'कॉरपोरेट' नहीं बन सका ये 'बाजार' ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 27 अक्तूबर 2018

'कॉरपोरेट' नहीं बन सका ये 'बाजार' !


फिल्म समीक्षा
बाज़ार
निर्देशक - गौरव के चावला
सितारे - सैफ अली खान, राधिका आप्टे, चित्रांगदा सिंह, रोहन मेहरा, मनीष चौधरी


*रवींद्र त्रिपाठी
बहुत दिनों के बाद सैफ अली खान की ऐसी फिल्म आई है जिसमें उनकी शख्सियत भी दमदार है और फिल्म में भी वजन है। वरना उनकी पिछली फिल्में आंय-बांय-शांय शैली की थी। `बाजार फिल्म में उन्होंने शेयर बाजार पर पकड़  रखनेवाले उस चरित्र का किरदार निभाया है जिसे आम बोलचाल में `बुल कहा जाता है। `बुल तिकड़म और दांवपेंच के जरिए कंपनियों के शेयर खरीदता और बेचता है। समझ लीजिए कि शेयर बाजार का कारोबार बुल के इर्द-गिर्द घूमता है। वही या उसे जैसे कुछ बुल ही शेयर बाजार चलाते हैं। वैसे तो शेयर की खरीद बिक्री कानूनी तरीके से हो इसकी निगरानी के लिए सेबी (द सेकुरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) जैसी संस्था है लेकिन शेयर बाजार पर व्यावहारिक नियंत्रण बुल ही करते हैं। इसीलिए शेयर की दुनिया में प्रवेश करनेवालों के लिए आदर्श `बुल ही होते हैं।
इलाहाबाद का रहनेवाला रिजवान अहमद  (रोहन मेहरा) भी शेयर ब्रोकर बनके आसमान छूना चाहता है। वो शकुन कोठारी (सैफ अली खान) को अपना आदर्श मानता है। कोठारी मुंबई शेयर बाजार का एक बेदर्द ट्रेडर है। उसके लिए कानून कायदा कोई खास मायने नहीं रखता है। बस रातोंरात मुनाफा कमाना उसका मकसद है, भले भी इसके लिए दूसरों का इस्तेमाल करना पड़े। सेबी की नजर उस पर है लेकिन वो इसकी परवाह नहीं करता। इलाबाबाद में अपने ईमानदार पिता की थप्पड़ खाने के बाद जब रिज़वान मुंबई पहुंचता है तो उसके पास सपने के अलावा कुछ नहीं है। वो ठीक से अंग्रेजी भी नहीं बोल पाता। क्या वो उस दुनिया में टिक पाएगा, जहां अंग्रेजी-दां मैनेजमेंट ग्रेजुएट अपनी जगह बना पाते हैं। क्या रिज़वान शकुन कोठारी से मिल पाएगा। और अगर वो उसकी छत्रछाया पा भी ले तो क्या शकुन उसका भी इस्तेमाल नहीं करेगा? और जब शकुन उसका इस्तेमाल करके उसे फिर से सड़क पर खड़ा कर देगा तो रिजवान क्या करेगा?  क्या वो बदला ले सकेगा?
`बाजार शेयर बाजार के इसी पेंचोखम की कहानी है। हालांकि इसमें एक छोटी सी प्रेम कथा भी है। रिज़वान और प्रिया (राधिका आप्टे) की। पर ये प्रेम-कथा शेयर बाजार की चालाकियों और धूर्तताओं में लिपटी हुई है इसलिए उसमें ज्यादा दम नहीं है और गानों के बावजूद प्रेम कहानी धड़ाम से गिर जाती है। चित्रांगदा सिंह ने शकुन कोठारी की पत्नी की भूमिका निभाई है जो ज्यादातर घर में रहती है और कभी कभार पार्टियों में शरीक होती है। पर कहानी के अंत में उनका चरित्र  निर्णायक हो जाता है। रिजवान का किरदार निभानेवाले रोहन मेहरा भारतीय टेलीविजन के चर्चित चेहरा रहे हैं और बिग बॉस में भी आ चुके हैं। चेहरे मोहरे से भी वो एक छोटे से शहर से आए उस शख्स की तरह लगते हैं कि जिसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि मध्यवर्गीय है और तिकड़म की दुनिया को समझने में माहिर नहीं है।


फिल्म की शुरुआत प्रभावशाली है जिसमें शकुन कोठारी एक जैन धर्म के समारोह मंत्रोच्चारों के बीच अपने एक पुराने परिचित की कंपनी धोखे से हड़पता है। यही दृश्य अंत से थोड़ा समय पहले भी आता है। इन दोनों दृश्यों की वजह से फिल्म में एक वातावरण बन जाता है जो कुछ कुछ एंद्रजालिक हो जाता है। `बाजार  व्यावसायिक जगत की प्रतिस्पर्धाओं की कहानी भी है जिसमें बड़े बिजनेसमैन एक दूसरे के खिलाफ षड़यंत्र करते हैं। निर्देशक की एक सफलता ये भी है कि शकुन कोठारी किरदार में खलनायकी के तत्व होने के बावजूद वो खलनायक नहीं दिखता है। शायद इसकी वजह ये भी है कुछ बड़े घरानों का उदय और विस्तार भी धूर्तताओं और चालाकियों की वजह से हुआ है। वास्तविक व्यावसायिक जगत में किसे नायक कहें और किसे खलनायक –ये तय करना कठिन है। इसीलिए तो फिल्म में शकुन कोठारी जेल से लौटने के बाद कहता है- बाजार चालू आहे, यानी पहले की तरह शेयर बाजार में वो अपनी तरह के खेल खेलता रहेगा।

*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क-9911473132

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