‘तीसरी कसम’ दिल्ली के ‘गोल्चा’ में एक दिन चली लेकिन फिल्म इतिहास में अमर हो गई - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 16 दिसंबर 2018

‘तीसरी कसम’ दिल्ली के ‘गोल्चा’ में एक दिन चली लेकिन फिल्म इतिहास में अमर हो गई


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–61
(कवि, गीतकार शैलेंद्र की पुण्यतिथि 14 दिसंबर पर विशेष)

'माधुरी' पत्रिका का एक पन्ना

आजकल से चौवन साल पहले अक्तूबर 1964 बंबई। तैंतीस साल की उम्र में सुचित्रा (बाद में नाम बदल कर माधुरी) का संपादक बन कर टाइम्स परिवार में शामिल हुआ था। वहां दिल्ली से जान पहचान वाले कुछ ही लोग थे। नवभारत टाइम्स के स्थानीय संपादक महावीर अधिकारी, पराग के संपादक आनंद प्रकाश जैन। हिंदी ब्लिट्ज़ के सहायक संपादक नंदकिशोर नौटियाल जो सन् 1953 से ही मेरे घनिष्ठ थे और संपादक मुनीश नारायण सक्सेना जो मॉडल टाउन में मेरे घर से कुछ ही दूरी पर ही रहते थे। पहले हफ़्ते ही में मुनीश ले चले मुझे शैलेंद्र जी के घर – रिमझिम। वहां कुछ लोग उनके साथ थे। अनौपचारिक वातावरण। मैंने शैलेंद्र जी को हवाला दिया पीपल्स पब्लिशिंग हाउस में हिंदी संपादन विभाग के मुंशी जी का। डॉक्टर रामविलास शर्मा के छोटे भाई का नाम तो था रामशरण शर्मा, पर वे मुंशी नाम से ही जाने जाते थे। मैं सरिता में था जो मुंशी जी के दफ़्तर के पास ही था। लंच ऑवर में वह शैलेंद्र के लोक गीत सुनाते, उनके इप्टा (इंडियन पीपल्स थिएट्रिकल एसोसिएशन) की सदस्यता के बारे में बताते थे, उनकी वह पंक्ति सुनाते – अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर। मुंशी के नाम ने जादुई असर किया। मैं शैलेंद्र जी का अपना बन गया। कहूं तो छोटा भाई। मैंने कहा, “बस, अब बंबई में अपने दूसरे हीरो राज कपूर से मिलना बाक़ी है, तो उन्होंने कहा, मैं ख़ुद ले चलूंगा उनके पास। उस पहली मुलाक़ात के अंत में राज ने मुझ से कहा था, तुम शैलेंद्र के दोस्त हो, मेरा दरवाज़ा तुम्हारे लिए चौबीस घंटे खुला रहेगा। बंबई प्रवास के मेरे चौदह साल में राज ने यह वादा पूरी तरह निभाया भी।
उन दिनों तीसरी क़सम बन रही थी -शैलेंद्र का संगीतमय सपना। उसके बारे में उनके बेटे दिनेश शैलेंद्र ने लिखा है:
[शुरूआत हुई बिमल रॉय के दफ़्तर में। शैलेंद्र किसी मीटिंग के लिए गए थे। बिमल रॉय के सहायकों से बातचीत कर रहे थे। कुछ सीनियर एक नए सहायक की रैगिंग कर रहे हैं। नए सहायक का नाम था बासु भट्टाचार्य...। शैलेंद्र ने पूछा, “बात क्या है?” बताया गया, “उसके पास एक पाकेट बुक है, जिससे अलग नहीं होता। यह किताब थी महान लेखक फणीश्वर नाथ रेणु की कुछ कहानियों का संकलन। बासु ने बतलाया, मुझे इसकी एक कहानी मारे गए गुलफ़ाम बहुत पसंद है... यह होगी मेरी फ़िल्म! शैलेंद्र की दिलचस्पी जाग उठी। एक दिन के पढ़ने के लिए मांगी तो बासु ने झिझकते हिचकते दे दी...।
