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रविवार, 4 नवंबर 2018

जिन्होंने राजकपूर को मशहूर ‘आवारा’ बनाया,अस्सी के दशक में सेंसर में उनकी फिल्में अटक गईं


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता, भाग 55
 
ख्वाजा अहमद अब्बास और राज कपूर
सन् 1960 से एक दो साल उधर या इधर मैंने ख़्वाजा अहमद अब्बास को पहली बार देखा था – रानी झांसी रोड पर सरिता-कैरेवान के संपादकीय कार्यालय में। वे संपादक विश्वनाथ जी से मिलने आए थे। मैं ही नहीं पूरा संपादन विभाग उनका प्रशंसक था, एक हद तक दीवाना भी – उनकी रचनाएं, किताबें और फ़िल्में पढ़कर या देखकर। विश्वनाथ जी से इस मीटिंग का परिणाम हुई – अब्बास के पांच लेखों की रोचक शृंखला – फ़ाइव फ़ेसेस ऑफ़ मदर इंडिया। वास्तविक जीवन से आम औरतों के पांच चेहरे और उनका बेहतरीन वर्णन।
 सन् 1857 से ही आज़ादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वालों के ख़ानदान में पैदा हुए अब्बास तीन भाषाओं में लिखते थे – इंग्लिश, उर्दू और हिंदी। उनकी भाषा लच्छेदार नहीं होती थी। सीधी-सादी तथ्यात्मक। ऐसी ही थीं उनकी अपनी बनाई असरदार फ़िल्में। जैसे 1959 की चार दिल चार राहें
 कहीं एक चौराहा बन रहा है। चार दिशाओं को जाती चार सड़कों का इस चौराहे से जुड़ी हैं चार अनोखी प्रेम कहानियां। उसकी एक इमेज मेरे मन पर अंकित हो गई थी। अभी तक है। ब्राह्मण नौजवान गोविंदा (राज कपूर) बचपन की अछूत सहेली काली कलूटी चावली (बेहद काले शरीर वाली मीना कुमारी) से शादी करने तमाम विरोधों के बावजूद अपनी बारात ले जा रहा है। वही दूल्हा है, वही बाराती। उसके आगे है एक ढोल वाला, पीछे है एकमात्र साथी। काले आसमान में ढोल की ढमढम बज रही है, विद्रोही राज कपूर का क्लोज़प, फिर पूरा शरीर, एक के पीछे एक कुल तीन जन। ढम ढम क्या है क्रांति की आवाज़ है। दुल्हन मीना कुमारी घर पर थी, पर जब बारात पहुंची भगा दी गई थी

