चुनावी साल में सिनेमा की सियासी चाल - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 20 जनवरी 2019

चुनावी साल में सिनेमा की सियासी चाल

सवाल है कि 'दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' का जैसा ट्रीटमेंट दिया गया, क्या वैसा ट्रीटमेंट 'ठाकरे' और 'मोदी' में भी देखने को मिलेगा? इंतजार हमें भी रहेगा

ठाकरे में नवाजुद्दीन सिद्दीकी

*संजीव श्रीवास्तव
पहली बात तो यह कि सियासत के लिए सिनेमा को ढाल या हथियार बनाना, सिनेमा की व्यापक पहुंच की सफलता पर मुहर है। गोयाकि इस लेख का इस आशय से कोई ताल्लुक नहीं है। बात विशुद्ध रूप से सियासी सिनेमा की करते हैं।
सियासी सिनेमा। जी हां। हाल के सालों तक इसे राजनीतिक सिनेमा कहा जाता था। लेकिन इस श्रेणी के सिनेमा ने अब जो किरदार पेश किया, कहानी कहने की जो बानगी पेश की, उसे देखते हुये इसको राजनीतिक सिनेमा कहना वाजिब नहीं लगता। क्योंकि सत्ता, राजनीति, कॉरपोरेट, सरकार राज या सत्याग्रह से शुरू हुई नई प्रवृतियों के पश्चात् हिन्दी में आज के राजनीतिक सिनेमा की भाषा और प्रस्तुति और भी खुल कर बदलने लगी है। कहानी के ट्रीटमेंट में भी पक्ष और विपक्ष दिखने लगा है। राजनीतिक पार्टी के आग्रह और दुराग्रह नजर आने लगे हैं। फिल्मकार निर्व्यक्तिक नहीं रह पा रहे हैं। कथित बायोपिक के जरिये तथाकथित छवि तैयार की जा रही है।
साल 2019 के सियासी सिनेमा की बात करने से पहले जरा गुजरे जमाने की उन फिल्मों पर चर्चा कर लेते हैं जिन्हें राजनीतिक सिनेमा कहने का हमें गौरव हासिल है। चाहे वो सार्थक सिनेमा श्रेणी की फिल्में हों या कि मुख्यधारा की फिल्में।

न्यू देल्ही टाइम्स में शशि कपूर

मुझे इस श्रेणी की सबसे अहम 1986 की फिल्म न्यू देल्ही टाइम्स की याद आती है। शशि कपूर द्वारा अभिनीत और रमेश शर्मा द्वारा निर्देशित इस फिल्म में मीडिया द्वारा राजनीतिक भ्रष्टाचार को प्रमुखता से उजागर करने वाली कहानी को दिखाया गया था। ताज्जुब यह कि इस फिल्म को वितरकों ने तब उठाने से इनकार कर दिया था लेकिन उसी फिल्म को तीन तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। समझा जा सकता है कि साहस का पलड़ा किधर भारी था सरकार में याकि बिजनेस मैन में। बहरहाल गुलजार द्वारा लिखित यह फिल्म आज भी राजनीतिक सिनेमा की श्रेणी में सबसे प्रमुख स्थान रखती है।
इसी श्रेणी में मुझे गुलजार द्वारा ही निर्देशित और कमलेश्वर द्वारा लिखित सन् 1975 की फिल्म आंधी की भी याद आती है। संजीव कुमार और सुचित्रा सेन द्वारा अभिनीत इस फिल्म पर नायिका के महज लुक को लेकर विवाद भी हुआ था। गोकि यह फिल्म स्व. इंदिरा गांधी पर आधारित कत्तई नहीं थी। महज लुक और चाल ढाल का सहारा लिया गया था। लेकिन कांग्रेस पार्टी को इस फिल्म पर आपत्ति थी। आखिरकार जब खुद इंदिरा गांधी की तरफ से हरी झंडी मिली तो फिल्म को बंधन मुक्त कर दिया गया। वस्तुत: वह फिल्म राजनीतिक दल बदल रणनीति और राजनीति में गिरती नैतिकता के चलते हाशिये पर जाते सामाजिक मुद्दे को फोकस करती थी। और इसी एवज में एक दांपत्य जीवन के उतार चढ़ाव को भी दिखाया गया था।

