डिंपल कपाड़िया से भी पहले इस अभिनेत्री को 'बॉबी' में रोल ऑफर हुआ था - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 11 नवंबर 2018

डिंपल कपाड़िया से भी पहले इस अभिनेत्री को 'बॉबी' में रोल ऑफर हुआ था


बेबी फ़रीदा से फ़रीदा दादी तक
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता, भाग 56
 

माधुरी निकली तो टाइम्स आफ़ इंडिया संस्थान में मैं सबसे कम उम्र का संपादक था। सिनेजगत की अंदरूनी मानसिकता से अनजान। वहां के फ़िल्म पत्रकारों की चाल-ढाल, वहां चलने वाली सौदेबाज़ियों, किसी कलाकार या फ़िल्म के प्रमोशन की गतिविधि का मुझे भान तक नहीँ था। दिल्ली में मैं सरिता-कैरेवान पत्रिकाओं के सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय था। वही मेरी मानसिकता थी। सिनेजगत मेरे लिए नया था, पर अपनी पत्रिका को मैं सिनेजगत के माहौल में एक नया विचार मंच देना चाहता था। कुछ नया, कुछ अनोखा, कुछ सब से हट कर अलग, हर अंक कुछ सकारथ चौंकाऊ हो, जिसके पत्रिका में होने की संभावना तक का ग़ुमान तक पाठक को और सिने जगत को न हो। ऐसा न होता तो मेरे संपादक होने का कोई मतलब नहीं रह जाता। ऐसी तमाम बातें थीं जो माधुरी के हर अंक को प्रतीक्षित बनाती थीँ।

