विश्वरूपम 2 : ग्लोबल टेररिज़्म दिखाने से कमल हासन को मिलेगी तमिलनाडु में सत्ता? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 11 अगस्त 2018

विश्वरूपम 2 : ग्लोबल टेररिज़्म दिखाने से कमल हासन को मिलेगी तमिलनाडु में सत्ता?

इस्लाम, आतंकवाद और राष्ट्रीयता के जज़्बात को झझकोरने वाली 
अगस्त माह की यह दूसरी फिल्म है। ऐसे ही टेम्परामेंट की 
कुछ और फिल्में आने वाली हैं...


फिल्म समीक्षा
विश्वरूपम-2
निर्देशक -कमल हासन
सितारे - कमल हासन, पूजा कुमार, एंड्रिया जेरेमिया, शेखर कपूर, राहुल बोस, वहीदा रहमान, जयदीप अहलावत

कमल हासन, विश्वरूपम 2

*रवींद्र त्रिपाठी
आप अगर एक सफल फिल्म बना लेते हैं तो आगे का काम आसान हो जाता है। आगे का काम यानी सिक्वेल या फिल्म की श्रृंखला बनाने का। इसके लिए आपको कुछ खास नहीं करना है। बस थोड़ी-सी रफूगिरी करनी है। अगर आपको इस पर भरोसा नहीं हो रहा है तो `विश्वरूपम-2 देख लीजिए।  इसे देखने के बाद आप यही कहेंगे कि कमल हासन चाहे बड़े कलाकार हैं, लेकिन वे बड़े रफूगर भी हैं। उनको कोई फिल्म दे दीजिए, वे उसमें काट छांट के और कुछ पैबंद लगा के नई फिल्म बना देंगे।
फिल्म की कहानी
`विश्वरूपम-2 उसी विसाम अहमद कश्मीरी की कहानी है जिसे आप `विश्वरूप में देख चुके हैं। हालांकि पहली फिल्म में विसाम कथक दर्शक के रूप में भी दिखता है। थोड़ी देर के लिए सही। लेकिन यहां वो मुख्य रूप से एक जासूस यानी सीक्रेट सर्विस का एजेंट है। पहली फिल्म में वो न्यूयॉर्क शहर को अफगानी आतंकवादियों से बचाता है और इसमें यानी `विश्वरूपम-2 में वह पहले इंग्लैंड को बचाता है। वहां एक बम बिस्फोट रोककर। और बम भी कैसे। वो जो वहां दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर की सेना ने पानी में छिपाए थे। इस बात के लिए इंगलैंड की सरकार उसका शुक्रगुजार होती है या नहीं ये पता नहीं चलता। बहरहाल विसाम भारत में कई जगह बम विस्फोट होने से रोकता है। लेकिन दोनों देशों को बम विस्फोट के खतरे बचाने की कहानी से ज्यादा बड़ी तो फ्लैशबैक में चलनी वाली वो कहानी है जिसमें विसाम अफगानिस्तान में आतंकवादियों के साथ रहते हुए उनके खिलाफ अभियान चला रहा था। अर्थात् फिल्म में काफी प्लैशबैक है। मतलब ये कि कहानी में कई नए और पुराने पेंच डाले गए हैं। लेकिन दर्शक फिल्म देखने के दौरान और हॉल से निकलने के बाद बड़ी देर तक सोचता रहता है कि आखिर उसने असल में क्या देखा? क्या ये कि भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ (हालांकि रॉ अब औपचारिक रूप से अस्तित्व में नहीं है) के अफसरों में आपसी तालमेल नहीं है और वे एक दूसरे के खिलाफ ही काम कर रहे हैं, या ये देखा कि विसाम अपनी पत्नी निरूपमा (पूजा कुमार) और साथी औरत अस्मिता (एंद्रिया) से बराबर फ्लर्ट करता है? ये भ्रम इस कारण भी होता है कि विसाम होटल में रहने के दौरान एक रात अस्मिता के साथ सोता है तो दूसरी रात अपनी पत्नी निरूपमा साथ। दो फूल एक माली जैसा मामला है। खैर, ये सब होता रहता है और पुराना खलनायक उमर कुरैशी (राहुल बोस) विसाम से बदला लेने और हिंदुस्तान को तबाह करने के मंसूबे से फिर आ गया है। हालांकि इस बार वो पहले जैसा खूंखार नहीं दिखता बल्कि रेडिएशन का मारा एक दयनीय प्राणी दिखता है। कहने का अर्थ ये है कि राहुल बोस इस बार खलनायक के रूप में दयनीय प्राणी दिखते हैं।

कमल हासन और पूजा कुमार

निर्देशन और अभिनय
...तो इस तरह कमल हासन ने विश्वरूपम श्रृंखला की इस दूसरी फिल्म में यहां वहां से टुकड़े जोड़कर एक फिल्म बना डाली है। हां, कुछ एक्शन मजेदार है। और उसी के भरोसे फिल्म कुछ कुछ देखने लायक हो गई है। और वहीदा रहमान को मां की भूमिका में सामने लाकर फिल्म को थोड़ा जज़्बाती भी बना दिया गया है। ये तो हमारी यहां की फिल्मों का स्थायी फॉर्मूला है कि दुखी और पीड़ित मां को कुछ देर के लिए दिखा तो दर्शक थोड़ा सा अंदर से हिल जाएगा और मां के लिए कुछ आंसू भी बहा लेगा। ये एक टोटका भी है फिल्म चलाने का। पर क्या ये टोटका `विश्वरूपम-2 के लिए थोड़ी सी सफलता के द्वार भी खोलेगा? पर सिर्फ इसी संभावना की तलाश नहीं करनी चाहिए इस फिल्म के सिलसिले में।
एक और बड़ी संभावना की भी बात करनी चाहिए कि क्या कमल हासन तमिलनाडु की भावी राजनीति में इस फिल्म के सहारे अपनी नैया पार लगा पाएंगे? आखिर तमिलनाडु में फिल्म ही मुख्य राजनीति है।
*लेखक प्रख्यात कला मर्मज्ञ और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क - 9873196343

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