एक समानता थी 'खईके पान बनारस वाला' और 'आवारा हूं' में...! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 21 अक्तूबर 2018

एक समानता थी 'खईके पान बनारस वाला' और 'आवारा हूं' में...!


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता, भाग 53

'डॉन 'में खईके पान बनारस वाला...
किसी किसी कलाकार के साथ कुछ गीत हमेशा के लिए जुड़ जाते हैं, जैसे राज कपूर के साथ आवारा हूं और दिल है हिंदुस्तानी। उसी तरह अमिताभ के साथ खइके पान बनारस वाला और रंग बरसे भीगे चुनर वाली हैं। यूं तो राज कपूर के सब कुछ सीखा हम ने न सीखी होशियारी’, दोस्त दोस्त ना रहा या छोटी सी बात न मिर्च मसाला या रमैया वस्ता वैया’, या इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल या प्यार हुआ इकरार हुआ भी हैं, और अमिताभ के साथ भी ढेरों यादगार गीत हैं- जैसे अपनी तो जैसे तैसे, मैं पल दो पल का शायर हूं’, जुम्मा चुम्मा दे दे’, अरे दीवानों मुझे पहचानो’, मीत ना मिला रे मन का’, लूटे कोई मन का नगर – पर इन गीतों की बात ही कुछ अलग है।
आवारा हूं और खइके पान बनारस वाला में एक समानता यह है कि आवारा पूरी बन जाने पर भी आवारा हू गीत उसमें नहीँ था। किसी सम्मेलन में ख़्वाजा अहमद अब्बास ने शैलेंद्र की यह कविता सुनी और तय कर लिया कि यह शामिल किए बिना फ़िल्म रिलीज़ नहीं होगी। फटाफट गाना रिकॉर्ड किया गया, शूट किया गया और फ़िल्म में डाल दिया गया। आप अगर कभी आवारा देखें तो उस का कोई भी लिंक फ़िल्म के घटनाचक्र में नहीं है। राज कपूर जेल से निकलता है, आवारा हूं गाता है। आगे की किसी घटना से उसका कोई ताल मेल नहीँ है।
कुछ ऐसा ही खइके पान बनारस वाला के साथ हुआ। वास्तव में अनजान ने यह गीत देव आनंद की बनारसी बाबू के लिए लिखा था, पर उसमें लिया नहीं जा सका था। डॉनबन चुकी थी। पान उस में था ही नहीँ। अब हुआ यह कि उसका एक ट्रायल शो मनोज कुमार ने देखा। फ़िल्म के घटनाचक्र में इस क़दर सस्पैंस था कि बीच में टायलेट जाने का भी मन नहीं करता था। मनोज ने कहा कि तनाव से मन हटाने के लिए कुछ और भी होना चाहिए। और बनारस वाले पान को मौक़ा मिल गया।
खइके के बारे में एक किंवदंती अनजान के बेटे गीतकार समीर ने इस तरह बताई है, मूडी किशोर कुमार ने यह गाने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि यह गाना हिंदी का है ही नहीं। यह खइके वइके क्या होता है। उसकी ख़ुशामद की जाती रही। आख़िर किशोर ने कहा, बस एक बार गाऊँगा, बिना रुके। पसंद न आए तो किसी और से गवा लेना
एक और किंवदंती है कि गीत गाने के दौरान वास्तविकता लाने के लिए किशोर पान चबाता रहा और पीक एक प्लास्टिक की पन्नी पर फेंकता रहा था। 
  
