सात साल की ‘सुरैया’ जब बनी ‘मैडम फैशन’ की नरगिस’...! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 9 दिसंबर 2018

सात साल की ‘सुरैया’ जब बनी ‘मैडम फैशन’ की नरगिस’...!


सुरैया का सुरीला सफ़र-बूट करूं मैं पालिश, बाबूसे
ये कैसी अजब दास्तां हो गई हैतक
माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–60
 
सात साल की सुरैया
लाहौर में 15 जून 1929 को जन्मीं सुरैया एक साल की थी तो उसका ख़ानदान बंबई आ बसा मैरीन ड्राइव के कृष्ण महल नाम के घर में। बड़ी होने लगी तो शौक़िया गाने लगी। बचपन में ऑल इंडिया रेडियो के बंबई स्टेशन गाने लगी थी।
बाल कलाकार के रूप में सात साल की सुरैया की पहली फ़िल्म थी 1936 की मैडम फ़ैशन। निर्देशक थीं अपने ज़माने की फ़िल्मों में चोटी की जद्दन बाई। वही नायिका थीँ, वही गीतकार, संगीतकार, और गायक भी। फ़िल्म में सुरैया के साथ एक और बाल कलाकार थी जद्दन बाई की बेटी नरगिस। बाल कलाकार के रूप में उसकी एक और फ़िल्म थी उसने क्या सोचा’ (1937)। बाल कलाकार सुरैया ने नई दुनिया’ (1942) में नौशाद के निर्देशन में पहला गीत बूट करूं मैं पालिश बाबूगाया था।
हमारी बात’ (1943) उसके लिए सुनहरी मंज़िल साबित हुई। देविका रानी जैसी नायिका और डैविड अब्राहम, पी. जयराज और राज कपूर जैसे बड़े कलाकारों के साथ अभिनय और अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में तब के प्रसिद्ध गायक अरुण कुमार से साथ चार सहगान करवटें बदल रहा है आज सब जहां’, ‘साक़ी की निगाह शराब है’, ‘बिस्तर बिछा दिया है तेरे दर के सामनेऔर जीवन जमुना पार मिलेंगे गानाअपने आप में सफलता का सर्टिफ़िकेट था।
सुरैया के सुरीले सफ़र में बहुत बड़ा पड़ाव बनी 1943 की दीवान शरर के प्रसिद्ध उपन्यास Gong of Shiva पर आधारित निर्देशक जे.के. नंदा की पहली फ़िल्म इशारा। इसमें पृथ्वीराज, जगदीश, के.एन.सिंह, प्रतिमा देवी, वत्सला कुम्टेकर, स्वर्ण लता तथा अलकनंदा के नामों के साथ घोषित किया गया था : “Introducing the New Find S U R A I Y A Who Will Soon Be the RAGE of millions!”

सुरैया की पहली फिल्म का पोस्टर
देविका रानी ने सुरैया से बांबे टाकीज़ में पांच सौ रुपए प्रति मास पर पांच साल का अनुबंध कर लिया। मैं कल्पना कर सकता हूं कि घरबार चलाने वाली नानी सख़्त मिजाज बादशाह बेगम ने इतनी बड़ी तरक़्क़ी पर सुरैया की कितनी बलैयां ली होगी, किस तरह सुरैया उनसे चिपट गई होगी।
इससे भी ज़्यादा हर्षोल्लास का मौक़ा तब आया होगा, जब भविष्य में मुग़ले आज़मके निर्माता के. आसिफ़ ने अपनी पहली फ़िल्म फूल’ (1945) के लिए सुरैया को चालीस हज़ार रुपए देने का अनुबंध किया और अपनी प्रिय कलाकार के इसरार पर देविका रानी ने उसे पांच साल के अनुबंध से मुक्त कर दिया।
फूलके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीँ मिलती। उसमें वह नायक पृथ्वीराज कपूर की छोटी बहन शमां है। उस में दुर्गा खोटे, सितारा देवी और वीणा जैसे कलाकार भी थे। यह उस साल की सबसे ज़्यादा कमाऊ फ़िल्म साबित हुई थी। दबंग नानी को यह भांपने में देर न लगी कि इतने बड़े लोगोँ के बीच सुरैया ख़ुद मुख़्तार बन सकती है। नानी उस के दिल और दिमाग़ पर शिकंजा कसती गई।
वक़्त सुरैया को ऊपर और ऊपर ले जा रहा था। 1945 में जयंत देसाई ने कुंदन लाल सहगल के इसरार पर तदबीरफ़िल्म में सहगल की नायिका के तौर सुरैया को शामिल कर लिया। साथी कलाकार थे मुबारक, जिल्लोबाई, रेहाना और शशि कपूर। इसके बाद सुरैया को सहगल के साथ मिलीं उमर ख़य्याम’ (1946) औरपरवानापरवानामें सुरैया के चारों गाने पापी पपीहा रे’, ‘आजा बालम रैन अंधेरी’, ‘जब तुम नहीँ अपने दुनिया बेगानी है’, ‘मेरे मुंडेरे ना बोलकागासुपर हिट हुए। इसके संगीतकार ख़्वाजा ख़ुर्शीद अनवर के लिए 1943 से 1949 तक सुरैया ने तेरह लोकप्रिय गीत गाए।
संगीतकार नौशाद ने उसकी आवाज़ सुनी तो इतिहास प्रसिद्ध ए.आर. कारदान की फ़िल्म शारदा’ (1942) में अभिनेत्री महताब के लिए दो गीत गवाए पंछी जा बीत रहा बचपन मेरा जा के ला’, ‘मेरे दिल को सजन समझा दो। कहा जाए उस्ताद नौशाद उस के मार्ग दर्शक ही बन गए। एक के बाद एक हिट मूवियां।

