'ज़ंजीर' अमिताभ की अगर पहली फिल्म होती ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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बुधवार, 12 सितंबर 2018

'ज़ंजीर' अमिताभ की अगर पहली फिल्म होती !

इलाके में नये आए थे लेकिन जहां खड़े हो गए 
लाइन वहीं से शुरू हो गई...

अमिताभ का अमृतोत्सव, भाग - 2

"मैं तुम्हें मारुंगा लेकिन इतनी आसानी से नहीं...तेजा, मैं तुम्हें बताने आया हूं कि मैं तुम्हें खत्म कर दूंगा" ('ज़जीर' से)

 *संजीव श्रीवास्तव
यह मेरा सवाल नहीं है और ना ही इस जिज्ञासा पर मेरा कोई सर्वाधिकार सुरक्षित है कि ज़ंजीर अगर अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म होती तो क्या होता? क्या अमिताभ की संभावनाओं की तलाश पहले पूरी हो जाती याकि संभावनाओं का समय से पहले अंत हो जाता? ऐसे कई सवाल हैं। संभव है बहुत से लोग यह भी कहें कि ऐसा हो ही नहीं सकता था। क्योंकि तब अमिताभ को सोलो अभिनेता के तौर पर फिल्म में लेने के लिए बहुत से निर्माता-निर्देशक तैयार नहीं थे। उससे पहले उनको ज्यादातर सिफारिशी फिल्में मिल रही थीं। सात हिन्दुस्तानी हो, रेशमा और शेरा या कि उस दौर की कुछेक अन्य फिल्में - अमिताभ बच्चन को तब एक संघर्षरत युवा कलाकार को प्रोत्साहित और सर्वाइव करने की भावना के तहत कुछ फिल्में दी गई थीं, जिसमें उनके किरदार की स्पष्टता की विशेष दरकार नहीं समझी गई, सिवाय बॉम्बे टू गोवा के। हालांकि यहां भी उनके किरदार को स्पेस इसलिए प्रदान किया गया था क्योंकि उसके पीछे उनके भाई अजिताभ, उनके दोस्त अनवर और उनके भाई महमूद का हाथ था। वास्तव में बॉम्बे टू गोवा की ज़मीन राजेश खन्ना के प्रतिरोध में बनाई गई थी। संभव है काम पाने के इच्छुक नये कलाकार के तौर अमिताभ बच्चन को इसके पीछे की वजह न मालूम रही हो और ना ही उन्होंने इस तथ्य की तरफ विशेष ध्यान दिया हो! उन्हें तो पर्दे पर अपने किरदार को जीना था। सो उन्होंने शिद्दत के साथ जीया।
ज़ंजीर की पूर्वपीठिका
ज़ंजीर अमिताभ की वैसी फिल्म थी जिसे देवानंद और राजेश खन्ना ने करने से इनकार कर दिया था। राजकुमार भी इसमें शामिल थे। देवानंद को इसलिए इसकी कहानी पसंद नहीं आई कि इसमें हीरो रोमांटिक गाने नहीं गाता है। वहीं व्यस्त राजेश खन्ना को इसकी कहानी बहुत उचित नहीं जान पड़ी थी। प्रकाश मेहरा ने बॉबे टू गोवा और आनंद देखने के बाद लेखक जोड़ी सलीम-जावेद के सुझाव पर अमिताभ को इस फिल्म के लिए पसंद तो कर लिया था लेकिन डिस्ट्रीब्यूटर्स की इस दलील को मानते हुए अमिताभ बच्चन को इस प्रोजेक्ट से फिर निकाल भी दिया था कि नया और फ्लॉप अभिनेता होने के कारण यह फिल्म कहीं बिज़नेस ना कर पाये! कहते हैं अमिताभ इस खबर को सुनते ही बहुत आहत हुये और बाबूजी के पास घर लौटने के लिए बोरिया बिस्तर बांधने की तैयारी करने लगे। लेकिन अमिताभ और प्रकाश मेहरा के बीच कड़ी जोड़ी थी जया भादुड़ी (बच्चन बाद में बनीं) ने। ज़ंजीर से पहले दो/तीन फिल्मों में अमिताभ बच्चन के साथ काम कर चुकीं जया भादुड़ी के भरोसा दिलाने पर प्रकाश मेहरा ने दांव खेल दिया।


