अमिताभ बच्चन यानी 'माधुरी' की भविष्यवाणी सच हुई - "एक और सूर्योदय" - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 7 अक्तूबर 2018

अमिताभ बच्चन यानी 'माधुरी' की भविष्यवाणी सच हुई - "एक और सूर्योदय"

माधुरी के संस्थापक - संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता विशेषांक
(भाग - 51)
 


PMO के सिफारिशी फोन पर मिली शुरुआती दो फिल्म और

कुलीहादसे के वक्त इंदिरा एक दिन पहले लौट आईं स्वदेश

माधुरी’ पत्रिका ही थी जिसने अमिताभ को सबसे पहले कवर पेज पर छापा था और घोषित कर दिया था– एक और सूर्योदय।सचमुच पिछले कई दशक से फ़िल्माकाश पर सूर्य समान शोभायमान है अमिताभ।
इस अमिताभ का नाम मैंने सबसे पहले सुनील दत्त से सुना था। अब दिन और तारीख़ याद नहीं। समय याद है – शाम के पांच से कुछ बाद। यह भी याद है कि उसके अगले दिन मैं एक महीने की छुट्टी पर दिल्ली जाने वाला था। अगर उस शाम सुनील न आते तो मुझे अमिताभ का नाम न जाने कब सुनने को मिलता। तो मैं उसी शाम की बात करता हूं। सुनील दत्त ने कहा कि प्रधानमंत्री (श्रीमती इंदिरा गांधी) कार्यालय से एक फ़ोन आया है। सुनील ने यह नहीँ बताया कि फ़ोन किसने किया है और किसके पास आया है। जो भी हो फ़ोन का मुद्दा यह था कि बच्चनजी के बेटे अमिताभ को यूनाइटिड प्रोड्यूसर्स – फ़िल्मफ़ेअर टैलेंट कॉन्टैस्ट में चयन के लिए शामिल कर लिया जाए, क्योंकि किसी कारणवश इंटरव्यू का निमंत्रण उसे नहीं मिल पाया है। कॉन्टैस्ट का संचालन मैं कर रहा था। चुनाव प्रक्रिया अंतिम चरण तक जा पहुंची थी। चुने प्रत्याशियों के स्क्रीन टैस्ट बी.आर. चोपड़ा ले रहे थे। मैंने सुनील से कहा, फिर भी इसमें कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। आप चोपड़ा जी से बात कर लें। स्क्रीन टेस्ट अवश्य हो जाएगा। मैं स्वयं उनसे बात कर लेता पर कल सुबह ही मुझे सपरिवार दिल्ली जाना है – एक महीने की छुट्टी पर।
मैं वापस लौटा तो पता चला कि अमिताभ नहीं चुने जा सके। तब वह कलकत्ते में किसी बिरला कंपनी में काम कर रहे थे। उनके नाम एक पत्र में मैंने कुछ ऐसा लिखा, मैं आपकी अभिनय क्षमता नहीँ जानता। आप सुपर स्टार भी बन सकते हैं। ख़ाली हाथ भी रह सकते हैं। फ़ैसला आपके हाथ है। पता नहीँ कलकत्ते के पते पर भेजी गई यह चिट्ठी उन्हें मिली या नहीं।
उनकी सिफ़ारिश दो हस्तियों से की गई थी – नरगिस और ख़्वाजा अहमद अब्बास। ये दोनों ही थे जिनसे इंदिरा जी की निजी जान-पहचान थी। सुनील दत्त ने उन्हें रेशमा और शेरा में लिया। अब्बास ने सात हिंदुस्तानी में। सात हिंदुस्तानी में एक और हिंदुस्तानी था अनवर – हास्य अभिनेता महमूद का छोटा भाई। अमिताभ और अनवर गहरे दोस्त बन गए। दक्षिण बंबई में एक साथ घूमते नज़र आते थे। वास्तव में उन दिनों महमूद के घर में ही रहने भी लगे थे।



