अपने ज़माने की इस मशहूर अभिनेत्री को पहचानिये-आज भी इनका स्क्रीन सदाबहार है... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 18 नवंबर 2018

अपने ज़माने की इस मशहूर अभिनेत्री को पहचानिये-आज भी इनका स्क्रीन सदाबहार है...


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से

जीवनीपरक सिनेवार्ता, भाग 57
 
अपने नैन नक्श और प्रतिभा की बदौलत मुमताज को दी थी कड़ी टक्कर : फरीदा जलाल
पिछली क़िस्त में आप ने पढ़ा बेबी फ़रीदा के बारे में जो टीवी सीरियलों में फ़रीदा दादी के नाम से मशहूर हुई। इस बार पढ़िए कुशल अभिनेत्री फ़रीदा जलाल के बारे में जो आजकल दादियों नानियों के रोल करती हैं, लेकिन कभी शक्ति सामंत की मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू वाली सन् 1969 की फ़िल्म आराधना में अरुण (राजेश खन्ना) और वंदना त्रिपाठी (शर्मीला टैगोर) के बेटे सूरज (राजेश खन्ना) की बेहद आकर्षक प्रेमिका बनी थी। पूरी फ़िल्म वंदना त्रिपाठी के दुख-दर्द की कहानी थी।
अभी बस फ़रीदा जलाल गाथा...
पहले उसकी पहली फ़िल्म राजश्री प्रोडक्शंस की तक़दीर और अंत में  श्याम बेनेगल की फ़िल्म मम्मो...
'तकदीर' में भारत भूषण और फरीदा जलाल

तक़दीर
गोवा निर्धन संगीत शिक्षक गोपाल (भारत भूषण) प्रिय पत्नी शारदा (शालिनी) बड़ी बेटी माला, बेटा सुशील और छोटी गीता (बड़ी हो कर फ़रीदा जलाल: उम्र 18 साल) हमदर्द पड़ोसी पियक्कड़ लोबो। ऋणदाता सेठ की धमकी: एक हफ़्ते में बक़ाया चुका दो, वरना मकान...! गोपाल की साइकिल से धनी विजय (कमल कपूर) की कार की हल्की सी टक्कर। दोनों बचपन के दोस्त हैं। विजय को गोपाल के मकान के कर्ज़ के बारे में पता चलता है। वह चेक देता है। सेठ को चेक देकर गोपाल घर पर। सेठ मकान के काग़ज़ वापस करता है। शारदा चकित है। गोपाल बताता है विजय की कृपा की कहानी। शालिनी चिंतित। वह जानती है विजय का खलनायक रूप।
कुछ बचत करने के इरादे से गोपाल का जहाज़ पर नौकरी के लिए जाने लिए तैयार है। जाते जाते बच्चों  के साथ उस का गीतजब जब बहार आई और फूल मुस्कराए। वह गा रहा है, बच्चे पियानो के सुर छेड़ रहे हैं, वह उनकी ग़लती ठीक करता है।
गोपाल का जाना, जाते जाते खिलौने लाने का वादा करना। दुखी बच्चे गा रहे हैं सात समंदर पार के गुड़ियों के बाज़ार से/अच्छी सी गुड़िया लाना/गुड़िया चाहे ना लाना/ पापा जल्दी जाना।
समय बीत रहा है। एक तूफ़ानी रात। गोवा समुद्र में हलचल। दूर समुद्र में तूफ़ान में हिचकोले खाता लड़खड़ाता जहाज़ डूब जाता है। जहाज़ अधिकारी शारदा से कहता है, :मुझे अफ़सोस है जो लोग बचे हैं उनकी सूची में तुम्हारे पति का नाम नहीँ है। दुखियारी शारदा घर पहुँचती है। बच्चे गा रहे हैं, पप्पा जल्दी जाना।घर का सामान बेचा जा रहा है। शारदा पियानो बेचने से मना कर देती है। खलनायक विजय ने मकान अपने नाम करा लिया है। शारदा का परिवार संकट में पड़ जाता है। वह काम तलाशती एक आदमी के पास पहुँचती है। घर में नौकरी करना चाहती है, घर के काम करूँगी जो भी कहोगे करूँगी। वह पूछता है, जो भी कहूँगा करोगी?” मतलब समझ कर शारदा लौट आती है। पड़ोसी लोबो बच्चों के खाने के लिए कुछ लाता है। घर की हालत उस से देखी नहीं जा रही।
एक दिन विजय ने देखी शारदा की दुर्दशा। बोला, क्यों नहीं शादी कर लेतीं मुझ से। शारदा ने इनकार कर दिया। कुछ भी हो तुम से शादी नहीं करूंगी।
एक दिन शुभ चिंतक लोबो हिचकता हिचकता कहता है, बैठे बैठे एक ख़्याल गया, सोचा तुम से कहूंगा, तुम शादी क्यों नहीं कर लेतीं। शारदा नाराज़ हो उठती है। वह समझाता रहता है। शारदा एक घर में कपड़े धोने का काम करती है। पर गुज़ारा नहीं हो पाता। भूखे बच्चे कमज़ोर हो गए हैं। एक दिन तो सुशील ठेले से पाव रोटी चुरा लाया। बच्चे खा रहे हैं। शारदा को आया देख छिपाना चाहते हैं। शारदा हिम्मत हार जाती है।
विजय के पास जा कर शादी के लिए हां कर देती है। नए कपड़े पहनते बच्चे उदास हैं। गंभीर मुद्रा में विजय और शारदा पतिपत्नी बन जाते हैं।
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'आराधना' में राजेश खन्ना और फरीदा जलाल

