गायक किशोर कुमार की शादी क्यों टूट जाती थी? किसलिए करनी पड़ी चार शादियां ? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 23 सितंबर 2018

गायक किशोर कुमार की शादी क्यों टूट जाती थी? किसलिए करनी पड़ी चार शादियां ?

माधुरी के संस्थापक – संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता ; भाग 49
 
अपनी चार पत्नियों के कोलाज के बीच किशोर कुमार
(बेरहम दुनिया में किशोर कुमार के असली गहरे दोस्त - जनार्दन, ’‘रघुनंदन, ’‘गंगाधर, ’‘जगन्नाथ, ’‘बुद्धूराम)
पिछली 48वीं क़िस्त में आपने पढ़ा किशोर कुमार की गंभीर फ़िल्म दूर गगन की छांव में के बारे में। इस बार भी मैँ बात दूर गगन से ही शुरू करना चाहता हूं। और जो मैं लिख रहा हूं वह स्वयं किशोर का कहा है:“अलंकार सिनेमा में दूर गगन की छांव का पहला शो था। पूरे हाल में कुल दस जन थे। दरअसल सिनेमाघर मेरे बहनोई शशधर मुखर्जी के भाई सुबोध मुखर्जी की अप्रैल फ़ूल के लिए आठ हफ़्तों के लिए बुक था। उसकी बड़ी हवा थी, सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी वग़ैरा। दयावान बनते सुबोध ने मुझे यह एक हफ़्ता इनायत फ़रमाया था। कुल दस जन देखकर सुबोध ने मुझे दिलासा दिया। कोई बात नहीं कभी कभी ऐसा हो जाता है!’ पर पासा पलट गया। मेरी फ़िल्म में भीड़ पर भीड़ आने लगी। आठ हफ़्ते - हाउस फ़ुल! आठ हफ़्तों की बुकिंग पूरी हो गई तो सुपर सिनेमा में 21 हफ़्ते और चली। फ़िल्म अजीब चीज़ है। चलती है तो चलती है और पिटती है तो बस पिट जाती है जैसे सुबोध मुखर्जी की अप्रैल फ़ूल!”
-पिछली बार मैंने उसकी पहली पत्नी से तलाक़ के बारे में भी लिखा था। सत्यजित रे की भतीजी रूमा गुहा ठाकुर्ता प्रसिद्ध गायिका थीं और गायिका ही रहना चाहती थीं। अपना गायक मंडल जारी रखना चाहती थीँ। किशोर चाहता था कि वे सच्ची गृहिणी बन कर रहें। यही दोनों में टकराव का कारण था और यही तलाक़ का कारण बना। दोनों का बेटा अमित कुमार आज सफल गायक और संगीतकार है।
-दूसरी शादी से पहले ही किशोर को मधुबाला की बीमारी का पता था। उसने कहा है, वादा आख़िऱ वादा होता है, निभाना होता है। मैंने वादा निभाया, शादी की। नौ साल तक मैं उसे मरते देखता रहा। बिना भोगे यह हालत दूसरे नहीँ समझ सकते। कित्ती सुंदर थी वह! दर्द से चीख़ती, मैं कुछ कर नहीं सकता था। डॉक्टर कहते उसे ख़ुश रखो। उसके अंत (23 फ़रवरी 1969) तक मैं उसकी सेवा करता रहा। उसके साथ हंसता, उसके साथ रोता रहा।
-1976 में बनी तीसरी बीवी योगिता बाली ने दो साल बाद मिथुन चक्रवर्ती के लिए किशोर को तलाक़ दिया तो लीना चंदावर्कर उसके जीवन में स्थायी सहारा बन कर आई।
कर्णाटक के सुंदर प्रदेश धारवाड़ में जन्मी लीना का आदर्श थीं मीना कुमारी और उनकी दुखभरी फ़िल्में। पुरातनपंथी सारस्वत ब्राह्मण पिता श्रीनाथ चंदावर्कर ने फ़िल्मों की दीवानी बेटी को टेलैंट कंटैस्ट में भाग लेने से रोका तो उसने कोर्स की किताबें फेंक दीं। कंटैस्ट में  राजेश खन्ना और फ़रीदा जलाल के बाद उसी का नंबर था। पर पंद्रह साल की वह बेबी क़रार दे दी गई थी। विज्ञापनों में दिखाई देती रही और सुनील दत्त की मन का मीत में पहली बार परदे पर आई। सफलता के चरम पर थी कि गोवा के मुख्यमंत्री दयानंद बंडोडकर के बेटे सिद्धार्थ से अरेंज्ड मैरिज स्वीकार कर लिया, सिनेजगत छोड़ दिया। पर 25 साल की उम्र में विधवा हो गई। ससुराल में वह मांगलिकऔर अशुभ जैसे ताने सहती रही। विषाद से उभरी तो सन् 1980 में किशोर कुमार की सच्ची जीवन संगिनी बन गई। दोनों के एक पुत्र हुआ सुमीत कुमार। वह पांच साल का था तो छत्तीस साल की उमर में लीना फिर विधवा हो गई। किशोर के बाद लीना ने उसका बंगला आबाद रखा। वहां रहते हैं पहली पत्नी रूमा के बेटे अमित कुमार और उसकी पत्नी रीमा और बेटी मुक्तिका, लीना का बेटा सुमीत कुमार। उसी बंगले में किशोर की पहली पत्नी बूढ़ी बीमार रूमा की तीमारदारी भी लीना ही करती।
किशोर कुमार का अंतिम दिन लीना के शब्दों में:
15 अक्तूबर (1987)। वे कुछ पीले पीले दिख रहे थे। मैंने जगाया। बोले, डर गईं? आज मेरी छुट्टी है। सुबह उनकी कई मीटिंग थीं। लंच पर उन्होंने कहा, शाम को रिवर आफ़ नो रिटर्न फ़िल्म देखेंगे। कुछ देर बाद उनके कमरे से फ़र्नीचर हिलाने की आवाज़ आई। मैं गई। बिस्तर में लेटे थे। बोले, कुछ कमज़ोरी सी है। मैं डॉक्टर बुलाने दौड़ी तो बोले, डॉक्टर बुलाओगी तब तक मुझे हार्ट अटैक हो जाएगा। बस यही थे उनके अंतिम शब्द। आंखें खुली थीं। मैं समझी हमेशा की तरह नाटक कर रहे हैं। पर सचमुच यह अंत ही था।
58 साल की उम्र में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के लिए किशोर का शव उसके प्रिय जन्मस्थान खंडवा ले जाया गया था।
 
