मिलिये द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के लालू प्रसाद यादव से... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 30 दिसंबर 2018

मिलिये द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के लालू प्रसाद यादव से...

आने वाली चर्चित फिल्म

द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म में लालू प्रसाद यादव की भूमिका निभाने वाले अभिनेता विमल वर्मा से बातचीत
 
लालू की भूमिका में विमल वर्मा

पिक्चर प्लस – विमल जी, इस अहम फिल्म का हिस्सा बनने के लिए आपको बहुत सारी बधाई और शुभकामनाएं। सबसे पहले तो आप अपने किरदार के बारे में बताएं कि सोनिया और मनमोहन जैसे बड़े रोल के बीच लालू प्रसाद यादव क्या कर रहे हैं ?

विमल वर्मा – देखिये पहले तो यह बता देना चाहिये कि यह फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब पर आधारित है। रही बात लालू की तो इस फिल्म में लालू का वैसा ही किरदार है, जैसा यूपीए की सरकार के दौरान लालू की भूमिका हुआ करती थी। फिल्म में भी लालू मनमोहन सिंह के सहयोगी या कहें कि यूपीए का एक अहम हिस्सा के तौर पर नजर आते हैं। चूंकि यह फिल्म लालू पर केंद्रित नहीं हैं इसलिए इसमें लालू को मुख्य तौर पर नहीं तलाशा जाना चाहिये, हां इसमें लालू उतना ही अहम है जितना कि यूपीए में उनकी उपस्थिति। जिस तरह यूपीए में लालू मनमोहन सिंह के खिलाफ चल रही गतिविधियों के विरोध में खड़े होते थे इस फिल्म में भी लालू का वैसा ही रूप देखने को मिलेगा।

पिक्चर प्लस – लालू की भूमिका किसी ना किसी रूप में हम फिल्मों में या टीवी पर भी कई बार देख चुके हैं, सबसे खास बात ये कि इनमें हास्य के पुट अधिक होते रहे हैं। लेकिन यहां जिस लालू को आपने निभाया है, उसका मिजाज कैसा है? ये रोल आपके लिए कितना चुनौतीपूर्ण था ?

विमल वर्मा – ये रोल वाकई मेरे लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। जब ये प्रस्ताव मेरे पास आया तो मेरे सामने भी दो तरह के लालू थे। एक वास्तविक लालू जो संसद के अंदर और बाहर अपने विटी, हास्य के पुट या भीड़ का ध्यान खींचने वाली शख्सियत के तौर पर मीडिया में विख्यात हैं तो वहीं पर्दे पर मिमिक्री आर्टिस्टों द्वारा प्रस्तुत किये गये कैरेक्टर – इनको देखते हुये मैंने निश्चय किया कि मैं कम से कम लालू की मिमिक्री नहीं करुंगा। क्योंकि एक गंभीर फिल्म में लालू अगर किरदार हैं तो उनका अभिनय मुझे अपनी शैली में करना चाहिये। हां, मुझ पर लालू की परछाईं जरूर दिखनी चाहिये चाहे वह गेटअप के माध्यम से हो या कि संवाद अदायगी के जरिये। यही मैंने इस फिल्म में भी किया है। लेकिन शूटिंग के दौरान मैंने जब अनुपम खेर को देखा कि वो तो मनमोहन सिंह के बिल्कुल डुब्लीकेट की तरह नजर आ रहे हैं, उन्हीं की तरह चलना, बोलना सबकुछ तो मैंने भी कहीं कहीं प्रचलित लालू के अंदाज को अपनाया।
 
अनुपम खेर और विमल वर्मा
पिक्चर प्लस – द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर एक विशेष श्रेणी की फिल्म है। और इस फिल्म में आप एक खास रोल निभा रहे हैं। तो इस फिल्म का ट्रेलर आने के बाद जिस तरह का सियासी माहौल बना उसको देखते हुये आप क्या कहना बताना चाहेंगे कि वाकई इस फिल्म का कोई राजनीतिक मोटिव है? या यह महज मनोरंजन के लिए है?