ख्वाजा अहमद अब्बास (फोटो नेट से साभार)
मैं न तो यह कहानी पूरी सुनाऊंगा न बाक़ी तीन और कहानियां। क्लाईमैक्स तक पहुंचते पहुंचते ट्रेड यूनियन नेता निर्मल (जयराज) के नेतृत्व में विजय का उद्घोष करता है गोविंदा (राज कपूर)।
जब मैं बंबई पहुंचा तो उनसे मिलना भी एक प्राथमिकता थी। मिलवाया हिंदी ब्लिट्ज़ के तत्कालीन संपादक और दिल्ली के माडल टाउन से मेरे मित्र खुले दिल वाले मुनीश नारायण सक्सेना ने। वे अब्बास के साढ़ू भी थे। अब्बास के घर का दरवाज़ा सबके लिए खुला रहता था। वे हर नए कलाकार की सहायता को तत्पर रहते थे। मैं पहले से ही उनका दीवाना था। हमारी पटने में देर नहीँ लगी। अब्बास की फ़िल्म शहर और सपना आ चुकी थी। हमारा घर बन रही थी। माधुरी के पन्ने उसके विकास की ख़बरों और तस्वीरों से भरे रहने लगे, क्योंकि पहले ही अंक से हम लोग हर सकारथ फ़िल्मों के अघोषित समर्थक और प्रचारक बन गए थे। और अब्बास यथार्थवादी फ़िल्मों के आइकन बन गए थे। उनका एक ही विषय था समाज, समाज में बदलाव की ज़रूरत। विचारधारा से वे वामपंथी होने के साथ साथ नेहरूई मानसिकता से सराबोर थे। दो शब्दों मॆं कहें तो क्रांति के योद्धा थे। पूरे कैरियर में उर्दू, हिंदी, इंग्लिश पत्रकार-उपन्यासकार-पटकथाकार-फ़िल्मकार अब्बास को चार बार राष्ट्रीय फ़िल्म अवॉर्ड मिले।
अब्बास को फ़िल्मकार बनाया वी. शांताराम की 1937 की दुनिया ना माने और 1939 आदमी ने। हुआ यह कि बांबे क्रानिकल के फ़िल्म समीक्षक कन्हैयालाल के पास उस दिन दुनिया ना माने के प्रीमियर में जाने का टाइम नहीँ था, तो अब्बास को भेज दिया और अब्बास की ज़िंदगी बदल गई। फ़िल्म थी ही ऐसी। पाठकों से मेरी अपील है कि https://www.youtube.com/watch?v=QiqGYNYvKiI पर आज ही देखें।
'श्री 420' का एक दृश्य
मैंने कई बार देखी है और उस पर लंबी समीक्षा भी लिखी है। आप उस समय के दक़ियानूसी समाज की कल्पना तक नहीँ कर सकते। फ़िल्म क्या थी उस समाज से विद्रोह की चीखती दहाड़ती पुकार थी। हर सचेत नागरिक की तरह लेखक अब्बास सामाजिक नज़रिए से हमेशा के लिए जुड़ गया। दो साल बाद शांताराम की 1939 की आदमी ने अब्बास को झकझोर दिया। अब तो वे शांताराम की फ़िल्में बार-बार देख कर वह स्वयं पटकथा लेखन का अभ्यास करने लगे। पहला परिणाम हुआ बांबे टाकीज़ की अब्बास लिखित नया संसार (1941)। पत्रकारिता के क्षेत्र में नैतिकता और दायित्व के सवाल उठाती कहानी। अब्बास ने अपनी फ़िल्म कंपनी का नाम भी नया संसार रखा। अपने पूरे कैरियर में वह समाज के नैतिकता और दायित्व का ही निर्वाह करते रहे।
सन् 1944 में 28 साल अब्बास ने पढ़ा - भारत से चीन भेजे गए चिकित्सक मंडल के मरे डॉक्टर द्वारकानाथ कोटणीस की मृत्यु के समाचार और कहानी से प्रेरित होकर उपन्यास लिख डाला। उसके निकट मित्र और साथी वी.पी.साठे ने कहा इस पर तो फ़िल्म बननी चाहिए। कहानी लिख कर दोनों जा पहुंचे अपने प्रिय फ़िल्मकार वी. शांताराम के पास जिन्होंने सुनते ही वह पसंद कर ली – फ़िल्म का नाम था डॉक्टर कोटणीस की अमर कहानी’ - चीन में शहीद कोटणीस के चीनी नर्स चिंग्लान से प्रेम की कहानी।
निर्देशक के रूप में उनकी पहली फ़िल्म थी 1943 के बंगाल के काल पर आधारित 1946 की धरती के लाल। (बंगाल के काल पर आज की पीढ़ी की जानकारी के लिए: सन् 1943 में पड़े इस अकाल में अविभाजित बंगाल के पच्चीस लाख लोग भूख से मर गए थे। बच्चन जी ने भी इस कविता पुस्तिका लिखी थी बंगाल का काल जिसकी पहली तीन लाइनें थीं – पड़ गया बंगाले में काल / भरी कंगालों से धरती /  भरी कंकालों से धरती!) हृदयद्रावक धरती के लाल भारत में सामाजिक-यथार्थवादी फ़िल्मों की अग्रणी मानी जाती है। इसका निर्माण भारतीय जन नाट्य संघ (इंडियन पीपल्स थिएटर – इप्टा) ने किया था। बंगाल के काल की विभीषिका में फंसे एक परिवार की दुर्दशा के बहाने सुविशाल स्तर पर मानवीय आपदा का वर्णन करने वाली इस फ़िल्म के आधार थे इप्टा के नाटक नवान्न और विजन भट्टाचार्य का ज़बानबंदी और किशन चंदर की कहानी अन्नदाता
चालीस साल के अब्बास भारत ही नहीँ दुनिया भर में मशहूर हो गए – एक शक्तिशाली फ़िल्मकार के रूप में। इसी से सोवियत यूनियन में भारतीय फ़िल्मों का बाज़ार खुला।
इसके ग्यारह साल बाद की अब्बास की 1957 की विशाल पैमाने पर रूसी-भारतीय संयुक्त रंगीन फ़िल्म परदेसी। इसके दो संस्करण थे – हिंदी और रूसी। रूस में यह 8 जनवरी 1958 को रिलीज़ हुई और इंग्लिश सब-टाइटिलों के साथ जर्नी बियोंड थ्री सीज़ नाम से न्यूयार्क में सन् 1960 में। यह फ़िल्मांकन थी पंद्रहवीं सदी में (1466-1472), दक्षिण भारत की बहमनी सल्तनत पहुंचे रूसी व्यापारी अफ़नासी निकितन (ओलेग स्त्रिझेनोफ़) के भारतीय स्त्री चंपा (नरगिस) के प्रेम की। लोकप्रिय अफ़नासी जब भारत छोड़ कर जा रहा है तो मन्ना दे की आवाज़ में चारण (बलराज साहनी) गा रहा है – फिर मिलेंगे जाने वाले यार दस्वीदानिया