युवती फरीदा जलाल
यह बंदिश मैंने इसलिए बनाई ताकि आप को समझा सकूं कि 1964 के बाल दिवस पर मैंने बेबी फ़रीदा को कवर पेज पर क्यों छापा। डेज़ी और हनी ईरानी का ज़माना बीत चुका था। अब बाल कलाकारों में सुपर स्टार थी बेबी फ़रीदा। जहां तक मुझे पता है, फ़रीदा की पहली फ़िल्म थी बिमल रॉय की सन् 1959 की सुजाता। इसमें वह बच्ची रमा के रूप में दिखाई दी थी। कुछ फ़िल्मों के बाद आस का पंछी तक वह इतनी जम चुकी थी कि स्वयं अपने नाम बेबी फ़रीदा के रूप में अवतरित हुई। मेरी राय में उसका तब तक का सबसे महत्वपूर्ण रोल था 1961 की बिमल रॉय की रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित काबुलीवाला में। इसका गीत ऐ मेरे प्यारे वतनआज भी जब कहीँ बजता है तो सुनने वाला ठिठक कर खड़ा हो जाता है। इसके बाद विजय भट निर्देशित हरियाली और रास्ता में बालिका शोभना के रूप में याद की जाती रही थी। वह इतनी लोकप्रिय थी कि एक फ़िल्म की घोषणा में लिखा गया था – गुड़िया फिर आ गई...
1964 वाली दोस्ती की कहानी का प्रमुख अंग थी। उसी से ही कथा में मोड़ आते थे। उस साल जिंदगी, बेटी बेटे और जब जब फूल खिले में वह दर्शकों के मन में बस चुकी थी।
बेबी फरीदा
मेरे लिए निजी ख़ुशी की बात यह है कि माधुरी का वह कवर पेज और अंक बहुत लोकप्रिय सिद्ध हुआ। सब चकित और प्रसन्न थे – वाह, क्या बात है! हम लोगों ने उसे टाइम्स कार्यालय में बुलवा कर प्रसिद्ध फ़ोटोग्राफ़र जितेंद्र आर्य से फ़ोटो खिंचवाए थे। संदर्भवश- हम लोग दोस्ती के कलाकारों का संयुक्त फ़ोटो कवरपेज पर छापना चाहते थे। मैंने राजकुमार बड़जात्या से कहा कि वे सब वही कपड़े पहन कर आए जो फ़िल्म में पहने थे। वे आए, हम सब हैरान! – यह क्या? पीले कपड़े! राजकुमार ने बताया झक सफ़ेद दिखाने के लिए ब्लैक ऐंड वाइट फ़िल्मों में कपड़े पीले रखे जाते हैं। (पता नहीं कितना सही थी यह बात।) जो भी हो वे लौटे और सफ़ेद कपड़े पहन कर आए। ऐसे बना था दोस्ती वाला माधुरी का कवर पेज। उनमें से कोई भी सुपरस्टार नहीं था। पर दर्शकों के लिए और माधुरी के लिए वे सुपरस्टार ही थे।
एक बार फिर मैं बेबी फ़रीदा पर लौटता हूं। तब बेबी फ़रीदा जैसे लोकप्रिय कलाकारों को भी पारिश्रमिक नाममात्र का ही मिलता था। उन दिनों मैं बंबई में अंधेरी पश्चिम में रहता था – घोड़बंदर रोड से पश्चिम की तरफ़ एक गली में – अभिनेता चंद्रशेखर के घर के सामने आशीर्वाद बंगले में। अधरास्ते में घोड़बंदर रोड से जाओ तो अधरास्ते में बाएं एक ऊंचे फाटक वाला अहाता था। फ़रीदा उसी में रहती थी। कई बार मुझे उसकी मां मिल जाती थीं। साधारण सी, कुछ मोटी महिला थीँ। देखते ही झलकता था कि परिवार संपन्न नहीं है। दुआ सलाम होती। कई बार वे अपनी समस्याओं का ज़िक्र करतीं।
टीवी सीरियलों की फरीदा दादी
फ़रीदा कुछ बड़ी हुई तो किशोरियों के रोल आफ़र होने लगे। फ़रीदा का कहना है, "मैं आर्थिक मज़बूरी में फ़िल्म इंडस्ट्री में आई थी और जब मेरे बड़े होने के साथ मुझे अभिनेत्री के आफ़र आने लगे तो मेरी मां ने मेरी शादी करवा दी।"
कहा जाता है कि राज कपूर की तरफ़ से उसे बॉबी की नायिका वाली भूमिका ऑफ़र की गई थी। नए नए विवाह के नाते फ़रीदा ने अस्वीकार कर दी। सोचो ऐसा होता तो क्या होता।
कई लोग समझते हैं कि अभिनेत्री फ़रीदा जलाल ही बचपन में बेबी फ़रीदा थी, लेकिन यह सच नहीँ है, पर सच यह है कि दोनों फ़रीदाएं मित्र हैं। बस बेबी फ़रीदा अब फ़रीदा दादी कहलाती है।
बहुत बाद में वह कई फ़िल्मों में आई और एक टीवी सीरियल फ़रीदा दादी तो बना ही उसके लिए था। नाम था फ़रीदा दादी। और यह नाम उस से चिपक गया। उसके कुछ लोकप्रिय सीरियलों के नाम हैं- घर की लक्ष्मी, उत्तरन, लाडो 2, इच्छा प्यारी नागिन...
कितने लोगों ने उसे पहचाना कहना तो मुश्किल है, उसकी कुछ लोकप्रिय फ़िल्में हैं ढोल, द अवेकनिंग, थ्री ईडियट्स, रहस्य, और लव यू सोनियोआदि।

अरविंद कुमार
बड़े होने की प्रक्रिया में बाल कलाकारों को कई मानसिक तनावों में से गुज़रना स्वाभाविक ही है। मनोविशेषज्ञ डाक्टर हरीश शेट्टी कहते हैं,"बड़े लोग असफलता को समझ लेते हैं लेकिन बच्चो के लिए असफलता से पार पाना बेहद मुश्किल होता है।"
एक प्रवाद है कि बाल कलाकारों की उम्र का बढ़न रोकने या बढ़ाने के लिए दवाएँ दी जाती हैं। लेकिन बेबी फ़रीदा और आज के दौर में टीवी सीरियलों में दादी का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री फ़रीदा कहती हैं, "मैंने सुना है, लेकिन कोई सबूत नहीं है कि बाल कलाकारों को ऐसी दवाइयां दी जाती हैं."
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लसके लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस) 

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