मां चाहे जिस उम्र में बनें, बधाई तो बनती है - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

मां चाहे जिस उम्र में बनें, बधाई तो बनती है


फिल्म समीक्षा
बधाई हो !
निर्देशक - अमित शर्मा
कलाकार - आयुष्मान खुराना, सान्या मल्होत्रा, नीना गुप्ता, गजराज राव, सुरेखा सीकरी आदि।


*रवींद्र त्रिपाठी
कभी कभी कुछ सामाजिक धारणाएं ऐसी हो जाती हैं कि आदमी शर्मशार होने लगता है। हालांकि ऐसा होने की कोई ठोस वजह नहीं होती। लेकिन हम सभी सामाजिक दायरे में जीते हैं और समाज का ढंग ऐसा है कि कुछ मान्यताएं बन जाती हैं। जैसे प्रौढ़ उम्र में मां-पिता बनना सामान्य नहीं माना जाता। खासकर अगर आपके बच्चे बड़े और शादी की उम्र के हो गए हैं तो। और जब बड़ा लड़का अपने गर्लफ्रेंड के साथ भावी जिंदगी की तैयारी कर रहा हो तो ऐसी खबर सुनकर उस पर क्या बीतेगी? पास पड़ोस वाले क्या कहेंगे?
फिल्म की कहानी
` बधाई हो में यही होता हो। पिता जीतेंदर कौशिक (गजराव राव) रेलवे में टीटी है। रिटारमेंट के करीब पहुंच चुका है। कविता भी लिखता है। उसके दो बेटे हैं। बड़ा यानी नकुल ((आय़ुष्मान खुराना) तो नौकरी कर रहा है। छोटा स्कूल में पढ़ रहा है। कौशिक की मां (सुरेखा सीकरी) भी उसके साथ दिल्ली के लोदी कॉलोनी वाले  सरकारी मकान में रहती है। तभी परिवार में धमाका जैसा होता है जब सबको पता चलता है कि कौशिक की पत्नी प्रियंवदा उर्फ बबली (नीना गुप्ता) मां बनने वाली है।  इसके बाद तो पति-पत्नी भी घर में शरमाए-शरमाए से रहते हैं। कौशिक की मां भी ताने कसती है। और नकुल अपनी गर्लफेंड के रिने (सान्या मल्होत्रा) सामने शर्मिंदा महसूस करता है। हालांकि रिने कहती है कि इसमें शर्माने की क्या बात है, पर नकुल की असहजता खत्म नहीं होती। वो रिश्तेदारों से लेकर दोस्तों से मिलने से कतराता रहता है। अब क्या होगा?  क्या घर में नया सदस्य इसी माहौल में आएगा  (या आएगी)?
निर्देशन और अभिनय
`बधाई हो एक कॉमेडी है और जम के हंसाती है। साथ ही पारिवारिक-सामाजिक तानेबाने को भी खरोंचती है। बबली को उसके रिश्तेदार इस बात पर फब्ती कसते हैं कि उसने और उसके पति ने संस्कार का खयाल नही रखा। पर संस्कार क्या है? क्या प्रौढ़ उम्र में माता-पिता बनना संस्कारहीनता है या बुजुर्ग मां की देखभाल न करना संस्कारहीनता है? पर निर्देशक अमित शर्मा ने इस सबको लेकर कोई भाषणबाजी नहीं की है बल्कि  सारी बातें हंसते-हंसाते सामने लाई है। फिल्म के  चरित्र भी बेहद दिलचस्प है। जीतेंदर कौशिक इतना खड़ूस है कि अपने मातहतों को सेवा के बदले पैसे नहीं देता बल्कि पेटी से निकालकर खराब वाला आम देता है। रिने अपने बॉयफ्रेंड नकुल को कहती है कि उसकी मां को गिफ्ट में फूल न दे बल्कि रेडवाइन की बोतल दे। फिल्म में आयुष्मान खुराना की बड़ी भूमिका है लेकिन इसमें कोई केंद्रीय चरित्र है नहीं है। गजराज राव, नीना गुप्ता, आयुष्मान खुराना और सान्या –सबकी अपनी अहमियत है। हां, निर्देशक ने सुरेखा सीकरी के चरित्र को कुछ खास तो बना दिया है।

*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क- 9873196343

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