छी थी भारत भूषण और मधुबाला की जोड़ी।)
रोशन ने गीतकार साहिर और गायक वृंद आशा भोंसले, कमल बड़ौत, लता मंगेशकर, सुधा मल्होत्रा, सुमन कल्याणपुर तथा शिवदयाल बातिश, बलबीर, बंदे हसन, मन्ना डे और मोहम्मद रफ़ी के साथ जो सुरों की बरसात बरसाई वह ज़िंदगी भर नहीँ भूलेगी। गीत थे गरजत बरसत सावन आयो रे, ज़िंदगी भर नहीँ भूलेगी वह बरसात की रात, मैंने शायद तुम्हें पहले भी कहीं देखा है, मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का, और कव्वालियाँ थीं निगाहे नाज़ के मारों का हाल क्या होगा, ना तो कारवां की तलाश है, यह इश्क़ इश्क़ है, जी चाहता है चूम लूं तेरी नज़र को मैं, पहचानता हूं तुम्हारी नज़र को मैं। एक से बढ़ कर एक गीत-संगीत रचना। अब तक जितनी कव्वालियां हिंदी सिनेमा में बनी हैँ, उनमें कोई भी बरसात की रात के पासंग बराबर भी पास नहीँ पहुंच पाई। रोशन ने इंदीवर और आनंद बख्शी जैसे गीतकारों को प्रोत्साहित किया।
सन् 1917 में तत्कालीन पंजाब के गुजरांवाला में जन्मे रोशनलाल नागरथ ने कम उम्र में ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था। बाद में लखनऊ के मॉरिस कॉलेज (आजकल इस का नाम है भारत खंडे म्यूज़िक इंस्टीट्यूट) में उन्होंने पंडित श्रीकृष्ण Ratanjankar (सही हिंदी उच्चारण मुझे नहीँ मिला) से संगीत सीखा। उन्नीस सौ चालीसवें दशक में ऑल इंडिया रेडियो के ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर ने उन्हें इसराज वादक के रूप में रख लिया। यहां उन्होंने बंगाली मूल की संगीतज्ञ से विवाह कर लिया। मुझे उनका नाम याद नहीँ आ रहा। उनके भाई (किंग्सवे कैंप के अस्पताल वाले) डॉक्टर मोइत्रा मेरे मित्र थे। माधुरी में एक बार मुझसे मिले भी थे। रोशन के राकेश रोशन और राजेश रोशन बॉलीवुड में चोटी पर हैं। राकेश के बेटे हृतिक के नाम में बंगाली टच उजागर है।
अंत में –
अलीगढ़ में भारत भूषण मार्ग के लोकार्पण पर मौजूद थे आर. चंद्रा के बेटे दिनेश गुप्ता।

सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)   

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