बहरहाल ये तो ज़ंजीर की पूर्वपीठिका हो गई। लेकिन यह समझने की कोशिश करते हैं कि अगर ज़ंजीर अमिताभ की पहली फिल्म होती तो क्या होता? क्या तब भी अमिताभ की दसेक फिल्में लगातार फ्लॉप होतीं? क्या तब भी अमिताभ को एक अदद हिट की इतनी लंबी दरकार होती? हां, यह सही है कि अमिताभ जिस वक्त आये उस वक्त किसी नये अभिनेता के लिए पैर जमाने का बहुत सही वक्त नहीं था। देवानंद, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना आदि कलाकार अलग-अलग विशेषताओं को लिये हुये अपने-अपने प्रभा मंडल को बिखेर रखे थे। देवानंद की स्टाइल, धर्मेंद्र का ही मैन व्यक्तित्व और राजेश खन्ना का रुमान-किसी भी फिल्म इंडस्ट्री को हिट फिल्में देने के लिए इसके सिवा भला और क्या चाहिये। ऐसे में भला अमिताभ की दरकार ही क्या थी? इस लिहाज से कोई अचरज नहीं कि शुरुआती चार सालों तक अगर अमिताभ की प्रतिभा पर किसी का ध्यान नहीं गया।
लेकिन सवाल अहम तो यह है कि क्या ज़ंजीर अमिताभ की अगर पहली फिल्म होती तो क्या होता? क्या एंग्री यंग मैन की खोज चार साल पहले हो जाती? जिस एंगर के लिए ज़ंजीर क्लासिक कहलाई और अमिताभ का किरदार विजय खन्ना अत्यंत लोकप्रिय हुआ - उस किरदार की पहचान पहले स्थापित हो जाती? और आगे चलकर अमिताभ को मिलने वाली फिल्मों का मिजाज कुछ अलग होता? जैसा कि ज़ंजीर के हिट होने के बाद हुआ। अमिताभ को ऑफर होने वाली फिल्मों की कहानी अलग किस्म की होने लगी। मसलन दीवार, त्रिशूल, मुकद्दर का सिकंदर, डॉन आदि। और सभी सुपर-डुपर हिट। क्या यह सिलसिला पहले ही शुरू हो जाता अगर ज़ंजीर अमिताभ की पहली फिल्म होती?
दरअसल जब हम अमिताभ के कैरियर का विश्लेषण करने बैठते हैं कि तो हमारे सामने अक्सर एक मोटी बात यह निकल कर सामने आती है कि चूंकि ज़ंजीर से पहले अमिताभ ने अच्छा अभिनय नहीं किया इसलिए शुरुआती सारी फिल्में व्यावसायिक तौर पर फ्लॉप हो गईं। ज़ंजीर में वो एक ऐसे परिपक्व कलाकार के तौर पर नज़र आते हैं जिसे लोगों ने वास्तविक शुरुआत के तौर पर गिना। लेकिन मैं इस मोटे विश्लेषण से सहमत नहीं। इसे समझने के लिए चलिए प्रारंभ करते हैं अमिताभ की पहली फिल्म और पहले शॉट से।