सुर और सौन्दर्य का संगम
पूरी तरह गायिका अभिनेत्री के रूप में सुरैया की पहली फ़िल्म थी नौशाद के संगीत वाली अनमोल घड़ी’ (1946)। महबूब की इस फ़िल्म में नायिका नूरजहां की आवाज़ में आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे’, ‘जवां है मोहब्बत हसीं है ज़माना’, ‘क्या मिल गया भगवान’, ‘मेरे बचपन के साथी मुझे भूल न जानाके सामने सह नायिका सुरैया के मैं दिल में दर्द बसा लाई’, ‘सोचा था क्या क्या हो गयाऔर मन लेता है अंगड़ाई टिक पाए’ – यह कोई कम कमाल नहीं था।
विधवा मां का बेटा ग़रीब चंदर (सुरेंद्र) और रईस बाप की बेटी लता (नूरजहां) बचपन में दोस्त थे। उन्हें अलग करने के लिए परिवार बंबई आ बसा। जाते जाते लता निशानी के तौर परचंदर को एक अनमोल घड़ी दे गई। बड़ी हो कर लता अपने उपनाम रेणु से प्रसिद्ध उपन्यासकार बन गई। इससे अनजान चंदर भी बंबई चला गया जहां उसके धनी दोस्त प्रकाश (ज़हूर राजा) ने उसके लिए वाद्य यंत्रों की मरम्मत की दुकान खोल दी। वह रेणु के उपन्यास पढ़ता रहता। एक में रेणु (लता) ने चंदर से अपनी प्रेम की कहानी लिख डाली। चंदर ने ख़त लिख कर पूछा कि क्या रेणुजी उसे लता से मिलवा सकती हैं। रेणु के ज़ोर देने पर बसंती (सुरैया) लता बन कर चंदर से मिली। चंदर को वह घड़ी मिल नहीं रही थी पर बसंती ने ढूंढ निकाली। वह चंदर की दीवानी हो गई। लता ने बसंती को बताया ही नहीँ था कि कभी वह चंदर से प्रेम करती थी। इस बीच लता के माता पिता ने धनी प्रकाश से उसका रिश्ता पक्का कर दिया। चंदर ने रेणु (लता) को पहचान तो लिया लेकिन प्रकाश के उपकारों से दबा वह चुप रहा। चंदर की मां मर जाती है। प्रकाश और लता की शादी होती है। चंदर डूबते सूरज की तरफ़ जा रहा है, उस के पीछे पीछे बसंती भी जा रही है।
नौशाद ने दर्द’ (1947), ‘दिल्लगी’ (1949) और दास्तान’ (1950) सहित कई फ़िल्मों में सुरैया से इक्यावन गाने गववाए। और हुस्नलास भगतराम ने अट्ठावन।
सन् 1936 से 1963 तक सक्रिय सुरैया ने 67 (सड़सठ) फिल्मों में काम किया और 338 (तीन सौ अड़तीस) गाने गाए। सुरैया को मलिकाए तरन्नुम और मलिकाए हुस्न जैसे नाम अता किए जाने लगे।