[कहानी का मंतर शैलेंद्र पर चढ़ गया। अगले छह साल तक यह जादू उतरने वाला नहीँ था।...
[बाबूराम इशारा ने एक दिलचस्प वाक़या सुनाया-
[शैलेंद्र बड़े गर्व के साथ ले चले बासु को राज कपूर से मिलाने... मुलाक़ात कोई दो घंटे चली। राज कपूर शैलेंद्र को अपनी काटेज में ले गए। (काटेज से मतलब है सब सुख सुविधा से लैस एक काटेजनुमा स्थान जहां राज कपूर आराम करते थे, ख़ास लोगों से मिलते थे। वहां कोई कोई ही जा पाता था। वहां राज से एकांत में बातें करने का मौक़ा मुझे कई बार मिला था – अरविंद)
[राज ने कहा, कविराज, बधाई... क्या जीनियस खोज निकाला है!!!”
[शूटिंग का पहला दिन ख़त्म हुआ। वहीं राजकपूर शैलेंद्र को एक तरफ़ ले गए और बोले, प्यारे दोस्त, तुम मुश्किल में हो... इस बंदे को तो फ़िल्म बनाने का एबीसी तक नहीं आता... बस, बातें बनाना आता है।लेकिन शैलेंद्र इस नौजवान के सपने चकनाचूर होने के हक़ में नहीँ थे। निर्देशक तो बासु भट्टाचार्य ही रहेगा]
मैं निजी जानकारी के आधार पर कह सकता हूं कि फ़िल्म निर्माण में अनेक बाधाओँ का कारण होता था बासु। एक समय ऐसा आया जब शूटिंग के दौरान बासु बहुत देर से आते या आते ही नहीं थे। शूटिंग अधितकतर सहायक निर्देशक बाबूराम इशारा और कभी कभी बासु चटर्जी की देखरेख में होती थी। पोस्ट-प्रोडक्शन और संपादन का काम ठप हो गया। शैलेंद्र के शुभ चिंतक चिंतित रहते। हैंगिंग गार्डन में सुबह की सैर पर अकसर मेरी मुलाक़ात गायक मुकेश से होती थी। हमारे बीच चर्चा का एक विषय तीसरी क़सम और शैलेंद्र की कष्ट कथा होने लगा। मैंने अपील की कि वे राज कपूर से कहें कि सारी शूट की गई सामग्री (जिस का ओरछोर नहीं समझ में आ रहा था) अपने हाथ में ले कर शैलेंद्र और फ़िल्म को उबारें। कुछ महीने बाद आर.के. स्टूडियो में राज कपूर की मेहनत से जैसे तैसे संवरी तीसरी क़सम का प्रीव्यू डिस्ट्रीब्यूटरों और हम लोगों को दिखाया।
तीसरी क़सम गोलचा में रिलीज़ हुई और एक शो के बाद उतार ली गई थी!
यह बीते तीन महीने भी नहीं हुए थे कि चौदह दिसंबर सन् 1966 को राज कपूर के कविराज शैलेंद्र का देहांत हुआ।
1967 में राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड में तीसरी क़सम को भारत की श्रेष्ठ फ़िल्म घोषित किया गया।
फ़िल्म बनने के दौरान कई बार मुझे रेणु जी से मिलने का सौभाग्य मिला था। उल्लेखनीय है कि फ़िल्म के जादुई संवाद स्वयं रेणु जी ने लिखे थे। तभी उसमें माटी की गंध आती है।
उस ज़माने में तीसरी क़समपर माधुरी मॆ कई लेख छपे थे। उन में से एक वहीदा रहमान का था:
हीराबाई. जो चाह कर भी हीरामन के लिए सावित्री न बन सकी।


