'नमस्ते इंग्लैंड' मतलब चल भाग चलें पश्चिम की ओर ? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

'नमस्ते इंग्लैंड' मतलब चल भाग चलें पश्चिम की ओर ?


फिल्म समीक्षा
नमस्ते इंग्लैंड
निर्देशक - विपुल शाह
कलाकार - अर्जुन कपूर, परिणीति चोपड़ा आदि।  


*रवींद्र त्रिपाठी
देश-दुनिया में इतना सब कुछ हो रहा है लेकिन कुछ मायनों में न भारतीय समाज बदला है और न बॉलीवुड। विशेषकर औरतों के मामलों में। कम से कम `नमस्ते इंग्लैंडफिल्म तो यही बताती है।
वैसे तो ये फिल्म नए जमाने के उस औरत की है जो घरेलू परिवेश से बाहर निकलकर अपना कैरियर चुनना चाहती है। लेकिन परिवार है कि उसकी इस चाह को पूरा नहीं होने देना चाहता। ऐसे में विकल्प क्या है? क्या औरत झूठ के सहारे अपना कैरियर बनाए?
फिल्म की कहानी
`नमस्ते इंग्लैंड में यही होता है। पंजाब के एक गांव की रहनेवाली जसमीत (परिणीति चोपड़ा) ज्वेलरी डिजाइनर बनना चाहती है। लेकिन `औरत को घर के दायरे में रहना चाहिएवाले रिवाज को मानने वाले उसके पिता और भाई को ये मंजूर नहीं। हालांकि जसमीत का पति परम (अर्जुन कपूर) उसे मदद करने का भरोसा देता है। दोनों शादी के विदेश जाने का प्लान बनाते हैं लेकिन परम का दोस्त एक पार्टी में हुए अपने अपमान के बाद उनकी इस योजना में अड़ंगे लगाता रहता है। अब जसमीत क्या करे? एक स्थानीय दलाल की बातों में फंस कर वह अपने पति को बिना बताए इंग्लैंड में रहनेवाले एक लड़के से शादी कर लेती है और लंदन चली जाती है। हालांकि ऐसा नहीं है कि उसे परम से प्यार नहीं है। लेकिन कैरियर से भी प्यार है। हालांकि वह परम को भरोसा देती है कि ये शादी नकली है और लंदन में अपना ज्वैलरी डिजाइनर वाला कैरियर शुरू वो उसे भी वहां भी बुला लेगी। पर परम का इस आश्वासन भर से मान जाएगा? आखिर वो भी अपनी पत्नी का सच्चा आशिक है।
निर्देशन और अभिनय
ये सही है कि आज के समय में औरतें अपने कैरियर को लेकर संजीदा हैं लेकिन `नमस्ते इंग्लैंड की जसमीत जो करती है वह विश्वसनीय नहीं है। निर्देशक ने उसे कुछ कुछ खलनायिका जैसा बना दिया है। फिल्म में देश की मिट्टी गंध की बात भी उसी तरह है जैसी कि `नमस्ते लंदनमें अक्षय कुमार ने की थी। उसी से मिलता जुलता भाषण अर्जुन कपूर ने भी फिल्म में दिया है। पर वह प्रभावी नहीं बन पाया है। `नमस्ते इंग्लैंड में ये बात भी सामने आती है कि कैसे भारत और पाकिस्तान के आम लोग बिना वीजा पाए अवैध तरीकों से और खतरे उठाकर पश्चिमी देशों में जाते हैं। ऐसे में कुछ की जान भी चली जाती है। 


हालांकि ये एक मौजू विषय है कि अमेरिका या इंग्लैंड जाकर डॉलर या पाउंड कमाने की ऐसी ललक क्यों? भले ही वहां सफाई कर्मचारी बनकर रहना पड़े। लेकिन ये वाजिब सवाल भी बीच में खो जाता है और फिल्म का जोर जसमीत की खुदगर्जी पर चला जाता है। ये ठीक है कि वो परम से प्यार करती है लेकिन सहारा तो झूठ का लेती है। अगर निर्देशक में जसमीत के लंदन जाने के लिए किसी और तरीके को सामने लाया होता तो फिल्म विश्वसनीय हो जाती। हां, जसमीत के लंदन जाने के पहले वाले कुछ दृश्य मनोरंजक और भरपूर हंसी वाले हैं।

*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क- 9873196343

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Bottom Ad