'सात हिंदुस्तानी' में अमिताभ बच्चन के पहले डायलॉग की तस्वीर  

पहला शॉट
सात हिन्दुस्तानी - यही नाम था उनकी पहली फिल्म का। रिलीज का साल था - 1969; जिसकी शूटिंग का काम दो साल पहले यानी 1967 में ही शुरू हो गया था। पतली-दुबली काया वाले अमिताभ का पहला संवाद था – मौलाना मौज उल हक़ और जयप्रकाश नारायण की पैदाइश, बिहार से; अनवर अली अनवर।दरअसल इस दृश्य में सात क्रांतिकारी अपना-अपना परिचय दे रहे थे, उसी में आखिरी बारी अमिताभ की थी। अनवर अली अनवर एक शायर का किरदार था, जिसे उन्होंने इस फिल्म में निभाया था। गोवा को पुर्तगालियों के कब्जे से आजाद कराने वाले सात जांबाजों की कहानी थी – सात हिन्दुस्तानी। यह एक जज़्बाती फिल्म थी। कभी फिल्म पत्रकार और लेखक रहे ख्वाजा अहमद अब्बास ने यह फिल्म बनाई थी। यह फिल्म ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है। इसमें अमिताभ को बोलते हुये साफ साफ देखा जा सकता है। और संवाद अदायगी की तासीर को महसूस किया जा सकता है। अमिताभ बाकियों की तरह धाराप्रवाह संवाद नहीं बोलते, बल्कि एक पॉज के साथ संवाद की कड़ियों को आगे बढ़ाते हैं। और सबसे बड़ी खूबी यह कि उस पॉज में भावाभिव्यक्ति का नगीना फिट करके बोलते हैं। वास्तव में यही एक्सप्रेसन समेत पॉज उनको बाकियों से अलग स्पेस प्रदान करता था। पूरी फिल्म में अमिताभ को जब जब बोलने का मौका मिला, उन्होंने इस त्वरा को बरकरार रखा।

