सन् 1941 की ‘चित्रलेखा’ में कैसे फिल्माया गया था संगमरमरी हॉज में एक न्यूड सीन? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 5 अगस्त 2018

सन् 1941 की ‘चित्रलेखा’ में कैसे फिल्माया गया था संगमरमरी हॉज में एक न्यूड सीन?


 माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग-42

चित्रलेखा - 1941 का एक दृश्य 

प्रसंग : केदारशर्मा - एक.  
सन् 1964 से ही पंडित केदारनाथ शर्मा से मेरी नज़दीकी हो गई थी। जब जी चाहता मैँ उनसे मिलने चला जाता उनके दफ़्तर में, और जब कभी वह फोर्ट (बंबई का मुख्य स्थान) आते तो निकट ही टाइम्स की बिल्डिंग में मेरे कमरे में आ पधारते। खुलकर बात उनके दफ़्तर में ही होती। उनकी फ़िल्मोँ की बात होती। उनकी राज कपूर वाली नील कमल और बावरे नैन मैंने दिल्ली में देखी थीं। जोगन नहीँ ही देखी थी,वरना याद होती।
1964 में ए.के. नाडियाडवाला के लिए वह चित्रलेखा फिर से बना रहे थे। 
चित्रलेखा–कष्ट कथा
फ़िल्म कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया पहले ही भगवती बाबू के उपन्यास के फ़िल्माधिकार ख़रीद चुका था। उनके लिए चित्रलेखा की पटकथा और संवाद पर पंडित जी ने काम शुरू किया ही था कि उनके गुरु देवकी बोस ने न्यू थिएटर्स के लिए 1940 वाली अपनी फ़िल्म नर्तकी के संवाद और गीत लिखने के लिए उन्हें तलब किया। वह भारी रक़म दे रहे थे। नर्तकी और चित्रलेखा की कहानी लगभग एक सी थी। पंडित जी ने ऑफ़र ठुकरा दी। देवकी बोस ग़ुस्से से लाल-पीले हो गए। बोले न्यू थिएटर्स के बैनर तले बड़े बजट वाली नर्तकी के सामने तुम्हारी चित्रलेखा कहीँ नहीँ टिक पाएगी। मेरी फ़िल्म में लीला देसाई नायिका है, पंकज मलिक का संगीत है। यही नहीँ लगभग ऐसी ही कहानी पर वाडिया मूवीटोन बना रहे थे कोर्ट डांसर/राजनर्तकी (1941)–हिंदी और इंग्लिश में। नायक थे पृथ्वीराज कपूर, नायिका अपने ज़माने की मशहूर नर्तकी साधना बोस। 
केदार शर्मा चुनौती झेलने को तत्पर रहने वालों में से ठहरे। फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया का बजट कम था। देवकी बोस की चेतावनी से उनकी क्रियाशीलता जाग उठी थी। उन्होंने नायिका चुनी मेहताब, नांदरेकर बने सामंत बीजगुप्त, पंडितजी के अमृतसर में रंगमंच के साथी ए.एस. ज्ञानी बने साधु कुमारगिरि। शर्मा जी के न्यू थिएटर्स वाले काल के कलाकार रामदुलारी, राजेंद्र सिंह, नंदकिशोर, कलावती आदि तो साथ थे ही। कमाल का चुनाव था उस्ताद झंडे ख़ां का संगीत निर्देशक के रूप में - अमृतसर के रंगमंच पर शास्त्रीय संगीतकार। उनसे कहा कि सभी गीत राग भैरवी में होने चाहिए।
कहा जाता है कि उन दिनोँ पंडित जी पूरी फ़िल्म का ड्रेस रिहर्सल करवाते थे, जैसा कि रंगमंच पर नाटकोँ के लिए किया जाता है। मेहताब मूक फ़िल्मों के दिनोँ से सक्रिय थीं। पहले तो राज़ी नहीँ हुईं। बहुत समझाने पर सहमत हो गईं।
फ़िल्म का एक दृश्य था चित्रलेखा का गुलाब जल से भरे संगमरमरी हौज़ में स्नान – कपड़े उतार कर। मतलब नग्न। शूटिंग से पहले मेहताब ने कहा, आप मेरे गुरु हैं इसलिए पिता समान हैं। अगर आप की राय में यह बेहद ज़रूरी है तो अकेले आप के सामने कलात्मक शरीर प्रदर्शन को तैयार हूं। आप अच्छे कैमरामैन भी हैं। मेरी शर्त है कि शूटिंग में आप के और मेरे सिवाय सैट पर कोई न हो। ऐसा ही हुआ भी। पंडित जी ने पूरा दृश्य बस एक शॉट में शूट कर दिखाया।
अब एक नई मुसीबत आ धमकी। फ़िल्म पूरी होने को थी, बस आधे घंटे की शूटिंग बची थी। फ़िल्म कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया के एक लेनदार स्टूडियो बंद करने का आदेश ले आए। जैसे तैसे शूटिंग पूरी की गई।
ट्रायल शो देख कर मालिकान ख़ुश नहीँ थे। नामावली के दौरान उस्ताद बिस्मिल्ला खां की शहनाई से ही वह उखड़ गए। आर्थिक तंगी से परेशान थे ही, पूरी फ़िल्म ही बेकार लगी। बिना किसी प्रचार के कलकत्ते के न्यू सिनेमा में रिलीज़ हुई। सिनेमाघर के मालिक थे न्यू थिएटर्स। तरह तरह की अफ़वाहों का बाज़ार गरम था। कोई कह रहा था कि केदार शर्मा थर्ड रेट निर्देशक है। कोई कह रहा था देवकी बोस ने उसे हकाल दिया था। एक ही हफ़्ते में फ़िल्म फ़्लॉप क़रार दे दी गई।
उन दिनों भगवती बाबू ने लिखा कि केदार शर्मा ने उनके उपन्यास की मिट्टी पलीद कर दी है। फ़िल्म से जुड़ा हर आदमी पस्त था। बस एक आदमी फ़िल्म के साथ था। फ़िल्म कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया का मैनेजर। उसने यह उत्तर तथा मध्य भारत में रिलीज़ कर दी। साथ ही धुआंधार प्रचार भी करवाया। अब वह महान और सफल फ़िल्म कहलाने लगी। इंदौर की महाराज टाकीज़ में यह सोलह सप्ताह से भी ज़्यादा चली। सन् 1941 की सब से ज़्यादा चलने वाली फ़िल्म थी ख़जांची और नंबर दो थी –चित्रलेखा
चित्रलेखा - 1964 का एक दृश्य

