मौजी की स्वदेशी मैक्सी पर फिदा भारतीय मनमौजनियां - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 29 सितंबर 2018

मौजी की स्वदेशी मैक्सी पर फिदा भारतीय मनमौजनियां


फिल्म समीक्षा
सुई धागा
निर्देशक शरत कटारिया
कलाकार - वरुण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुवीर यादव आदि।



*रवींद्र त्रिपाठी
`सुई धागा कारीगरी, खासकर हथकरघा और बुनकरी का सम्मान करनेवाली फिल्म है। अंग्रेजी राज ने भारत मे सबसे अधिक यहां के देसी वस्त्र उद्योग को खत्म किया था। इस दौरान भारत के किसान तो तबाह हुए ही बुनकरी भी बर्बाद हुई। बुनकरी के साथ दूसरी बड़ी त्रासदी ये हुई कि व्यापक सामाजिक चेतना में भी ये हाशिए पर चली गई। इस लिहाज से `सुई धागा एक बड़ी सकारात्कम फिल्म है। ये देश का भद्रलोक शायद इसे उतना पसंद न करे लेकिन शहरों से लेकर गावों में निराशा की जिंदगी जी रहे कारीगरों और या पूर्व कारीगर समाज में ये लोकप्रिय होगी। हालांकि आखिर मे इसमें शहरी समाज को लुभाने के नुस्खे भी इस्तेमाल हुए हैं।
फिल्म की कहानी
फिल्म में वरुण धवन ने मौजी नाम के युवक का किरदार निभाया है। मौजी एक सिलाई मशीन बेचनेवाले के यहां काम करता है। नौकरी करने के साथ साथ उसे कभी कुत्ता तो कभी बंदर की एक्टिंग करके अपने मालिक का मनोरंजन भी करना होता है। पर ये बात उसकी गऊ जैसी सीधी सादी पत्नी ममता (अनुष्का शर्मा) को पसंद नहीं। पत्नी कहती है कि मौजी अपने हुनर का इस्तेमाल क्यों नहीं करता? हुनर क्या?  वो ये कि मौजी सिलाई मशीन पर फटाफट नए कपड़े सिल देता है। नए डिजाइन के। जब मौजी की मां बीमार होकर अस्पताल चली जाती है तो मौजी अस्पताल में उसके पहनने के लिए रातों रात एक शानदार एक मैक्सी सिल देता है, जिसे देखकर अस्पताल के दूसरे मरीज उसकी मांग करने लगते हैं। ये देखकर मौजी और ममता को लगता है कि इसी सिलाई के हुनर से रोजगार पैदा किया जाए। पर राह में कई रूकावटें हैं। माता-पिता भी सहयोग देने को तैयार नहीं। भाई-भाभी भी विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि मौजी किसी के यहां छह-आठ हजार की नौकरी कर ले। अब मौजी और ममता क्या करें? क्या उनके सपने पूरे हो पाएंगे? यानी  फैशन की दुनिया में बड़ा नाम कमाने का।


अभिनय और निर्देशन
`सुई धागा की एक बड़ी खूबी ये है कि इसमें ग्लैमर का तत्व नहीं के बराबर हैं। गाने जरूर हैं लेकिन ड्रीम सीन की तरह किसी वादी या पार्क के नहीं। बसों में चढ़ने के लिए धक्के खानेवाले लोगों के सपनों की सफलता की कहानी है ये फिल्म। वरुण धवन और अनुष्का शर्मा-दोनों ने अतिसामान्य परिवार वालों का किरदार निभाया है। निर्देशक शरत कटारिया दर्शकों को उस गली में ले गए हैं जहां नलों में पानी भी ठीक से नहीं आता और नौजवान पति पत्नी के रहने के लिए ठीक से कमरे भी नहीं हैं। फिल्म एक सामूहिक चेतना की जरूरत को दिखाती है। यानी अगर लोग सामूहिक भावना से काम करें तो कई लोगों की जिंदगी बदल सकती है। हालांकि ये आज के जमाने में खोखला आदर्शवाद लग सकता है पर इसकी जरूरत भी समाज को रहती है। फिल्म हल्के फुल्के मजाक से भरी है लेकिन इसमें कई ऐसे जज्बात भी हैं जो आम आदमी की जिंदगी में हर रोज मिलते हैं।
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क- 9873196343

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