'रेशमा और शेरा' :  मूक किरदार जो ऊंचे संवादों के आगे भी खामोश नहीं था

मुखर मूक
हालांकि अगली फिल्म रेशमा और शेरा’ (1970) में अमिताभ को बोलने का मौका ही नहीं मिला। सुनील दत्त ने राजस्थान की पृष्ठभूमि पर एक अलग किस्म की प्रेम कहानी की रचना की थी, जिसमें दो परिवार के खूनी संघर्ष को दिखाया गया था। और इस खूनी संघर्ष में जिस किरकार को बलि का बकरा बनाने का ताना बाना बुना जाता है, उस गूंगे किरदार को अमिताभ बच्चन ने निभाया था। किरदार का नाम था छोटू नाम की प्रकृति के अनुरूप फिल्म में उस छोटू का किरदार भी काफी छोटा था। लेकिन परोक्ष तौर पर चर्चाओं और संवादों में उस किरदार की मौजूदगी कहानी में काफी देर तक बनी रहती है। फिल्म खत्म होने से कुछ समय पहले इसी छोटू का मूक अभिनय सबको चकित कर देता है। एक ऐसा मूक अभिनय जो काफी मुखर हो उठता है। राखी अपने पति की हत्या का बदला लेने के लिए तलवार उठाकर अमिताभ के सिर पर वार करना ही चाहती है। गूंगा छोटू गमसुम खड़ा है। मौत को सामने देख रहा है। फिर भी उसके चेहरे पर ना तो तनाव है और ना ही कोई भय। उसे यह बताकर यहां लाया गया है कि वह राखी के पति की हत्या का इल्जाम अपने सर पर ले ले। राखी की तनी तलवार उसकी गर्दन पर चलने ही वाली होती है लेकिन वहीदा रहमान का संवाद उसे रोक लेता है कि क्या इसकी हत्या से तुम्हारा पति वापस मिल जाएगा’? इस पर हतप्रभ छोटू राखी के पैरों तले लोटने लगता है और इशारों-इशारों में खुद को खत्म करने को कहता है। तकरीबन पांचेक मिनट के इस सीन में ही अमिताभ ने अपनी जिस प्रतिभा का परिचय दिया है, वहीं सीन में मौजूद अन्य कलाकारों के चेहरे पर उभर रहे भावों में उसे समझा जा सकता है। वह गूंगा था लेकिन उसके अभिनय में मानों जोशीले संवाद भरे हुये थे। उसी सीन में अमरीश पुरी का प्रकट होना और अमिताभ का उनके गले से लिपटकर खुद को खत्म करने की इल्तजा भरी अदायगी दिखाना  प्रतिभा के पूर्वाभास को प्रकट करता है।
72 का भटकाव
वस्तुत: अमिताभ की ये शुरुआती दोनों ही फिल्में उन्हें आगे काम मिलने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। लेकिन नायक की भूमिका का अब भी इंतजार था। खुद को बतौर नायक अभिनेता के तौर पर प्रदर्शित करने के अवसर की अब भी तलाश थी।
बहरहाल एक नवोदित के तौर पर गुड्डी’ (1971) में कैमियो रोल अदा करने के बाद अमिताभ फिर से दिखे संयोग (1972) में और फिर उसी साल परवाना में। संयोग में अमिताभ छलिया प्रेमी तो परवाना में खूनी आशिक की भूमिका में नजर आते हैं। पहले जिन फिल्मों में संवाद अदायगी की अपनी सीमाएं थीं, वहां इन फिल्मों में उनके संवाद पहले से खुल कर सामने आये। वही आवाज़ और उस अंदाज़ की वही खनक जो बाद की फिल्मों में सुनाई देती। वही अंग संचालन यानी बॉडी लेंग्वेज जो बाद की फिल्मों में दिखाई देती है। कुछ भी अलग सा नहीं।  
इसी साल आई तनुजा के साथ प्यार की कहानी (1972) और नूतन के साथ सौदागर’; ये दोनों अभिनेत्रियां उस दौर में स्थापित अभिनेत्रियां कहलाती थीं। इनके साथ स्क्रीन शेयर करने में अमिताभ वैसे ही सहज नजर आये जैसे कि बाद के दिनों में नई अभिनेत्रियों के साथ।
सौदागर में गुड़ विक्रेता के तौर पर अमिताभ ने बहुत ही सरल भूमिका निभाई थी। नूतन की कलात्मकता की ऊंचाई का संतुलन उसी तरह बनाये रखा था जिस तरह आनंद में राजेश खन्ना के सुपरस्टारत्व के आगे। सौदागर फिल्म अगर अस्सी के दशक में बनती तो इसे कला सिनेमा की श्रेणी में रखा जाता। बिज़नेस नहीं चलने पर अमिताभ की क्रुद्धता को देखिये और अभिमान या मिली में  उनके  चिड़चिड़े मिजाज वाले किरदार से उसकी तुलना कीजिये। आपको अभिनय के ग्राफ में कुछ भी अंतर नहीं दिखेगा। सिवाय इसके कि एक असफलता का दौर था दूसरा सफलता का।