किशोर कुमार अपनी पहली पत्नी रुपा गुहा ठाकुर्ता के साथ
-अब ज़ायक़ा बदलने के लिए कुछ हरक़तें किशोर कुमार की---
अपनी हरक़तों के बारे में किशोर कुमार ने प्रीतीश नंदी से कहा था,मैं न तो सिगरेट पीता हूं, न शराब, न ही पार्टियों में जाता हूं। अपने में ख़ुश रहता हूं। काम से सीधा घर आता हूं। भुतहा फ़िल्मों का मज़ा लेता हूं। पेड़ों से बात करता हूं, उन्हें गीत सुनाता हूं। लालची दुनिया में हर क्रिएटिव आदमी अकेला पड़ जाता है। अकेलापन मेरा अधिकार है। इसमें ग़लत क्या है? मेरे बारे में जो ऊटपटांग बातें की जा रही हैँ, वे शुरू हुईं एक महिला रिपोर्टर से। उन दिनों मैं निपट अकेला था। वह बोली, अकेलापन आप को काटता नहीँ। मैं ने कहा,‘चलो तुम्हें अपने दोस्तों से मिलवाता हूं। बाग़ में कुछ दोस्त पेड़ों से मिलवाया –‘जनार्दन, ’‘रघुनंदन, ’‘गंगाधर, ’‘जगन्नाथ, ’‘बुद्धूराम, ’‘झटपट झटपट पटपट। मैंने कहा ये हैं बेरहम दुनिया में मेरे असली गहरे दोस्त। और उस पत्रकार ने क्या किया? एक अटपटा बेवकूफ़ाना लेख लिख मारा – मैं देर रात तक पेड़ों से चिपका रहता हूं। अब कोई बताए पेड़ों से दोस्ती में बुरा क्या है।
किशोर के बारे में मशहूर है कि वह अपनी पूरी फ़ीस वसूलने में पक्का था। पर यह भी उतना ही सही है कि एक बार काम निकल जाए तो निर्माता कलाकारों की फ़ीस अदा करना भूल जाते हैं। जब तक सेक्रेटरी यह न कह दे कि पूरा पैसा वसूल हो गया है, वह गाने की रिकार्डिंग शुरू नहीँ करता था।
एक बार उसे पता चला कि पूरा पैसा नहीं मिला है तो चेहरे का मेकअप एक तरफ़ करवा के जा पहुंचा शूटिंग पर। निर्देशक ने पूछा तो किशोर ने जवाब दिया –आधा पैसा आधा मेकअप।”‘भाई भाई की शूटिंग पर पता चला कि निर्देशक एम. वी. रामन पर पांच हज़ार बक़ाया हैं। किशोर ने काम करने से इनकार कर दिया। बड़े भाई अशोक कुमार ने सीन पूरा करने को कहा तो राज़ी हुआ, पर – कुछ क़दम चल कर बतौर डायलॉग बोला, पांच हज़ार रुपैया, कलाबाज़ी लगाई। स्टूडियो से बाहर निकल गया।
निर्माता आर.सी. तलवार पर बार बार याद दिलाने पर भी पैसे बक़ाया थे। किशोर कुमार सुबह सुबह उसके घर जा धमकता और चीख़ता, हे तलवार, दे दे मेरे आठ हज़ार। आख़िर तलवार ने पैसे दे ही दिए।
(यहां मैं हृषिकेश मुखर्जी और आनंद फ़िल्म वाल मशहूर क़िस्सा नहीं दे रहा हूँ। वह आप पढ़ेंगे कभी और - अमिताभ वाले प्रकरण में।)
इसके उलट ऐसे क़िस्से भी हैँ जब किशोर बिना पैसे काम कर देता था जैसे राजेश खन्ना व डैनी डैनज़ोंग्पा निर्मित फ़िल्मों में।
और ढेरों क़िस्से हैं किशोर के। वार्डन रोड वाले फ़्लैट के बाहर उसने बोर्ड लगा रखा था –किशोर कुमार से सावधान!”
एक अजीब क़िस्सा यूं है: प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक ऐच.ऐस. रवेल उसका कुछ पैसा वापस करने गए थे। किशोर ने पैसे तो ले लिए, लेकिन रवेल ने मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया तो किशोर ने काट खाया। बोला, बोर्ड नहीं पढ़ा क्या –किशोर कुमार से सावधान!’ ” हंस कर लौटने के अलावा रवेल और कर भी क्या सकते थे।

