पाकिस्तानी कोक स्टूडियो को दुनिया में पहचान दिलाने वाली इस सिंगर का है भारत से अटूट रिश्ता - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

पाकिस्तानी कोक स्टूडियो को दुनिया में पहचान दिलाने वाली इस सिंगर का है भारत से अटूट रिश्ता

अपनी प्रस्तुति देती हुईं गायिका माई धाई


*तेजस पूनिया

भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के साझा इतिहास पर अब तक तमाम किताबें लिखी गई होंगी। उस साझा इतिहास को समझने के लिए तमाम शख्सियतों का भी जिक्र किया जाता है। ऐसी ही एक शख्सियत है पाकिस्तान की वयोवृद्ध लोक गायिका माई धाई (Mai Dhai)। माई धाई की उपलब्धियों पर पाकिस्तान निश्चित ही गर्व कर सकता है। हालांकि पाकिस्तान की झोली में अंगुलियों पर गिनने लायक ही ऐसे लोग हैं जिन पर वह गर्व कर सकता है मसलन मलाला युसुफजई आदि। लेकिन कला संगीत जगत में ये आंकड़े थोड़े अधिक हैं जैसे कि उस्ताद गुलाम अली, अदनान समी, नूर जहां , फवाद खान, शफ़कत अमानत अली, गुलजार, फरीदा खानुम, राहत फतेह अली खान, अली जफ़र, आतिफ़ असलम, नुसरत फतेह अली खान, मेहंदी हसन, रेशमा आदि।
बात माई धाई की दुनिया की करते हैं।
माई धाई ने दुनिया के सामने पाकिस्तान के कॉक स्टूडियो से पहचान बनाई। साल 2008 में आतिफ़ असलम के साथ उन्होंने गाना गाया। यह गाना पारम्परिक यानी फॉक था कदी आओ नी रसीला म्हारे देस। यह गाना 2008 में आया और इस गाने ने माई को विश्व प्रसिद्ध बना दिया। इसके बाद उनका सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला तथा उन्ही के द्वारा कम्पोज किया गया गाना था हो मन जहां साल 2015 में यह गाना रिलीज किया गया। यूं तो माई ने दस वर्ष की छोटी सी उम्र में ही गाना आरम्भ कर दिया था।
राजस्थान से रहा रिश्ता
माई धाई का जन्म सन् 1943 में बाड़मेर, राजस्थान में हुआ। जमाल साब (हार्मोनियम प्लेयर) और ढोल बजाने वाले मोहम्मद फकीर के साथ मिलकर माई धाई ने माई ढई नाम से अपना एक बैंड बनाया। माई के बैंड ने यूएस तक में भी एस०एक्स०एस० डब्ल्यू संगीत (Southwest Music Festival) 2015 में अपनी परफोर्मेंस दी है। माई जिस मुस्लिम लंघा जनजाति से ताल्लुक रखती है इनकी मां भी उस जनजाति की एक प्रसिद्ध गायिका थीं। 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात् माई का परिवार सिंध प्रांत पाकिस्तान के 'हवेली' उमरकोट में बस गया। दस साल की उम्र में अपनी मां से विधिवत संगीत प्रशिक्षण इन्होंने आरम्भ किया लेकिन 2013 में लाहुटी में लाइव म्यूजिक करने के बाद इन्हें प्रसिद्धि मिली। इसके अलावा इन्होंने साल 2015 में पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास में कुछ संस्थाओं के साझे सहयोग से हुए कार्यक्रम में अपनी कला का जादू बिखेराब्रॉडवे के साथ एक साक्षात्कार में वे कहती हैं, "मुझे अपनी आवाज़ और संस्कृति में विश्वास है," यहां चारों ओर की चीजें बड़ी कठोर हो जाती हैं, खासकर जब मंच पर एक महिला के गाने की बात आती है। मैं मंगलियार की जनजाति की एकमात्र महिला हूंजिसने इतने बड़े मंच पर प्रदर्शन किया है लेकिन मुझे उम्मीद है कि चीजें भविष्य में बेहतर हो जाएंगी
कोक स्टूडियो में आने से पहले एक्सप्रेस ट्रिब्यून को दिए एक साक्षात्कार में एक्सप्रेस ट्रिब्यून के सैफ ने कहा कि -"जिस शैली में माई धाई कोक स्टूडियो पर प्रदर्शन कर रही है वह उनकी अपनी प्राकृतिक शैली है, जबकि हमने संगीत की हमारी अपनी शैली को शामिल करने की कोशिश की है उनके अंदर, ताकि वे अपने मूल राजस्थानी स्वाद को बरकरार रख सके