सन् 1942 में जन्में दो मशहूर सितारों जितेंद्र और राजेश खन्ना पर मैं पहले ही लिख चुका हूं। सन् 1942 में जन्मे तीसरे सितारे हैं अमिताभ। जितेंद्र की राह अलग थी, लेकिन राजेश और अमिताभ को टकराना था, टकराए भी हृषीकेश मुखर्जी की आनंद में। शुरू में आनंद राजेश और अमिताभ के लिए थीही नहीं। तब अमिताभ इतनी जल्दी सुपर स्टार की सीढ़ी इतनी जल्दी नहीं चढ़ सकते थे, और राजेश और अमिताभ का टकराव भी टल जाता।
(शायद आपको याद हो भाग 49 किशोर कुमार में मैंने लिखा था, यहां मैं हृषिकेश मुखर्जी और आनंद फ़िल्म वाला मशहूर क़िस्सा नहीं दे रहा हूं। वह आप पढ़ेंगे कभी और - अमिताभ वाले प्रकरण में।)
भाग्य कहो या किशोर कुमार का चौकीदार कहो, इन दोनों को आनंद दिलवाई थी किशोर कुमार के चौकीदार ने। यह क़िस्सा उतना ही अजब है जितना किशोर कुमार का अटपटा बर्ताव। इसके निर्माता एन.सी. सिप्पी पहले कभी महमूद की फ़िल्मों का निर्माण पक्ष देखते थे। तो शुरू में आनंद के मुख्य कलाकार होने वाले थे महमूद और किशोर कुमार। एक बंगाली मंच निर्देशक ने किशोर कुमार के काम का भुगतान नहीं किया था और वह अगले नाटक की बात करने आने वाला था। बाहर कहीँ जाते जाते किशोर चौकीदार से कह गया कि बंगाली आए तो हकाल देना। कुछ देर बाद आगामी फ़िल्म आनंद के निर्देशक हृषीकेश पहुंचे किशोर से बात करने। दूर से ही वह बंगाली नज़र आते थे! बड़ी बेअदबी से चौकीदार ने उन्हें हकाल दिया। उन्होंने तय कर लिया कि आनंद में किशोर कुमार को नहीँ रखेंगे। बाद में महमूद भी फ़िल्म से निकल गया। नतीजा हुआ राजेश और अमिताभ का आनंद में प्रवेश और एक नए सूर्य का उदय।
छह महीने में मर जाने वाले आंतों में लिंफोमा नामक कैंसर से बीमार सदा मस्त आनंद सहगल (राजेश) को समझ नहीं पाता नया नया डॉक्टर भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन)। कोई इतना बीमार शख़्स इतना ख़ुश कैसे रह सकता है और दूसरों को ख़ुश करने में लगा रह सकता है? फ़िल्म शुरू होती है भास्कर को पुरस्कार सम्मान से। उसे सम्मान मिल रहा है अपनी किताब पर। वह दर्शकों को बताता है कि यह किताब गल्प नहीं है, सच्ची कहानी है – आनंद की। फ़िल्म की जान है आनंद और आनंद के रूप में राजेश। आनंद अपने बंगाली डाक्टर को बाबू मोशाय कहता है।
आनंद तक राजेश सुपर स्टार हो चुका था – आराधना (शर्मीला टैगोर),‘दो रास्ते (मुमताज), ख़ामोशी (वहीदा रहमान) जैसी फ़िल्में गली गली राजेश को लोकप्रिय बना चुकी थीं। ऐसे में लगभग ख़ाली सलेट वाला अमिताभ खड़ा रह पाया और दर्शकों को रुला पाया – यह कोई कम उपलब्धि नहीं थी। यह लड़ाई है दीये की और तूफ़ान की जैसी स्थिति थी। अंडर डॉग अमिताभ के मन में टकराव की भावना पैदा होना और जी-जान से जूझने की कोशिश करना अस्वाभाविक नहीँ था। जब माधुरी की ओर से जैनेंद्र जैन कवर स्टोरी लिखने गए, अमिताभ से, उनकी मम्मी तेजी जी से मिले और फिर अनवर उन्हें ले गए अपने घर जो एक तरह से अमिताभ का दूसरा घर बन चुका था, तो एक क़िस्सा सुनाया गया। पाकिस्तान से कोई आया था, राजेश का नाम सुना था, पहचानता नहीँ था, उसकी फ़िल्म देखना चाहता था। उसने देखी आनंद। वह डॉक्टर भास्कर को राजेश समझता रहा और बीमार आनंद सहगल को अमिताभ। वही जैनेंद्र ने लिखा भी। एक और सूर्योदय शीर्षक भी उसी ने दिया था। कुल मिला कर राजेश को अमिताभ से कम बताने की कोशिश थी।