'सिलसिला' का दृश्य

बात रंग बरसे की
अमिताभ का जो गीत हर होली पर गलियों महल्लों में लोग बड़ी मस्ती में गाते झूमते हैं वह यश चोपड़ा की फ़िल्म सिलसिला (1981) से है। मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन, मेरा परिचयलिखने वाले बच्चन जी का यह गीत गाया भी था स्वयं अमिताभ ने अपनी आवाज़ में। और फ़िल्म भी क्या थी! सन् 1980 से चले आते अमिताभ और रेखा के रोमांस के क़िस्सों से प्रेरित थी। ख़ूबी यह थी कि वास्तविक जीवन में जो पात्र चर्चित थे – अमिताभ, जया और रेखा वही फ़िल्म में भी थे। इसे फ़िल्म जगत में कास्टिंग (कलाकार चयन) का कमाल कहा जाता है - सही पात्र के लिए सही और फ़िल्म को चर्चित बनाने वाले कलाकारों का चुनाव। पहले यश चोपड़ा अमिताभ के साथ परवीन बाबी और स्मिता पाटिल को रख रहे थे, लेकिन स्वयं अमिताभ से बात करके और उसकी रज़ामंदी से जया भादुड़ी और रेखा को लिया गया। परिणाम यह हुआ कि अमित के साथ रेखा की यह अंतिम फ़िल्म साबित हुई और अमित-रेखा का कथित रोमांस भा समाप्त हो गया, जैसे जागते रहो के अंतिम सीन में नरगिस को लेने से राज-नरगिस के रोमांस को पूर्ण विराम लगा था।
यश चोपड़ा ने कहा है कि कहानी में जो आंतरिक तनाव थे, वे इन तीन कलाकारों की वज़ह से दोगुने हो गए। मुझे फ़िल्म की सफलता पर पूरा भरोसा था और तीनों ने वादा किया था कि उनके कारण किसी भी तरह की समस्या शूटिंग में नहीं होगी। ऐसा हुआ भी। सब ने अपना वादा निभाया।
संजीव कुमार ने पहले तो इनकार कर दिया। इससे पहले वह अमिताभ के मुक़ाबले दोयम दर्ज़े का रोल कर चुका था –शोले और त्रिशूल में। फिर भी यश ने कहा एक बार कहानी सुन तो लो। अधबीच एक सीन आता है – रेस्तरां में संजीव कुमार, अमिताभ, रेखा और जया बैठे हैं। अमिताभ नृत्य मंच पर जाता है, जया की जगह रेखा को नाचने के लिए बुलाता है। संजीव ने यश को रोक कर अपने दफ़्तर फ़ोन किया और कहा,“मेरी सारी डेट सिलसिला को दी जाए। संजीव को लगता था कि जया के साथ काम करने पर उसकी अभिनय क्षमता सुधरती है।
सिनेमाघरों में फ़िल्म कुछ ख़ास नहीँ चली। पर यश चोपड़ा की निगाह में उसकी पसंद की यह और लम्हेथीं। यश की पत्नी पामेला का कहना है –भारत में विवाह को पवित्र और अटूट बंधन माना जाता है। विवाह की सीमाओं के पार दो पात्रों का प्रेम संबंध बनाए रखना दर्शकों को स्वीकार्य नहीँ होता।
सिलसिला और उस का गीत रंग बरसे रेखा को अभी तक पसंद है। इतना पसंद है कि अभी सितंबर 2018 में दिल है हिंदुस्तानी – 2 की गायन प्रतियोगिता में उस ने इस पर नृत्य किया। उस की आंखों में और हावभाव में अभी तक तृष्णा स्पष्ट झलक रही थी।

                
अरविंद कुमार
सिलसिला का बच्चन जी का अमिताभ की आवाज़ गीत रंग बरसेभीगे चुनरवाली हर होली पर गलियों महल्लों लोग बड़ी मस्ती में गाते झूमतेगाते देख कर मैं कह सकता हूं कि यह हमारी लोक संस्कृति का अंग बन गया है – ख़ास तोर पर और खइके पान बनारस वालाअमिताभ की अल्मस्ती का प्रतीक। डन फ़िल्म याद रहे ना रहे, बनारस वाला पान लोगों को याद रहेगा।
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लसके लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस)   

1 टिप्पणी:

  1. अरविंद जी की ये अनकही कहानियां दशकों पुरानी इन फिल्मों को एक बार फिर देखने की इच्छा जगाती हैं

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