विमल वर्मा – निश्चित तौर पर यह पोलिटिकल मोटिव की फिल्म है। मनमोहन सिंह की जिस तरह की शख्सियत रही है, और जिस प्रकार से उन पर हास्य व्यंग्य कसे जाते रहे हैं, उसे इस फिल्म को देखने के बाद बल मिलता है। दूसरी तरफ इस फिल्म की मेकिंग के साथ जो भी लोग जुड़े हैं, उनकी राजनीतिक सोच को भी देखें तो उनका मकसद साफ हो जाता है। चाहे वह मुख्य अभिनेता अनुपम खेर हों या इसके निर्माता-निर्देशक। इसके निर्देशक हैं- विजय रत्नाकर गुट्टे और निर्माताओं में रवि वोहरा, सुनील वोहरा, हंसल मेहता और राघव व्यास जैसे नाम शामिल हैं। इस फिल्म को 2019 के चुनाव से पहले सिनेमा घरों में दिखाना ही इनका मकसद था। लोकसभा चुनाव के बाद इस फिल्म का कोई महत्व नहीं रह जाता है। ये सभी इस फिल्म के जरिये एक खास राजनीतिक विचारधारा को परोसते हुये एक विशेष सियासी घराने को एक्सपोज करना चाहते थे। ताकि 2019 के चुनाव से पहले इस फिल्म को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके।

पिक्चर प्लस – इसी बहाने बॉलीवुड में राजनीतिक सिनेमा की परंपरा पर भी बात कर लेते हैं। भारत में राजनीतिक सिनेमा की अपनी शैली रही है, यह फिल्म उस परंपरागत शैली को कितना आगे बढ़ाती हुई दिखती है या कोई नई परंपरा बनाती नजर आती है?

विमल वर्मा – निश्चित तौर पर यह एक नई परंपरा स्थापित करने वाली फिल्म लगती है। क्योंकि इससे पहले अपने यहां काल्पनिक किरदारों वाली राजनीतिक फिल्में ज्यादातर बनती रही है, उनमें केवल राजनीतिक, समसामयिक हालात का वर्णन होता था और वह सब कुछ प्रतीकात्मक तौर पर घटित होता था। लेकिन मुझे लगता है द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर पहली ऐसी राजनीतिक फिल्म है, जहां किरदार अपने वास्तविक नामों से पहचाने जाते हैं। यहां संजय बारू, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, राहुल गांधी सभी इसी नाम से अभिनय कर रहे हैं। मुझे नहीं मालूम कि अपने यहां ऐसी कोई फिल्म बनी है या नहीं। लेकिन मुझे लग रहा है कि इस फिल्म ने एक नया द्वार खोल दिया है। आगे चल कर अगर कोई 2002 के गुजरात दंगे पर आधारित राणा अय्यूब की किताब पर फिल्म बनाना चाहे तो उसमें भी किताब के मुताबिक वास्तविक नाम और किरदार आएंगे तो आज की तरह ही विवाद होगा!...तो निश्चित तौर पर यह फिल्म एक नई परिपाटी विकसित करने वाली फिल्म साबित हो सकती है।    
 
फिल्म के सभी किरदार एक साथ
पिक्चर प्लस -  आगे चाहे जो हो लेकिन बॉलीवुड को लालू का नया चेहरा जरूर मिल गया है। आपकी तस्वीर और लालू की तस्वीर में जरा भी अंतर नजर नहीं आता।

विमल वर्मा- (हंसते हुये) जी धन्यवाद। असल में इस फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर विकी सिदाना ने नाम के मुताबिक मिलते जुलते चेहरे वाले किरदारों की तलाश में काफी मेहनत की है। मुझे केवल बाल कटिंग करके गोल चश्मा पहना दिया और मैं लालू बन गया। प्रणब मुखर्जी के किरदार के लिए कोलकाता जाकर कलाकार ले आये। इसी तरह सोनिया, राहुल या प्रियंका के किरदार के लिए इन्होंने काफी मेहनत की है। संजय बारू के रूप में तो अक्षय खन्ना बिल्कुल जम गये हैं। मुझे लगता है अक्षय इस किरदार के लिए काफी समय तक याद किये जायेंगे। दिलचस्प बात ये कि लालू हो चाहे अन्य किरदार किसी को भी तैयार करने में इनको ज्यादा मेकअप की जरूरत नहीं पड़ी। केवल अनुपम खेर को सरदार मनमोहन सिंह बनाने में दो घंटे का वक्त जरूर लगता था। मेकअप आर्टिस्ट मंगेश देसाई और श्रीकांत देसाई के साथ ही फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर का कमाल है कि उन्होंने किरदारों के मुताबिक कलाकारों का चयन किया और वैसा रंग रूप दिया।   
*(इस साक्षात्कार को बिना अनुमति कहीं प्रकाशित न करें।–संपादक
संपर्क-picturepus2016@gmail.com)

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