कई साल बाद:
पूर्वी अफ़्रीका। शैतान बच्चे एक पागल पर पत्थर फेंक रहे हैं। यह फटे पुराने कपड़े और बढ़े केश और दाढ़ी वाला गोपाल है। याददाश्त जा चुकी है। उसे किसी और को पता है कि वह कौन है, कहां का है, क्या नाम है।
काफ़ी समय बाद कोई भारतीय बस्ती। क्लब। पार्टी। हिंदुस्तान से आई एक लड़की क्लब में गा रही है वही गीत: ‘जब जब बहार आई और फूल मुस्कराए गीत के स्वर गोपाल तक पहुंचते हैँ। मन में कुछ जागता है। क्लब जाता है। पूछता है यह गीत कहां सीखा, किस से सीखा। वह गोपाल की कोई पुरानी शिष्या है बताती है गोवा में। गोपाल को सब कुछ याद गया। गाने वाली बच्ची का भलामानस बाप उसके गोवा जाने का बंदोबस्त कर देता है।
शारदा और बच्चे अब धनी हैं।  छुटकी गीता अब बड़ी हो गई है। अब फ़रीदा जलाल है। दोस्ती वाला सुशील कुमार अब सुंदर है। और शारदा? अब भी मन से गोपाल की है। अब मुस्कराती नहीं। गीता स्वयं कहती है कि उस ने एक ज़माने से मम्मी को ख़ुश नहीं देखा।
गोपाल जानता समझता है कि उस का परिवार अभी तक मन से उसका है, पर कैसे बताए कि वह लौट आया है। उस फटेहाल बूढ़े निर्धन गोपाल को वे कैसे अपना पाएंगे।
नए साल के जश्न पर गीता गा रही है वही गीत जब जब बहार आई और फूल मुस्कराए। गोपाल अपने को रोक नहीं पाता। मजलिस में गीता के सामने जाता है। वह पहचानती नहीँ। उत्सुक हो कर कई बार उस  का पीछा करती है। उसकी झोंपड़ी जा पहुंचती है। आपस में पहचान कर दोनोँ अपनेपन की डोर में बंध जाते हैं।
विजय को गोपाल की वापसी का पता चलता है तो वह उसे मरवाने का हर जतन करता है। एक बड़े रोमांचक क्लाईमैक्स में विजय अपनी खान में डायनामाइट विस्फोट से गोपाल का मारना चाहता है। शारदा सहित सब बच्चे उसे बचाने दौड़ते हैं। अंत में विजय खड में गिर कर मर जाता है। गोपाल का सुखी परिवार फिर से एक हो जाता है।
यह 18 साल की फ़रीदा जलाल की पहली फ़िल्म थी। युवा गीता के रूप में वह फ़िल्म का मुख्य आकर्षण बन गई थी।