टकराव की भावना अगले साल महमूद की फ़िल्म बांबे टू गोआ (1972) में साफ़-साफ़ उभर कर आई। नायक था अमिताभ। ये लोग जिस बस में गोवा जा रहे हैं उसके ड्राइवर और कंडक्टर में एक का नाम है राजेश और दूसरे का खन्ना
जो भी हो, अमिताभ का सूर्य शिखर तक पहुंचना ही था। और पहुंचा। अपनी मेहनत और जिजीविषा के बल पर।
रेशमा और शेरा में वह नायक सुनील दत्त का छोटा गूंगा भाई है। कई बार अमिताभ को यह शिकायत रही है कि उसकी इतनी अच्छी आवाज़ होते हुए भी गूंगे का रोल दिया गया है, पर फ़िल्म की कहानी में उसका बहुत महत्व कम नहीं है। अंत में नायिका रेशमा (वहीदा रहमान) उसे ही मिलती है। साथ ही अभिनय में वह किसी और से कम नज़र नहीं आता।
1973 में प्रकाश मेहरा की ज़ंजीर क्या आई, अमिताभ चोटी पर जा पहुंचा। और फिर उसी साल हृषीकेश की अभिमान के बाद कोई और उसकी टक्कर में रहने लायक़ नहीँ बचा।
उसका ग्राफ़ हर साल कई पायदान ऊपर चढ़ रहा था। यश चोपड़ा की दीवार और जी.पी.सिप्पी की शोले (धर्मेंद्र के साथ), 1975 में एक बार फिर हृषिदा की चुपके चुपके में भी धर्मेंद्र के साथ हास्य भूमिकाओं में...
अमिताभ की सारी और एक से बढ़ कर एक फ़िल्म पर कुछ लिखना मेरा उद्देश्य नहीँ है। हां, कुली फ़िल्म की शूटिंग में लगी गंभीर चोट के कठिन इलाज ने सारे देश को तनाव में रखा।
अमिताभ की बीमारी की ख़बर सुन कर एक दिन पहले विदेश से लौट आई थीं इंदिरा गांधी। उसकी सुरक्षा के लिए एक विशेष ताबीज भी भिजवाया था। संजय गांधी देखने आता रहता था।
कुली वाली चोट के बाद कुछ दिन निराशा के मूड में रहा। कुछ समय के लिए फ़िल्मों से किनारा कर लिया। और 1984 में राजीव गांधी के कहने पर इलाहाबाद से संसद के चुनाव में भारी बहुत से जीते। पर राजनीति रास नहीं आई, 1988 में फ़िल्मों में कमबैक किया। यहां से शुरू होता है महानायक के फ़िल्मी जीवन का उत्तर कांड। वह मैं अगले भाग 52 या 53 में लिखूंगा।
ज़ंजीर के बाद अमिताभ और जया की संभावित शादी की चर्चा होने लगी थी। गुड्डी में जिस समित भंज से जया की शादी होती है, उसका दावा था कि पहले ही कलकत्ते में उसकी शादी जया से हो चुकी है। पर वह बात आगे नहीँ बढ़ पाई। इस बीच शिवसेना के बाल ठाकरे ने अमिताभ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शनों की धमकी दी जाने लगी। ऐसे में शादी खुलेआम नहीं की गई। मलाबार हिल पर एक फ़्लैट में केवल कुछ ही लोग आमंत्रित किए गए। उनमें से मैं और माधुरी से दो जन थे, धर्मवीर भारती और पुष्पा भारती। पुष्पा जी ने धर्मयुग में वधु जया की साज-सज्जा का रोचक वर्णन लिखा। संजय गांधी के साथ एक सुंदरी थी। हम सबका उसकी ओर उत्सुक होना स्वाभाविक था। हमें बताया गया कि वह दिल्ली की एक पत्रकार है। थी भी। दिल्ली से भाजपाई डॉक्टर जैन एक पत्रिका निकालते थे, जिसका संपादन वह करती थी। बहुत बाद में हमें पता चला कि वह मनिका थी जिसका सही नाम न समझ कर लोगों ने उसे मेनका कहना शुरू कर दिया और बाद में संजय ने जिससे शादी कर ली।

अरविंद कुमार
अपनी शादी की बारात का वर्णन अमिताभ ने इन शब्दों में किया है (इंग्लिश से मेरा अनुवाद):
जेवीपीडी स्कीम की सातवीं सड़क पर अपने किराए के मकान मंगल से मैं निकला। हम अपनी दो दरवाज़ों वाली सैकंड हैंड कार पौन्टिएक स्पोर्ट कार में थे – मां और बाबूजी। 3 जून 1973 थी। मेरा (अब स्वर्गीय) ड्राइवर नागेश हमें मलाबार हिल पर जया के पारिवारिक मित्र के अपार्टमैंट तक ले गया
मसलन
“… and as I set out from ‘Mangal’ a rented house of mine in JVPD scheme, 7th Road .. in my newly acquired second hand Pontiac Sports, 2 door, with Ma and Babuji with me .. my driver Nagesh, now passed away, insisting on driving me to an apartment of Jaya’s family friend at Malabar Hill .. on the 3rd of June 1973”

और अंत में –
शुरूआत में मैंने लिखा था, सुनील दत्त ने मुझसे कहा बच्चन जी के बेटे अमिताभ।
अब ठीक सन् तो याद नहीँ पर यह याद है कि बंबई में सबके चहेते अशोक कुमार ने अपनी शादी की साठवीं जयंती पर जूहु पर सन ऐंड सैंड में पार्टी दी थी। इसके अलावा दादामुनि अशोक को पार्टियां देते नहीँ सुना। हो सकता है कोई और मौक़ा हो, पर पार्टी दी थी उन्होंने यह पक्की तरह याद है। एक मेज़ बच्चन जी और मेरे सिवा दो एक सज्जन और थे। कुछ दिन पहले अमिताभ को कोई अवॉर्ड मिला था। वैसे भी वह हर तरफ़ वाहवाही लूट रहा था। गर्वित पिता हरिवंश राय अपनी व्यथा कथा सुनाने के लिए क़िस्सा सुनाने लगे, कहीं यूरोप में एक दिन गौड अपना पता ढूंढ़ रहा था। किसी को कुछ पता नहीँ था। अचानक किसी ने गौड से पूछा, अरे वह तो नहीं, ईसा मसीह का बाप?’ यही हाल बंबई में मेरा हो गया है।

 सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
 (नोट:श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर  'पिक्चर प्लस के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस।)   


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