शैलेंद्र का जीवन काल कुल 43 साल में सिमट गया था जिनमें से कुल सतरह (17) साल वह फ़िल्मों में सक्रिय रहे और 864 फ़िल्म गीत लिख कर हिंदी को एक भरापूरा साहित्य दे गए - उभरते स्वतंत्र भारत की मानसिकता का दर्पण।
सैकड़ों गीतकारों के बीच राज कपूर के कविराज का अंदाज़ कुछ अलग था। वैसा ही जैसाकि हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे /कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े बयां और।लेकिन ग़ालिब की ज़बान भारी भरकम फ़ारसी लफ़्जों से भरी थी तो शैलेंद्र आम आदमी की बोली में गहरी से गहरी बात कहते थे।
इस क़िस्त में मैँ शैलेंद्र जी के कुछ ही गीतों की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं। राज कपूर के लिए मेरा नाम जोकर तक बहुत लिखा जो हमेशा याद रहेगा। मैं सिर्फ़ पहली दो (बरसात और आवारा) की बात करूंगा। और बरसात(1949) के दो गीतों में मैं सिर्फ़ कैबरे वाला गीत। यह दो विरोधी स्तरों पर एक साथ चलता है। एक तरफ़ रेस्तराँ में अल्मस्त प्रेमनाथ नर्तकी कुक्कू के साथ नाचगा रहा है:‘पतली कमर है तिरछी नज़र है खिले फूल सी तेरी जवानी तो दूसरी तरफ़ बिरहन निम्मी पुकार रही है: ‘आ जा मेरे मनचाहे बालम आ जा तेरा आँखों में घर है।एक तरफ़ ऐश और मौज मस्ती में डूबा रहने वाला प्लेबाय प्रेमनाथ तो दूसरी तरफ़ प्रेम में डूबी बिरहन निम्मी:
-पतली कमर है तिरछी नज़र है /खिले फूल सी तेरी जवानी /कोई बताये कहाँ क़सर है
-ओ आजा मेरे मनचाहे बालम /आजा तेरा आँखों में घर है
-मैं चंचल मदमस्त पवन हूँ /झूम झूम हर कली को चुमूँ
-बिछड़ गयी मैं घायल हिरणी /तुमको ढूँढूँ बन बन घूमूँ
-मेरी ज़िंदगी मस्त सफ़र है /पतली कमर है तिरछी नज़र है
-तुम बिन नैनों की बरसातें /रोक न पाऊँ लाख मनाऊँ
-मैं बहते दरिया का पानी /खेल किनारों से बढ़ जाऊँबँध न पाऊँ/नया नगर नित नयी डगर है/पतली कमर है तिरछी नज़र है।
(कहा जाता है कि यह गीत सुन कर शैलैंद के पिताजी ने कहा था, जा किसी कूएं में डूब मर!”)
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आवारा का आवारा हूँ गीतपूरी दुनिया गा रही थी। लेकिन उसका आधार गीत था:
पतिवरता सीता माई को /तू ने दिया बनवास
क्योँ न फटा धरती का कलेजा /क्योँ न फटा आकाश /
जुलुम सहे भारी जनक दुलारी/जनक दुलारी राम की प्यारी
फिरे मारी मारी जनक दुलारी /जुलुम सहे भारी जनक दुलारी
गगन महल का राजा देखो /कैसा खेल दिखाए
/सीप का मोती, गंदे जल मेँ /सुंदर कँवल खिलाए
/अजब तेरी लीला है गिरधारी /जुलुम सहे भारी जनक दुलारी

