2.O यानी वशीकरणाी कलाओं से युक्त एक सुपरसिनेमा - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 1 दिसंबर 2018

2.O यानी वशीकरणाी कलाओं से युक्त एक सुपरसिनेमा


बॉलीवुड को सुपरस्टार तो बहुत पहले मिल चुका है
लेकिन सुपर सिनेमा अब बना है

रजनीकांत और अक्षय कुमार


फिल्म समीक्षा
2.0
निर्देशक - शंकर
कलाकार - रजनीकांत, अक्षय कुमार, एमी जैक्सन, आदिल हुसैन
*रवींद्र त्रिपाठी
फिल्म 2.0 को देखने के बाद मन में सबसे पहला खयाल यही आता है कि आखिरकार निर्दशक शंकर ने इसमें अंत की ओर बढ़ते हुए अक्षय कुमार को राक्षसी चेहरेवाला खलनायक क्यों बना दिया? ऐसा खलनायक जिसके दो लंबे दांत बाहर निकले हुए हों। हालांकि पूरी फिल्म में ऐसा नहीं है। अक्षय कुमार अपने आरंभिक दृश्यों में झोलाछाप सामाजिक कार्यकर्ता की तरह भी दिखे हैं जो पक्षियों की सुरक्षा के लिए लगा है। लेकिन निर्देशक को तो रजनीकात को सुपरहीरो की तरह दिखाना था। इसलिए अक्षय कुमार को बलि का बकरा बना दिया। इसलिए  फिल्म में एक अच्छा भला  शख्स अंत आते आते दानवी शक्ति वाला दीखता है। और इसी कारण फिल्म अपनी भीतरी चमक भी खो देती है। फिल्म मध्यांतर के पहले हंसी मजाक से भरी है और लुभाती है लेकिन उसके बाद निर्देशक के ही बनाए जाल में फंसकर अपनी चमक खो देती है।
फिल्म की कहानी
वैसे `2.0 रजनीकांत की पुरानी फिल्म `रोबोट का ही सिक्वेल है। उसी की तरह रजनीकांत यहां भी डॉक्टर वशीकरण बने हैं। वशीकरण ने चित्ति नाम का जो रोबोट बनाया था (जिसकी भूमिका भी रजनीकांत ने निभाई है।) वो भी हां है। `2.0 में वशीकरण के सामने एक नई समस्या आ गई है। लोगों के मोबाइल फोन अचानक उड़कर गायब होने लगे हैं। कोई अपनी प्रेमिका से बात कर रहा है तभी उसका मोबाइल उसके हाथों से छिटककर हवा में गायब हो जाता है। एक महिला अपने पति से बात कर रही है तभी उसका मोबाइल आसमान की तरफ जाकर गुम हो जाता है। ऐसे वाकये कई होते हैं और हर जगह अफरातफरी मच जाती है। प्रशासन को भी समझ नहीं आता कि क्या करें? फिर एक एक मोबाइल टावर भी गिरने लगते हैं। मोबाइल सप्लाई करनेवाले ट्रक रास्ते में ही चकनाचूर होने लगता है। लोगों की जिंदगी थम जाती है क्योंकि मोबाइल नहीं तो जीवन क्या? आखिरकार डॉ वशीकरण के ऊपर ही ये जिम्मेदारी आती है वो पता लगाए कि ऐसा क्यों हो रहा है। वशीकरण अपनी सहयोगी नीला (एमी जैक्सन), जो दरअसल को मानव आकृति की कंप्यूटर ही है, के सहयोग से ये पता लगाने में काययाब हो जाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है?  वो फिर से डिक्टेएक्टेट हो चुके चित्ति को फिर से एक सक्रिय करता है।  इसी के बाद पक्षीराजन (अक्षय कुमार) का कहानी में आगमन होता है। पक्षीराजन पक्षियों को प्यार करनेवाला शख्स है। मोबाइलों के गायब होने के पीछे वही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ और पक्षीराजन की आत्मा ऐसा क्यों कर रही है इसी को आगे दिखाया गया है।
फिल्म का संदेश
`रोबोटकी तरह `2.0 भी एक वैज्ञानिक फैंटेसी है। वीएफएक्स ग्राफिक्स के खेल यहां भी काफी है। फिल्म में ये मुद्दा उठता है कि आखिर तकनीक किसके लिए?  क्या तकनीक यानी टेक्नोलॉजी का निर्माण करनेवालों को ये खयाल नहीं रखना चाहिए कि समाज या पर्यावरण पर क्या असर पैदा हो रहा है। `2.0 कहती है कि मोबाइल टॉवरों की वजह से जो विकिरण यानी रेडिएशन पैदा होता है उसका पक्षियों पर असर पैदा होता है और वे जल्द ही मर जाते हैं। पूरा मोबाइल उद्योग पक्षी विरोधी हो गया है। और अगर पक्षी खत्म हो गए तो कीड़ों को कौन मारेगा और खेती का क्या होगा? ऐसे कई और सवाल भी इस फिल्म में उभरते हैं। इस तरह निर्देशक का पूरा जोर वैज्ञानिक उन्नति और पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने पर है।

अक्षय कुमार को विलेन क्यों बनाया?

निर्देशन और अभिनय
रजनीकांत के भक्त या फैन काफी बड़ी संख्या में हैं। उनको ये फिल्म पसद आनी चाहिए। पर क्या बाकी के दर्शक भी इस फिल्म पर वैसे ही फिदा होंगे जैसे रजनी के फैन होते हैं? कहना कठिन है। एक सही मुद्दे को उठाकर भी यह पिल्म रजनीकांत के ग्लैमर में फंस जाती है और एक पक्षीप्रेमी की आत्मा को भुतहा बना देती है। ये इसकी एक बड़ी कमजोरी है। दूसरे इसमें हास्य तो है लेकिन उसके जज़्बाती पहलू कमजोर है। एमी जैक्सन भी फिल्म में नीला नाम मानव आकृति की कंप्यूटर ही बनी है और उनके पास मुस्कुराने और दूसरे कंप्यूटर को ठीक करने के अलावा दूसरे काम नहीं है इसलिए भी उनकी भूमिका सीमित हो गई। हां, अंत मे नीला और चित्ति को एक साथ करके निर्देशक ने ये जताया है कि कंप्यूटर में भी भावनाएं हो सकती है। `रोबोट   में भी यही दिखाया गया था। इससे कहानी में थोड़ा सा रोमांटिक पहलू भी आ गया है। लेकिन क्या ये पर्याप्त हैँ? खासकर हिंदी भाषी दर्शकों के लिए जो रजनीकांत का चेहरा देखकर बावले नहीं हो जाते हैं।
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क -9873196343

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