कहानी गीता बाली की ‘सुहाग रात’ की... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 19 अगस्त 2018

कहानी गीता बाली की ‘सुहाग रात’ की...


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ताभाग-44 
'सुहाग रात' में गीता बाली

केदार शर्मा विशेष 3
जब केदार शर्मा और मैं एक साथ रोए
मैंने माधुरी में हिंदी फ़िल्म इतिहास के शिलालेख सीरीज़ के लिए सुहाग रात पर छपने वाली लंबी समीक्षात्मक कहानी लिखी थी। वही सुना रहा था पंडितजी को कि कहीँ कोई ग़लती या कमी तो नहीँ रह गई। फ़िल्म तो पुणे में फ़िल्म आर्काइव्ज़ में देखी थी। वहीँ कुसुम ने उसकी पूरी ध्वनि रिकार्ड की थी, और मैं उस ध्वनि से जोड़ने वाले दृश्यों के नोट लेता रहा था। आर्काइव्ज़ के ऑडिटोरियम इसकी पूरी सुविधा थी। कुर्सी का दाहिना हत्था बहुत चौड़ा होता था, उस पर पैड आदि रखने की सुविधा थी। कुसुम कुर्सी के हत्थे पर टेप रिकॉर्डर रखती थीँ। अपनी कुर्सी के हत्थे पर मैं बड़ा-सा पैड और बॉलपैन लिये बैठता था। बाद में बंबई लौट कर मैं नोटों के सहारे समीक्षा लिखवाने बैठता। मेरे साथ होते थे टाइपिस्ट मंगरू राम मिश्र। रोकटोक से बचने के लिए हम दोनों चौथी मंज़िल के एक ख़ाली कमरे में चले जाते था। इस विधि से कई बार दृश्य और मेरे लिखे ब्योरे में ग़लतियाँ रह जाने की संभावना रह जाती थी। अन्य फ़िल्मों के शिलालेख जांचने के लिए कभी कभी फिर पुणे जाना पड़ता था। पर पंडितजी की फ़िल्मों की जांच मैं उन्हें सुना कर ही कर लेता था।
आज सुहाग रात याद की जाती है गीता बाली की पहली फ़िल्म के रूप में। कुछ समीक्षकों की नज़र में सुहाग रात में केदार शर्मा अपनी कला के शीर्ष पर थे।