इस से भी बढ़ कर थे आवारा के अभी तक बेजोड़ स्वप्न दृश्य के बोल:
तेरे बिना - आग - ये चाँदनी, तू आ जा /तेरे बिना - बेसुरी बाँसरी, ये मेरी ज़िंदगी - दर्द की रागिनी /तू आ जा, तू आ जा
ये नहीँ है, ये नहीँ है - ज़िंदगी -ज़िंदगी /ये नहीँ ज़िंदगी
/ज़िंदगी की ये चिता - मैं ज़िंदा जल रहा हूँ, हाय
/साँस के, ये आग के - ये तीर - चीरते हैँ - आरपार -आरपार
/मुझ को ये नरक ना चाहिए
/मुझ को फूल, मुझ को गीत, मुझ को प्रीत चाहिए
/मुझ को चाहिए बहार, मुझ को चाहिए बहार
/घर आया मेरा परदेसी, प्यास बुझी मेरी अँखियन की
/घर आया मेरा परदेसी, प्यास बुझी मेरी अँखियन की..
/तू मेरे मन का मोती है, इन नैनन की ज्योती है
/याद है मेरे बचपन की, /घर आया मेरा परदेसी..
/अब दिल तोड़ के मत जाना, रोती छोड़ के मत जाना
/क़सम तुझे मेरे असुअन की, घर आया मेरा परदेसी
/घर आया मेरा परदेसी, प्यास बुझी मेरी अँखियन की
/घर आया मेरा परदेसी, प्यास बुझी मेरी अँखियन की..
तू मेरे मन का मोती है, इन नैनन की ज्योती है
/याद है मेरे बचपन की, घर आया मेरा परदेसी /
अब दिल तोड़ के मत जाना, रोती छोड़ के मत जाना
/क़सम तुझे मेरे असुअन की, घर आया मेरा परदेसी
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राज कपूर से आगे बढ़ें तो:
मधुमती के सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं और चढ़ गयो पापी बिछुआ
तीसरी क़सम के चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजरे वाली मैना और लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया
दिल एक मंदिर का रुक जा रात ठहर जा रे चंदा
गाइड के वहाँ कौन है तेरा जाएगा कहाँ’, ‘आज फिर जीने की तमन्ना है,औरदिन ढल जाए रात न जाए
काला बाज़ार का खोया खोया चांद
जंगली में चाहे कोई मुझे जंगली कहे और अय्याअय्या सुक्कू सुक्कू
दूर गगन की छाँवकाजिन रातों की भोर नहीं है आज ऐसी ही रात आई है
ऐन ईवनिंग इन पैरिसकारात के हमसफ़र, थक के घर को चले/ झूमती आ रही है सुबह प्यार की/ देख कर सामने रूप की रोशनी/ फिर लूटी जा रही है सुबह प्यार की
कन्हैया (निर्देशक चरित्र अभिनेता ओम प्रकाश) कारुक जा ओ जाने वाली रुक जामैं भी हूँ तेरी मंज़िल का’ – (यह जो जाने वाली है, वह ढलान पर लुढ़कती शराब की बोतल है!)
सीमा का तू प्यार का सागर है तेरी एक बूँद के प्यासे हम
पतिता का मिट्टी से खेलते हो बार बार किसलिए
मोतीलाल की छोटी छोटी बात का कुछ और ज़माना कहता है कुछ और है ज़िद मेरे दिल की
परखकाओ सजना बरखा बहार आई
यहूदी का यह मेरा दीवानापन है या मोहब्बत का सुरूर/दिल से तुझ को बेदिली है, मुझ को है दिल का ग़रूर
ब्रह्मचारी का मैं गाऊं तुम सो जाओ
अनुराधा का कैसे बीते दिन कैसे बीतीं रतियाँ
बंदिनी के अब के बरस भेज भैया को बाबुलऔर ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना
ज्वैल थीफ़ का होंठों में ऐसी बात मैं दबा के चली आई
दो बीघा ज़मीन का हरियाला सावन ढोल बजाता आया
संगीत सम्राट तानसेनकाझूमती चली हवा
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कुछ गीत मैं ने अब तक बचा कर रखे थे – जैसे कमाल अमरोही निर्मित और किशोर साहू निर्देशित मीना कुमारी और राज कुमार वाली दिल अपना और प्रीत पराई का अजीब दास्ताँ है ये;। पढ़िए पूरे बोल:
अजीब दास्ताँ है ये /कहाँ शुरू कहाँ ख़तम /ये मंज़िलें है कौन सी /न वो समझ सके न हम /ये रोशनी के साथ क्यूँ /धुंआ उठा चिराग़ से /ये ख़्वाब देखती हूँ मैंके जग पड़ी हूँ ख़्वाब से / अजीब.. /मुबारकें तुम्हें के तुम किसी के नूर हो गए /किसी के इतने पास होके सबसे दूर हो गए /अजीब.. / किसी का प्यार ले के तुम / नया जहां बसाओगे /ये शाम जब भी आएगीतुम हमको याद आओगे/अजीब..
और अंत में हृषीकेश मुखर्जी की अनाड़ी के कुछ गीत किसी की मुस्कराहटों पर हो निसार और दिल की नज़र से

अरविंद कुमार
इन के भी बाद शैलेंद्र को परिभाषित करने वाले सब कुछ सीखा हम ने गीत के पूरे बोल - 
सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी
सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी
दुनिया ने कितना समझाया
कौन है अपना कौन पराया
फिर भी दिल की चोट छुपा कर
हमने आपका दिल बहलाया
खुद ही मर मिटने की ये ज़िद है हमारी
सच है दुनिया वालों...
दिल का चमन उजड़ते देखा
प्यार का रंग उतरते देखा
हमने हर जीने वाले को
धन दौलत पे मरते देखा
दिल पे मरने वाले मरेंगे भिखारी
सच है दुनिया वालों...
असली नकली चेहरे देखे
दिल पे सौ सौ पहरे देखे
मेरे दुखते दिल से पूछो
क्या क्या ख्वाब सुनहरे देखे
टूटा जिस तारे पे नज़र थी हमारी
सच है दुनिया वालों...
शैलेंद्र जी के बेटे दिनेश ने उन्हें सही ही कहा है –अनाड़ी प्रौड्यूसर



सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)  

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