'मिर्जा गालिब' में भारत भूषण और सुरैया
सन् 1950 में सब से ज़्यादा कमाने वाली फ़िल्म थी सुरैया की राज कपूर के साथ ए.आर. कारदार द्वारा निर्मित-निर्देशित दास्तान। यह 1948 की हॉलिवुड की ऐनचैन्टमैन्टसे प्रेरित थी। बूढ़ा राज (राज कपूर) बड़े से मकान में आता है। बुढ़ाया पुराना नौकर दरवाज़ा खोलता है। राज की मृत बड़ी बहन रानी (वीणा) की याद में आया है। शुरू होती हैं पच्चीस साल पहले की यादें। हंसी ख़ुशी रहते थे तीन बच्चे बड़ी बहन घमंडी और तुनकमिजाज रानी बात बात में सब को बदतमीजकहती है। कुंदन (अल नासिर) और सब से छोटा राज। पिता (नाम स्पष्ट नहीं है) (मुराद) कभी कभी घर आते थे। एक बार वे कहीं से अनाथ बच्ची इंदिरा (सुरैया) को ले आए। रानी पहली नज़र में ही उस के ख़िलाफ़ हो गई थी। दोनों भाई उस के साथी बन गए। पिता गए तो फिर नहीं आए। बड़ी होने पर रानी पूरे घर पर अपना शासन बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकती है। अलमस्त सैनिक राज खुले आम इंदिरा के साथ खेलता कूदता है, दोनों के बीच प्यार का रिश्ता भी है। कुंदन गंभीर है, मन की बात मन में रखता है। इंदिरा की तस्वीरें बनाता है। राज इंदिरा से शादी का इरादा खोल देता है। रानी यह सह नहीं सकती। दोनों भाइयों को लड़वा भी देती है। राज को कुंदन की गोली लगती है। कुंदन को राज के प्रेम का पता चलता है तो वह राज की रक्षा और इंदिरा से उस की शादी कराने में जुट जाता है।
दास्तानके लगभग हर दृश्य में सुरैया मौजूद है। फ़िल्म में नौ गाने हैं, इन में से तीन मोहम्मद रफ़ी के साथ सहगान हैं–‘ता रा रा री’, ‘दिल धड़क धड़क दिल फड़क फड़क’,और दिल को तेरी तस्वीर से’, शेष छह सुरैया ने अकेले गाए हैं – ‘आया मेरे दिल में तू’, ‘ये मौसम और ये तनहाई’, ‘ऐ शमा तू बता’, ‘नैनों में प्रीत है’, ‘मोहब्बत बढ़ा कर जुदा हो गएऔर नाम तेरा है ज़बान पर। कहा जाए तो दास्तान सुरैया के लिए ही बनाई गई प्रतीत होती है। सुरैया के अभिनय के लिए और सुरैया के गीतों को लिए। और उसी की वजह से दास्तानसाल की सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई थी। अपने ज़माने फ़िल्म समालोचक और फ़िल्म पत्रिका के संपादक बाबू राव पटेल ने लिखा था कि सुरैया के सामने राज कपूर भी फीका लगता है।
'अनमोल घड़ी' का पोस्टर
मेरी राय में सन् 1954 की सोहराब मोदी द्वारा निर्मित और निर्देशित मिर्ज़ा ग़ालिबसुरैया की यादगार फ़िल्म थी। नायक तो शायर ग़ालिब (भारत भूषण) ही है, पर मंटो ने जो कहानी रची थी वह गायिका मोती बेगम (सुरैया) के निष्फल प्रेम की कहानी है। उसके पूनों की चांद जैसे रूप को देख कर शायर ग़ालिब चौदहवीं कहता है। (मैं यह भी कह सकता हूं कि यह कहानी सुरैया-देव आनंद प्रेम कथा का प्रतिरूप भी थी।) अजब गढ़न है यह कथा। काव्य प्रेमी बादशाह बहादुर शाह जफ़र (इफ़्तख़ार) का दरबारे आम। एक के बाद एक अज़ीम शायर ग़ज़ल कह रहे हैं। ग़ालिब की बारी आती है। शहर कोतवाल हशमत ख़ां (उल्हास) उस का एक एक शेर काग़ज़ पर उतार रहा है। लेकिन शोअरा ग़ालिब का मज़ाक़ उड़ाते हैं। उदास ग़ालिब मजलिस से उठ कर चला आता है। सड़क पर किसी कोठे से आती ग़ालिब को अपनी ग़ज़ल सुनाई पड़ती है। यह है चौदहवीं बेगम (यह नाम उसे बाद में ग़ालिब देता है)। वह ऊपर जाता है। अपना भेद नहीं खोलता। बल्कि ग़ालिब की निंदा करता है। गायिका उसे निकाल देती है। वह नीचे उतर रहा है कि मुशायरे से लौटता हशमत ख़ां उसे पहचानता है। चौदहवीं को बताता है कि जो गया है वह कोई और नहीं ग़ालिब ही था।