माई धाई के गाने जो सबसे अधिक चर्चा का केंद्र बने -

"डोरो" लाहुटी लाइव (2013)
"मन मोरिया लाहुटी लाइव (2015)
"सरक सरक" - माई धाई बैंड
"ला गोरे म्हारो  "- माई धाई बैंड
"आंखरली पाहरूकाई " - कोक स्टूडियो पाकिस्तान (सीज़न 8)
"कदी आओ नी" (आतिफ असलम के साथ) - कोक स्टूडियो पाकिस्तान (सीजन 8)
इनके अलावा एक गाना फिल्म के लिए भी गायाफिल्म थी
हो मान जहां - "सरक सरक"

गाने से पहले माई धाई

माई धाई समृद्ध स्वरों के साथ एवं शास्त्रीय लोक परंपराओं का एक खूबसूरत सच है
1947 में शुरू हुआ विभाजन और उसके पश्चात् विस्थापन का दौर 1965 तक चला इस वजह से माई धाई की संगीत की दुनिया उनसे विमुख रहीसाझा विरासत एवं संस्कृति का प्रतीक ये कलावादी लोग इस कला के माध्यम से सांस्कृतिक संबंध को बरकरार रखने का काम करते हैं।
दुर्भाग्य से पाकिस्तान में संरक्षण की व्यवस्था आज लगभग गायब हो चली है और इस समुदाय के लोगों के पास शहरी क्षेत्रों में जाने और दोनों सिरों (सीमा के आर-पार) को पूरा करने के लिए या फिर कुछ भिन्न प्रकार की नौकरियां करने के अलावा इनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। लेकिन माई धाई इस मामले में भाग्यशाली कही जा सकती हैं वे एक ऐसा फूल है जो रेगिस्तान में खिलने के बावजूद अपनी सुगंध को बरकरार रखे हुए है।

माई धाई अपने नाम के अर्थ को लेकर एक इंटरव्यू में कहती हैं कि – मेरे नाम का अर्थ है जिसने भोजन खाया है लेकिन साथ ही वे यह भी कहती हैं कि - विडंबना यह है कि मेरे जीवन के एक बड़े हिस्से में मैंने बहुत बार भोजन नहीं देखा है।

अफसोस की बात है, माई धाई संगीत की इस शैली से जुड़ी आखिरी महिला है। वे कहती हैं, "हमारी जनजाति में कई लड़कियाँ हैं जो बहुत अच्छी तरह से गा सकती हैं लेकिन सामाजिक दबाव के कारण बाहर नहीं जा सकतीं और ना ही अपनी कला सार्वजनिक कर सकती हैं।" वे कहती हैं कि - "मेरे समुदाय के लगभग हर व्यक्ति ने मेरी सार्वजनिक उपस्थिति का विरोध किया। उन विरोधियों का कहना था कि अगर मैं सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करती रही तो कोई भी मेरी बेटियों से विवाह नहीं करेगा। यही कारण है कि मैं थार में प्रदर्शन करते समय घूंघट (विशेष रूप से हिंदू महिलाओं द्वारा एक डुप्टा के साथ चेहरे छुपा लेना) किया करती हूं
1960 से लेकर वर्तमान तक वे गीत-संगीत की दुनिया में निरंतर अपना योगदान पूर्ण जज्बे के साथ दे रही है। 
*स्वतंत्र लेखक एवं पूर्व छात्र - राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय
संपर्क - 9166373652 /  8802707162
Email - tejaspoonia@gmail.com

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