वास्तव में सन् 1972 अमिताभ के लिए संवाभनाओं का द्वार खोलने वाला साल नजर आता है तो भटकाव का सफर भी यहीं दिखता है। जिस तरह रेशमा और शेरा में उन्हीं की तरह संघर्ष कर रहे विनोद खन्ना नजर आये थे उसी तरह रास्ते का पत्थर में तब के संघर्षवान व ऊर्जावान कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा उनके साथ थे। काला पत्थर और नसीब की भूमिका मानों तैयार हो रही थी। रेशमा और शेरा में विनोद खन्ना को अमिताभ से ज्यादा बड़ा रोल दिया था। ऐसा रोल जोकि सुनील दत्त के किरदार से मुकाबला करता है। बाद में अमिताभ और विनोद खन्ना की साथ भूमिकाओं वाली कई हिट फिल्में आईं। ये वक्त बदलने के बाद के हालात थे।
यहां एक तथ्य पर गौर करना जरूरी हो जाता है। ज़ंजीर से पहले अमिताभ के कैरियर ग्राफ को जब हम देखते हैं तो सबसे बड़ा अचरज यह जानकर होता है कि सन् 1972 में उनकी तकरीबन पांचेक फिल्में रिलीज होती हैं। निष्चय ही यह आंकड़ा उनकी असफलता को कत्तई साबित नहीं करता। दिलचस्प बात तो ये कि उन पांचों फिल्मों में हमें 1978-80 वाले अमिताभ नज़र आते हैं। अंतर कहानियों, स्क्रीन प्ले, डायलॉग और निर्देशन में थे। अमिताभ वही थे, उनकी अदायगी वही थी, वही सेंस ऑफ ह्यूमर उत्पन्न करने वाला हाव भाव था और अभिनेत्रियां भी वही थीं। 72 के इस आंकड़े का अनुपात आगे भी जारी रहता है। एक साल में कभी छै फिल्में तो कभी सात फिल्में।
73 की तासीर
सन् 1973 में मात्र ज़ंजीर रिलीज नहीं हुई थी। सन् 1973 में ही बंधे हाथ और गहरी चाल आ चुकी थी। और ये दोनों ही फिल्में ज़ंजीर से तुरंत पहले आई थी। दोनों फिल्मों को अगर आप गौर से देखें तो अहसास हो जाता है कि लंबी काया, लंबे बाल, बड़ी आंखें, चिकने चुपड़े लंबे चेहरे और घनी आवाज़ वाला यह अभिनेता किसी विस्फोटक द्वार पर खड़ा है। बंधे हाथमें तब की सुपर स्टार अभिनेत्री मुमताज ने अमिताभ के साथ काम करना गंवारा समझा था। यह देखते हुये कि इससे पहले अमिताभ के साथ तनुजा और नूतन भी काम कर चुकी थीं। हालांकि बंधे हाथ शुरू से अंत तक देखिये तो मुमताज अमिताभ के साथ सहजता से अभिनय करती हुई नहीं प्रतीत होती है। उन पर अपने शिखर के ग्लैमरत्व का गुरूर भाव नजर आता है। मुमताज अमिताभ के साथ वैसी कैमेस्ट्री नहीं बना पातीं जैसा कि राजेश खन्ना के साथ बनाती दिखती हैं। लेकिन इसके बरअक्स अमिताभ पर इस भाव का कोई प्रतिक्रियात्मक असर नहीं दिखाई देता। कोई अचरज नहीं कि यही भाव गहरी चाल में जितेंद्र के चेहरे पर नजर आता है। फिल्म में जिसकी हीरोइन हेमा मालिनी है। पूरी फिल्म में जितेंद्र की बॉडी लेंग्वेज बताती है वह अमिताभ के साथ स्क्रीन शेयर नहीं करना चाहते थे। आखिर इसे कैसा संयोग कहा जाये कि आगे चलकर हम अमिताभ और जितेंद्र को फिल्म में साथ-साथ नहीं देखते सिवाय मिले सुर मेरा तुम्हारा के कौमी एकता के तराने में। इस मामले में राजेश खन्ना ने सिल्वर स्क्रीन पर अपनी अभिनय कला में उदात्तता दिखाई और आनंद ही नहीं बल्कि नकम हराम में भी उन्होंने अमिताभ के किरदार को पूरी मजबूती से उभरने दिया। यही काम किया शशि कपूर ने पहली बार दीवार में किया और धर्मेंद्र मे शोले में; यह क्रम उनकी आगे की फिल्मों में भी जारी रहा।

