'लैला मजनू' मतलब जितना पागलपन, उतनी अदायगी और उतना ही ड्रामा वरना... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 8 सितंबर 2018

'लैला मजनू' मतलब जितना पागलपन, उतनी अदायगी और उतना ही ड्रामा वरना...

फिल्म समीक्षा
लैला – मजनू
निर्देशक - साजिद अली
कलाकार – अविनाश तिवारी, तृप्ति डिमरी, मीर सरवर, सुमित कौल


*रवींद्र त्रिपाठी
जिन लोगों ने 2014 में `युद्ध नाम के टीवी सीरियल में अविनाश तिवारी को खलनायकी वाले अंदाज में देखा होगा उनके लिए ये सोचना मुश्किल होगा कि वे एक रोमांटिक हीरो का किरदार भी निभाएंगे। और कोई छोटा मोटा रोमांटिक हीरो का नहीं बल्कि मजनू का। हां, जगत विख्य़ात लैला-मजनू वाले मजनू का। लेकिन युवा निर्देशक साजिद अली (इम्तियाज अली के छोटे भाई) ने ये दुस्साहस कर दिया। है आज के कश्मीर की पृष्ठभूमि में बनाई गई `लैला-मजनूं में लैला बनी हैं तृप्ति डिमरी।
फिल्म की कहानी
होता ये है कि कश्मीर के एक होटल मालिक का बेटा कैस भट्ट (अविनाश तिवारी) पर फिदा हो जाती है लैला (तृप्ति)। लैला कॉलेज में पढ़नेवाली लड़की है। उसे इश्किया एडवेंचर पसंद है। इसी एडवेंचर में उसकी मुलाकात कैस भट्ट (प्रसंगवश ये बता दिया जाए कि मजनूं का एक नाम कैस भी था) नाम ने एक बिगड़े हुए शोहदे से होती है। कैस भट्ट के पिता शहर के एक नामी होटल के मालिक है। कैस के कई लड़कियों से रिश्ते होने के किस्से शहर में मशहूर है। लेकिन इश्क तो वो आग है जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे। सो लैला और कैस के दिलों में ये आग लग जाती है और दोनों एक दूजे के होने के लिए बेकरार हो जाते हैं। लेकिन परिवार और जमाने ने न तब के लैला मजनूं को मिलने दिया था और न अब मिलने देते हैं। इसलिए मजनू का दीवाना होना लाजिमी था क्यों कि लैला किसी और की हो जाती है। इसलिए अंत तो लगभग वैसा ही हुआ है जैसा लैला मजनू की कहानी में होता है। फर्क सिर्फ ये है कि मजनू के प्रेमी किस्सा जिस तरह दिखाया गया है वहीं विश्वसनीयता नहीं है। इसके अलावा दोनों परिवारों के बीच अदावत वाले मामले को किसी तरह निपटा दिया है साजिद अली ने।
निर्देशन व अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कश्मीर की कुदरती सुंदरता के नजारे। ऐसा बहुत दिनों के बाद किसी हिंदी फिल्म में हुआ है। कुछ गाने भी अच्छे हैं। तृप्ति डिमरी मासूम लगीं है उनकी शरारती अदाएं भी दिल को लुभाती हैं। लेकिन प्रेम में तड़पती लैला को ठीक से नहीं पेश किया गया है। अविनाश तिवारी प्रेमी के रूप में अपनी छाप तो नहीं छोड़ते लेकिन दीवाना बन के कश्मीर की वादियों में पागल बनके भागने वाले शख्स के रूप में वे दर्शक के दिल की गहराइयों में उतर जाते हैं। काश, निर्देशक ने थोड़ा और काम किया होता।

 *लेखक वरिष्ठ कला और फिल्म समीक्षक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क 9873196343


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