1964 में ए.के. नाडियाड वाला के लिए वह चित्रलेखा फिर से बना रहे थे। तब एक बार भगवती बाबू बंबई आए थे। यह चित्रलेखा दोबारा बनने के कारण हुआ। उनसे मिल कर मैं धन्य हो गया। सन् 1903 में जन्म के कारण वह मेरे पिताजी के समकक्ष हुए। दोनों की मानसिकता में अनेक तत्त्व समान थे, जैसा कि भगवती बाबू ने लिखा था –मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहां चले।
तो बात चित्रलेखा की हो रही थी। पहली चित्रलेखा के संबंध में मैं लिख चुका हूं कि भगवती बाबू के उपन्यास के फ़िल्माधिकार फ़िल्म कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया के पास थे।
नई चित्रलेखा के निर्माता ए.के. नाडियाडवाला और केदार शर्मा के लिए यह अनुबंध महासंकट बन गया। फ़िल्म आधी से ज़्यादा बन चुकी थी कि फ़िल्म कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया का नोटिस आ गया फ़िल्म निर्माण रोकने का। क़ानून स्पष्ट था। पुराने समझौते के अनुसार संपूर्ण काल के लिए फ़िल्म कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया ही एकाधिकारी था। जहां तक मेरे सुनने में आया, नए निर्माताओं ने कुछ ऐसा बचाव किया कि हम लेखक से अनुमति ले चुके हैं, लेकिन उस नाम से (फ़िल्म के नाम पर किसी का एकाधिकार नहीं होता) एक भिन्न कथा पर काम कर रहे हैं। आधी बनी कहानी में कई बदलाव किए गए। परिणाम कोई बहुत अच्छा नहीं हो पाया। हो सकता है नाडियाडवाला ने फ़िल्म कॉरपोरेशन से कोई आर्थिक समझौता भी कर लिया हो। मैं निश्चय से कुछ नहीं कह सकता। नई चित्रलेखा के भी सही गीत एक से बढ़ कर एक थे। लिखे साहिर ने थे और संगीत केदार शर्मा की खोज रोशन का था।
मैंने नई फ़िल्म अब फिर इंटरनंट पर देखी है। मुझे न वह तब पसंद आई थी, न अब आई। मीना कुमारी और प्रदीप कुमार वह नहीं कर पाए, जो मेहताब और नांदरेकर ने किया था। पुरानी में ताज़गी थी, सादगी थी। उसके गीत नए संगीतकार ने स्वरबद्ध किए थे, पर साहिर की शायरी के मुक़ाबले कहीँ सीधे सीधी बात कहने वाले थे –सैंयां भये बावरे वचन करत नित झूठे, तुम जावो जावो भगवान, नील कमल मुस्काये कि भंवरा झूठी क़सम खाये, रुत आये रुत जाये, नैया धीरे धीरे जाना, जागा किरणों वाला। उनमें से अधिकांश पंडित जी ने ही लिखे थे।

अरविंद कुमार
नई चित्रलेखा दर्शकों के दिल नहीँ छू सकी। नई के सैटों में वैभव था, पर वैभव तब बेकार रहता है जब फ़िल्म लचर हो। स्वयं केदार शर्मा जी ने माना है कि 1941 वाली चित्रलेखा 1964 वाली से बेहतर थी।


 सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर ! श्री अरविन्द कुमार की कलम कमाल की है. अब पुरानी 'चित्रलेखा' देखने का मन हो आया है. नई 'चित्रलेखा' में मुख्य पात्र या तो बूढ़े थे या फिर अध-बूढ़े. और फिर मीना कुमारी को नर्तकी के रूप में प्रस्तुत करना बिलकुल ग़लत था.

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