'बॉबी' का एक दृश्य
अब्बास ने ही अमिताभ को सबसे पहले हीरो की भूमिका दी – सात हिंदुस्तानी (1968) में बिहार के शायर अनवर अली के रूप में जो देश के कई कोनों से आए छह अन्य देशवासियों की टोली में गोवा में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार प्रसार करने निकल पड़ा है। उनका एक काम है पुर्तगाली क़िलों पर और सरकारी इमारतों पर तिरंगे लहराना। इस टोली में एक है रामभगत शर्मा (महमूद का छोटा भाई अनवर अली)। यही नहीं अब्बास की अनेक फ़िल्मों का संदेश था संपूर्ण भारत की एकता।
दो बूंद पानी राजस्थान की प्यासी धरती तक पानी पहुंचाने के प्रयासों की कहानी है। गंगा सागर डैम का निर्माण और उससे निकली नहर को आगे ले जाने की दास्तान। नायक गंगा सिंह (जलाल आग़ा) अपनी पत्नी गौरी (सिमी गरेवाल) गांव पहुंच कर इसी में जुट जाता है। अंत में वह शहीद हो जाता है और सब के लिए प्रेरणा बनता है।
आसमान महल (1965) अब्बास की तमाम फ़िल्मों से अलग थी। कहानी अब्बास की थी, पटकथा और संवाद इंदरराज आनंद ने लिखे थे। आसमान महल नाम की पुश्तैनी हवेली में शानो शौक़त से जीने के आदी नवाब साहब (पृथ्वीराज कपूर) दौलत से खोखले हो चुके हैँ। एक बिज़नैस मैन की आंखेँ हवेली पर टिकी हैँ होटल बनाने के लिए। नवाब साहब का बिगड़ा बेटा सब समझता है और उनसे टकराता भी है। नवाब साहब बहुत बड़ा कर्ज़ लेकर आख़िरी शानदार दावत करते हैं और मर जाते हैं।
अब्बास का नाम राज कपूर से हमेशा जुड़ा रहेगा। आवारा, श्री चार सौ बीस, जागते रहो, मेरा नाम जोकर, बॉबी और हिना की कहानियां भी अब्बास ही की थीं। आवारा के बनने के बारे में एक क़िस्सा कहा जाता है। यह कहानी लेकर अब्बास पहले महबूब खान के पास गए थे। उन्हें पसंद नहीं आई। अब वह पृथ्वीराज कपूर के पास गए। उन्होंने राज कपूर को बुला लिया। जिस अंदाज़ और प्यार से राज ने उसे परदे पर उतारा, वह इतिहास बन गई और राज कपूर से उन के स्थायी संबंध की बुनियाद।

अरविंद कुमार
आख़िरी पारी में बनी अब्बास की एक फ़िल्म थी द नक्सलाइट्स (1980)। मुख्य कलाकार थे मिथुन चक्रवर्ती, स्मिता पाटील, दीना पाठक और नाना पल्सीकर। इस पर सैंसर बोर्ड ने आपत्ति की। (सरकार कोई भी हो पर नक्सलवाद के विरोध की नीति वही रहती है।) उनकी अंतिम फ़िल्म एक आदमी (1988) भी सेंसर बोर्ड का शिकार बनी। उसके कलाकार थे शबाना आज़मी, परीक्षित साहनी। मुक़दमे के बाद सेंसर का प्रमाणपत्र तो मिल गया पर रिलीज़ होने से पहले पहली जून 1987 को हार्ट अटैक से बहत्तर वर्षीय अब्बास का देहांत हो गया।

सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लसके लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस) 

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