अरविंद कुमार
बॉलीवुड के बड़े निर्माता जी.पी. सिप्पी के गाने की रिकार्डिंग होनी थी। समय पर वे किशोर के बंगले पर पहुंचे। किशोर गाड़ी में बाहर निकलता दिखाई दिया। सिप्पी ने रुकने को कहा तो किशोर ने गाड़ी तेज़ दौड़ा दी। पीछा करते सिप्पी मड आइलैंड तक गए। वहां खंडहर क़िले के पास किशोर ने गाड़ी रोकी। सिप्पी ने कहा यह क्या बात हुई। किशोर ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। अगले दिन समय पर रिकार्डिंग पर पहुंच गया। ग़ुस्से से लाल सिप्पी ने पिछले दिन की याद दिलाई तो बड़ी सादगी से किशोर ने कहा, आपने सपना देखा होगा। कल तो मैं खंडवा में था।
एक निर्माता ने किशोर पर केस कर दिया तो कोर्ट का आदेश हुआ, किशोर को निर्देशक के आदेशों का हूबहू पालन करना होगा। किशोर ने आदेश सिर माथे लिया। कार ड्राइव करने का सीन था। किशोर कार चलाता खंडाला जा पहुंचा। कारण - निर्देशक कट कहना भूल गया था।
  
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लसके लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस)    

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