"...ये पुलिस स्टेशन है तुम्हारे बाप का घर नहीं...sss" ('ज़ंजीर' से)

कहां था  इंस्पेक्टर विजय खन्ना’?
अहम सवाल अब भी शेष है कि ज़ंजीर अगर 1969 या 71 में बनती और उसके हीरो अमिताभ होते तो क्या होता? क्या परवाना, बंधे हाथ, संयोग’, ‘प्यार की कहानी आदि फिल्मों में अमिताभ के किरदार का मिजाज बदला गया होता? जैसा कि ज़ंजीर और दीवार के हिट होने के बाद अमिताभ के खाते में आने वाली फिल्मों की कहानी और किरदार का मिजाज अमिताभ के स्क्रीन परसेप्शन और अपीयरेंस के मुताबिक लिखा जाने लगा था। ऐसी क्या वजह थी कि सलीम-जावेद जोड़ी ने सन् 73 से पहले विजय खन्ना नाम के इस प्रतिरोधी किरदार की कल्पना नहीं की? जहां का नायक अपना बदला खुद लेना चाहता है। तब सलीम-जावेद राजेश खन्ना के लिए कुछ फिल्में लिख चुके थे, लेकिन क्या उन्हें राजेश खन्ना की शख्सियत में उस ऊर्जा या आग की तलाश अब भी थी, जिसे उन्होंने बॉम्बे टू गोवा के सेट पर अमिताभ में देखा था। जावेद अख्तर खुद इस बात को कुबूल कर चुके हैं कि उन्होंने पहली ही नज़र में अमिताभ के भीतर की बेचैनी को महसूस कर लिया था। शायद तभी उनके मन में यह बात आ गई होगी कि भविष्य में जिस तरह के नायक को वो सिल्वर स्क्रीन पर उतारना चाहते हैं उसके लिए यही सबसे उपयुक्त कलाकार है। ज़ंजीर में विजय खन्ना के भीतर जो एंगर था और बदला लेने की जो तीव्र भावना थी, उसे अमिताभ की निजी जिंदगी में तकरीबन एक दशक की उतार चढ़ाव भरी हताश अवधि ने जीवंत बनाया था। फिल्म में विजयका किरदार तेजा से बदला लेता है लेकिन वास्तविक जिंदगी में अमिताभ उन लोगों के सामने खुद को साबित कर रहे होते हैं जिन्होंने परीक्षाओं के दौर ने उनको रिजेक्ट कर दिया था। ज़ंजीर का वो डायलॉग कि–जब बैठने को न कहा जाये शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं।
हिन्दी सिनेमा के इतिहास का यह पहला ऐसा डायलॉग और शॉट था, जिसमें दर्शकों को स्क्रीन पर धधकती ज्वाला-सी महसूस होती है। पूरे स्क्रीन पर अमिताभ का उबलता हुआ चेहरा, आग उगलती आंखें, भिंचे हुए दांत, तलफलाते हुए नथुने और जबड़े ने दर्शकों के वैसा थ्रिल भर दिया, जिसे लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था। आगे चलकर पूरी फिल्म में तेजा किरदार के सामने भी अमिताभ का वही तेवर बरकरार था, जिसने दर्शकों के भीतर सुप्त पड़े जोश को जगा दिया था। वास्तव में ज़ंजीर के माध्यम से अमिताभ ने रुंमानी ख्यालों में खोये रहने वाले बॉलीवुड को झकझोर कर जगा दिया था।
अमिताभ के अभिनय का ये टेम्परामेंट तब तक जारी रहा जब तक कि उन्होंने खुद को शिखर पोजीशन पर स्थापित नहीं कर लिया। फिल्मों में एंग्री यंग मैन का किरदार सलीम-जावेद ने बुना लेकिन उस व्यक्ति के भीतर का एंगर उसका खुद का था। और इन दोनों का मिलन हिन्दी सिनेमा के इतिहास का महासंयोग था। 

संजीव श्रीवास्तव
अगर ये महासंयोग चार साल पहले हुआ होता तो संभव है तब के कई चमकते सितारों का सूरज कुछ पहले ही अस्ताचलगामी हो गया होता। यानी ज़ंजीर से पहले की अमिताभ अभिनीत केवल फिल्में असफल हुईं, अमिताभ ने इन फिल्मों में उसी तरह से अपना सौ फीसदी दिया जैसा कि बाद की फिल्मों में। अगर इंस्पेक्टर विजय खन्ना का वो किरदार पहले पैदा हुआ होता तो इंकलाब पहले आ सकता था!  

*लेखक पिक्चर प्लस के संपादक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क - Email : pictureplus2016@gmail.com  

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