गीता बाली
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कुल्लू। आंधी तूफ़ान से बचता कम उम्र नौजवान झोंपड़ी में घुसता है। उसकी मां मर रही है। खुली खिड़की बंद करता है। तूफ़ानी हवा से वह फिर खुल जाती है। मां को फ़िक्र है कि उसके बाद भोले भाले बेली (भारत भूषण) का क्या होगा। वह चाहती है कि उसका सौतेला बड़ा भाई राहू उसे अपनी शरण में ले जाए। उसे लिवाने आदमी भेजती है। राहू फ़िराक़ में है कि बाप की सारी ज़ायदाद हड़प ले। उस ने धर्मगुरु को भरमा रखा है कि सौतली मां कहीँ चली गई है। पर पिता की वसीयत के अनुसार सौतेली मां और उसका बेटा बराबरी के हिस्सेदार हैँ। उनके दस्तख़त के बग़ैर ज़ायदाद उसे मिल नहीँ सकती। राहू को बेली सौंप कर मां मर गई। राहू रास्ते में बेली को जग्गू (पेसी पटेल) से मरवा देना चाहता है। बेली की मासूमियत देख कर जग्गू मार नहीँ पाता और अपने घर ले आता है, जहां उसे अपनी बिछुड़ी बेटी कम्मो (गीता बाली) मिल जाती है।
कम्मो के पहले शॉट से ही फ़िल्म में जान पड़ जाती है। एक समीक्षक ने गीता बाली को मिज़ सनशाइन सही ही लिखाथा। उस समय की चोटी की फ़िल्म पत्रिका फ़िल्म इंडिया के प्रकाशक-संपादक बाबूराव पटेल ने लिखा था –गीता बाली की सुहाग रात गीता की क्षमता पहचान कर जहाँ तक हो सका केदार शर्मा ने कैमरा उसी पर रखा था।
स्वाभाविक ही था कि कम्मो सीधे सादे बेली को चाहने लगे। इस से बेख़बर बेली गाँव के ज़मींदार की बेटी पार्वती (बेगम पारा) को चाहने लगता है। एक दूसरे को चाहते हैं। एक दिन पार्वती ने कम्मो को बेली से अपने प्रेम की बात बता दी। पार्वती के माँ-बाप उसकी शादी राहू से करना तय कर चुके हैं। शादी होने वाली है। पार्वती अपने को लाचार समझ रही है। कम्मो उसकी सहायता का वचन देती है। घटनाक्रम ऐसा होता है कि पार्वती को बेली के साथ भगाने की कोशिश में राहू की गोली से कम्मो घायल हो जाती है। घर पहुंचती है। जग्गू उसकी हालत से बेख़बर है। कम्मो के इसरार पर उसकी पसंद का गीत गा रहा है-लक्खी बाबुल मोरे काहे को देनी बिदेस। कम्मो मर रही है। ऐसा करुण दृश्य चित्रित करना केदार शर्मा के ही बस का था। उनका हर शौट करामाती नहीँ सीधा सादा दृश्य की भावना को रेखांकित करने वाला होता था।
सुहाग रात पर अपनी समीक्षा पंडितजी को सुनाते सुनाते मैं कम्मो की मृत्यु वाले दृश्य पर पहुंचा तो इतना भावुक हो गया कि अपनी रुलाई रोक नहीं पाया। एक कारण था उस दृश्य में पैसी पटेल का अभिनय और गीता बाली के कई कोणों से लिए गए शॉट, और तभी बेली का आ कर कंगन देना और चिता परपैसी पटेल का कम्मो की कलाई में पहनाना।
मुझे रोता देख पंडितजी ने कारण पूछा तो मैं अपने को रोक नहीं पाया। मैंने उन्हें बताया कि मेरे मन पर मुझ से छोटी बहन सरोज के अंतिम क्षण उभर रहे थे। सरोज मुझ से शायद एक हीसाल छोटी थी। घर में वही मेरी सहेली थी। हम लोग मेरठ से दिल्ली आ चुके थे। पैसे की बेहद तंगी थी। सरोज को रीढ़ की तपेदिक़ हो गई थी। अर्विन अस्पताल (आजकल लोकनायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल) में उसकी कमर पर पलस्तर चढ़ाया गया था। पलस्तर खुलने का समय आया तो उसे अस्पताल ले जाने के वास्ते तांगे के किराए के पैसे नहीं थे। पिताजी और एक चाचाजी ने पलस्तर चाक़ू से काटा। सब जानते थे कि वह बचेगी नहीँ। (आज मेरे परिवार में शायद ही किसी को सरोज के बारे में पता हो। पिताजी ने अपनी हस्तलिखित जीवनी तक में उसका नाम नहीँ लिया था। शायद वह यह कड़वा अनुभव अपने दिमाग़ से निकाल चुके थे। मेरे सभी छोटे भाई बहन तब अबोध थे।) कम्मो की मौत का दृश्य पढ़ते समय मुझे उसका अंतिम क्षण न जाने क्यों याद आ गया। मैंने पंडितजी को बताया कि सरोज की अंतिम इच्छा एक पैसे की मिठाई की गोली थी।

अरविंद कुमार
अब पंडितजी को अमृतसर में अपनी छोटी बहन तारो की मृत्यु याद आ गई। रोते रोते उन्होंने बताया मरते समय तारो गीता का पाठ सुनना चाहती थी। लेकिन गीता थी नहीँ। कुछ और हाथ न आया तो पंडितजी अपनी गणित की किताब उठा लाए, और गीता का नक़ली पाठ करने का नाटक करने लगे। उन्होंने कहा कि सवाल असली गीता होने का नहीँ था, मरती तारो को यह आभास देने का था कि वह गीता सुन रही है। वह बड़े शांत मन से मरी।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)  

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