बिजली विभाग की बत्ती गुल कर देने वाली फिल्म - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 22 सितंबर 2018

बिजली विभाग की बत्ती गुल कर देने वाली फिल्म


फिल्म समीक्षा
बत्ती गुल मीटर चालू
निर्देशक - श्री नारायण सिंह
कलाकार - शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम, सुष्मिता मुखर्जी


*रवींद्र त्रिपाठी
उत्तराखंड में बोलते समय वाक्य के आखिर में `बलशब्द का काफी इस्तेमाल होता है। चूंकि `बत्ती गुल मीटर चालू में उत्तराखंड की कहानी है इसलिए इसमें भी किरदार `मैं आया बल’, `मैं आऊंगी बल जैसे वाक्यों का काफी इस्तेमाल करते हैं। पर इससे ये न समझा जाए कि ये फिल्म उत्तराखंडियों को ही पसंद आएगी। चूंकि इसकी कहानी बिजली बिल अनाप शनाप बढ़कर आने से जुड़ी है इसलिए पूरे देश के दर्शक इससे जुड़ेंगे। उसी तरह जिस तरह निर्देशक श्री नारायण सिंह की पिछली फिल्म `टायलेट- एक प्रेम कथा उत्तर प्रदेश के एक गांव पर केंद्रित होने के बावजूद हर जगह पसंद की गई थी।
फिल्म की कहानी
यहां एक प्रेम त्रिकोण भी है। एक लड़का है सुशील कुमार पंत (शाहिद कपूर)। नाम सुशील जरूर है लेकिन शील नाम की चीज नहीं है। वैसे तीरंदाजी अच्छी करता है और पेशे से वकील है। लेकिन मुख्य धंधा है लोगों से ब्लैकमेल करना और पैसा बनाना। उसका एक दोस्त है सुंदर त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा)। सुंदर शरीफ लड़का है। पर सुशील और सुंदर में जबर्दस्त दोस्ती है। सबसे खास बात है कि दोनों की एक कॉमन गर्लफ्रेंड है ललिता नौटियाल (श्रद्धा कपूर), जिसे घर और दोस्तों मे नॉटी नाम से पुकारा जाता है। तीनों तय करते हैं कि नॉटी एक एक हफ्ते क्रम से सुशील और सुंदर से डेटिंग करेगी और इस दौरान जिसे पसंद करेगी उसी से शादी कर लेगी। डेटिंग के दौरान नॉटी सुंदर के ज्यादा करीब हो ही रही होती है। सुशील को अच्छा नहीं लगता है। तभी एक हादसा होता है। सुंदर एक प्रेस लगाता है और उस प्रेस में बिजली का बिल इतना आने लगता है कि उसे चुकाना मुश्किल हो जाता है। हताश सुंदर अपने स्कूटर समेत गंगा में छलांग लगा देता है। अब सुशील क्या करेगा? बिजली विभाग के खिलाफ अपने दोस्त का मुकदमा अदालत में लड़ेगा या नहीं?
निर्देशन और अभिनय
फिल्म आम जनजीवन की एक बड़ी समस्या से जुड़ी है। शायद ही देश में ऐसी कोई जगह हो जहां बिजली वितरण का निजीकरण किया गया हो और फिर उपभोक्ताओं के पास बड़ी राशि के बिल नहीं आते हों। शिकायत का कोई खास असर नहीं होता। निर्देशक ने इस समस्या को फिल्म में जोरदार ढंग से उठाया है। वैसे निर्देशक ने अदालती दृश्य को संजीदा बनाने के साथ साथ उसे हास्य से भरपूर भी बना दिया है। खासकर बतौर वकील के रूप में शाहिद ने खूब हंसाया है। बिजली कंपनी की वकील के रूप में यामी गौतम भी शुरू में जमती है। लेकिन बाद मे उनका चरित्र कमजोर हो गया है। शाहिद के चरित्र को असरदार बनाने के लिए निर्देशक ने यामी के साथ थोड़ी ज्यादती कर दी है। श्रद्धा कपूर एक कस्बाई लड़की की भूमिका में सहज और उत्फुल्ल लगी है। और दिव्येंदु शर्मा ने अपनी फिल्मी जिंदगी का सबसे अच्छा रोल किया है। पहाड़ी हिंदी का स्वाद भी मिलता है।
लेखक चर्चित कला विशेषज्ञ व फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क - 9873196343

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