इस तरह शुरू होती है फ़िल्म। हशमत अपने को ग़ालिब का रक़ीब समझने लगता है। वह तमाम दांव पेंच इस्तेमाल कर के ग़ालिब को गिरफ़्तार करवा देता है। चौदहवीं उस से शादी से इनकार कर देती है। एक बार वह दरबार में ग़ालिब की ग़ज़ल गाती है आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक। बादशाह को शायर का नाम पता चलता है तो ग़ालिब का सम्मान किया जाता है। जब ग़ालिब मुसीबत में है मस्जिद में दुआएं मांग रही हैं दोनों यानी चौदहवीं और ग़ालिब की बीवी (निगार सुलताना)। अंत में चौदहवीं और उस की मां (दुर्गा खोटे) शहर छोड़ कर जा रही हैं। ग़ालिब पीछे पीछे आ रहा है उसे क़बूल करने। पर चौदहवीं की मौत हो जाती है। जनाज़े को कंधा दे रहा है ग़ालिब। उसकी शायरी का सफ़र वैसे ही बढ़ता रहता है जैसे सुरैया से जुदाई के बाद देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र।
मिर्ज़ा ग़ालिब में सुरैया ने कई गीत गाए:आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक/ कौन जीता है तेरे ज़ुल्फ़ के सर होने तक’, ‘हमने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन/ ख़ाक़ हो जायेंगे हम तुमको ख़बर होने तक’, ‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है/ आखिर इस दर्द की दवा क्या है’, ‘रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो/ हमसुख़न कोई न हो और हमज़बां कोई न हो’, ‘ये ना थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता/ अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता
सन 1963 में सुरैया ने सिनेजगत से किनारा कर लिया। उसी साल होली पर अब्बा अज़ीज़ जमाल शेख़ गुज़र गए। आमदनी बंद हो गई को कुछ वक़्त बाद में दबंग नानी अपने भाई और बेटे के साथ पाकिस्तान चली गई। अब सुरैया के साथ बस मां मुमताज बेगम रह गई। वही सुरैया का ख़्याल रखती। यही समय सुरैया के जीवन में कुछ ख़ुशी लाया। कभी कभी वह अपने फ़िल्मी दोस्तों से मिल आती।
किसी रिपोर्टर ने देव आनंद का ज़िक्र किया तो बूढ़ी सुरैया ने कहा, “पुरानी बातों में क्या रखा है, कोई और बात करो।” (मुझे याद आती है वह ग़ज़ल जो सुरैया ने ग़ालिब में गाई - ये ना थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता/ अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता

अरविंद कुमार
एक बार पुरानी सहेली तबस्सुम ने पूछा – “कैसी हो आपा,” तो सुरैया ने कहा, “कैसी गुज़र रही है सभी पूछते हैं, कोई नहीं पूछता कैसे गुज़ारती हूं कोई नहीं पूछता।
31 जनवरी 2004 में मुंबई के हरकिशन दास अस्पताल में पचहत्तर साल की सुरैया ने आख़री सांस ली। वहां उससे मिलने आते थे सुनील दत्त और नौशाद। उसके जनाज़े में शामिल था धर्मेंद्र।
सच में सुरैया का सुरीला सफ़र अजब दास्तान ही है। उसकी पहली बड़ी फ़िल्म में नायक थे पृथ्वीराज कपूर और अंतिम फ़िल्म रुस्तम सोहराब में भी वही नायक थे। इसी में उस ने अपना अंतिम गीत गाया था - ये कैसी अजब दास्तां हो गई है ये कैसी अजब दास्तां हो गई है
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)   

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