बॉबी’ की निक्की
सन् 1949 में नई दिल्ली में जन्मी फ़रीदा भी उसी टेलैंट कन्टैस्ट (1965) में चुनी गई थी जिस में राजेश खन्ना भी पसंद किया गया था। तक़दीर (1967) से  अब तक उस ने लगभग 200 से ज़्यादा फ़िल्मों में और कई टीवी सीरियलों में काम किया हैआकर्षक किशोरी से बड़ी बूढ़ी दादी तक। जितनी फ़िल्में उतने ही अलग अवतार वह लेती रही है। लेकिन मेरी निगाह में 1973 की बॉबी की पागल सी निक्की जैसी अर्धविकसित मस्तिष्क वाली लड़की शायद वही बन सकती थी। अलका शर्मा यानी निक्की की पूरी कहानी नीचे के फ़ोटो से अपने आप बयान हो जाती है।
मम्मो
उसकी सब से अधिक महत्व की फ़िल्म है श्याम बेनेगल निर्देशित 1994 की मम्मो जिस में वह नायिका थी। उसके साथ थी मम्मो की बहन फ़य्याजी के रूप में बेजोड़ अभिनेत्री सुरेखा सीकरी।फ़िल्म क्या थी – दो बूढ़ी बहनों की बराबरी की जुगलबंदी थी।उनके बीच और उनके ध्यान काउनके प्यार का केंद्र है रियाज़ फ़य्याजी का नवासा यानी बेटी का बेटा। यह जो मम्मो है उसके कई रंगरूप हैं- 
बच्चियों को क़ुरान सिखाती हैबहन के नवासे रियाज़ पर कड़ी नज़र रखती हैपर मोम का दिल हैउसकाहँसती खिलखिलाती हैबच्ची बन जाती हैरियाज़ के साथ सिगरेट भी पी लेती हैवह प्लेब्वॉय मैगज़ीन लड़कियों की अश्लील तस्वीरें देखता है और नानी से डाट खाता है तो बचाती हैकहती है बच्चा जवान हो रहा है। नाराज़ होती है तो तीख़ी ज़बान में बात करना जानती है। एक बार बच्चे रियाज़ ने उसे मेहमान कह दिया तो रूठ कर हाजी मस्तान की दरगाह में जा बैठी थी।
'मम्मो' में फरीदा जलाल

अब यह जो मेहमान वाली बात है कुछ ग़लत भी नहीं है। वह पाकिस्तान से आई है अपनी बहन के पास। दोनों का जन्म पानीपत में हुआ था। मम्मो पाकिस्तान पहुंच गई, फ़य्याजी को वक़्त अपनी मरहूम बेटी के घर ले आया रियाज़ की परवरिश के लिए। देश की मिट्टी से बिछड़ने का ग़म क्या होता है यह दरशाने के लिए दोनों को एम.एस. सत्यु की फ़िल्म गरम हवा देखते दिखाया गया है। उसमें घर छोड़ने की ज़िद पर अड़ी दादी की मौत वाला सीन देख कर फ़य्याजी को अपना पानीपत याद जाता है।
मम्मो की दास्तान का विषय ही है विभाजन की त्रासदी का मार्मिक पक्ष। विभाजन के पचास साल बाद मम्मो पाकिस्तान से आई है। हर महीने हाज़री लगाने वह रियाज़ के साथ थाने जाती है तो पुलिस अधिकारी से उसके बीवी-बच्चों का हाल भी पूछ बैठती है!
मम्मो के आने की ख़बर रियाज़ (अमित फाल्के) को अच्छा नहीं लगी थी। कहें तो पूरी फ़िल्म मम्मो और रियाज़ के बिगड़ते सुधरते संबंधों के गहन लगाव की ही कहानी है 

अरविंद कुमार
जवान रिायाज (रजित कपूर) मम्मो के संस्मरण। यह लिखने की प्रेरणा रियाज़ को मिली इस ख़बर से मम्मो एक बार फिर रही है। उसे याद है कि पिछली बार मम्मो को ज़बरदस्ती पाकिस्तान वापस भेज दिया गया था।

इस बार मम्मो आई है तो एक बार फिर वापस जाने के इरादे से आई है। आई तो है पर जल्दी अपने आप को मृत घोषित करवा देती है। अब कौन निकालेगा उसे? दुनिया के लिए अब वह है ही नहीं!     
सिनेवार्ता जारी है...

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(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लसके लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक - पिक्चर प्लस) 
(नोट-पिछले भाग में भुूलवश तस्वीरें गलत प्रकाशित हो गई थी, जिन्हें बदल दिया गया है। हम क्षमाप्रार्थी हैंँ।)

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