आँधी में सुचित्रा सेन

इनके अलावा किस्सा कुर्सी का हो या कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी या फिर गरम हवा और दामुल जैसी फिल्में-इनके सब्जेक्ट के बैकड्राप ने किसी पार्टी या राजनीतिक शख्सियत को सीधे तौर पर कभी टारगेट नहीं किया। हजारों ख्वाहिशें ऐसी कांग्रेस नहीं बल्कि इमरजेंसी के बैकड्राप पर बनती है। उसी तरह दामुल बिहार की राजनीतिक-सामाजिक दशा पर आधारित है। उसमें बिहार की बेरोजगारी, अशिक्षा और पलायन भी विषय था। जबकि किस्सा कुर्सी का एक राजनीतिक चुटीला व्यंग्य और गरम हवा तो सांप्रदायिक राजनीति का सबसे उत्कृष्ट नजीर, जैसा कि हाल की फिल्म मुल्क में दिखता है। यहां तक कि जब प्रतिघात, मृत्युदंड और गॉडमदर जैसी फिल्में आती हैं तो वहां भी राजनीतिक विद्रूपता उनके चित्रांकण का प्रमुख विषय है। कोई पार्टी या राजनीतिक शख्सियत कहानी का फोकस नहीं है।  
आज जिस तरह से 2019 की चुनावी बेला में धड़ाधड़ सियासी फिल्मों की फेहरिस्त दिख रही है कुछ उसी तरह सन् 1984 के वक्त तीन बड़े सुपरस्टार की तीन राजनीतिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर एक दूसरे को टक्कर दे रही थी। अमिताभ बच्चन अभिनीत इंकलाब, राजेश खन्ना अभिनीत आज का एमएलए और जितेंद्र अभिनीत यह देश। सन् 84 की सियासत भी कम उबाल भरी नहीं थी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद की सियासी फिजां में फिल्मों के तेवर भी खूब बदले थे। इन तीनों ही फिल्मों का विषय राजनीति में नैतिकता का ह्रास था। भ्रष्टाचार और अपराध का गठजोड़ था। विरोधियों को चारों खाने चित करने की रणनीतियों की स्क्रीनिंग थ। और इनमें आम मतदाताओं के हित की बात सर्वोपरि थी। लेकिन आज के दौर में जब कॉरपोरेट के फिल्मकार मधुर भंडारकर ने इंदु सरकार बनाकर फिल्म के नामकरण में ही सियासी छौंक लगा दी तो राजनीतिक सिनेमा का मिजाज ही बदल गया। जब इंदु सरकार आपातकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित थी तो यह कहने से काम नहीं चलता कि इसमें इंदु सरकार तो किरदार का नाम है।

अनुपम खेर व अन्य एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में

और अब 2019 की चुनावी बेला में लीजिये हाजिर हो गई दी एक्सीडेंटस प्राइम मिनिस्टर। एक मीडिया सलाहकार की संजय दृष्टि। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्रीय जीवन। इसके बाद आने को है ठाकरे। जिस शख्स की क्षेत्रवादी राजनीति ने मुंबई में नफरत और हिंसा की बुनियाद रखी उस व्यक्तित्व को जस्टीफाई करता नये मिजाज का बायोपिक।
इतना ही नहीं इन फिल्मों के बाद जल्द ही देखने को मिलेगी विवेक ओबेरॉय द्वारा अभिनीत फिल्म मोदी। यानी एक और नये मिजाज का बायोपिक। कहना मुश्किल है कि विवेक ओबेरॉय मोदी के तौर पर कितने परफेक्ट प्रतीत होंगे। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ठाकरे के लुक को तो साध गये हैं लेकिन बानगी में ठाकरे की ठसक कहां से लायेंगे।
इस आधार पर इससे भी बड़ी चुनौती विवेक ओबेरॉय के सामने होगी कि मोदी की तरह मंच कला में निपुणता कैसे प्रदर्शित करेंगे। सवाल यह भी है कि दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर का जैसा ट्रीटमेंट दिया गया क्या वैसा ट्रीटमेंट ठाकरे और मोदी में भी देखने को मिलेगा ? इंतजार हमें भी रहेगा।  
तब हम और भी पुख्ता तौर पर कह सकेंगे कि जिन्हें हम राजनैतिक सिनेमा कहते रहे क्या अब मान लेना चाहिये कि उसका अंत हो गया और उस जगह को सियासी सिनेमा ने अधिग्रहित कर लिया?  
*लेखक पिक्चर प्लस के संपादक हैं। दिल्ली में निवास।
संपर्क- picturepls2016@gmail.com   

1 टिप्पणी:

  1. जिस तरह से सियासत का मिज़ाज़ बदला है और अब सियासत में मुद्दों और नीतियों की सुचिता की जगह व्यक्तिगत छवि ज्यादा उभर कर एक चलन बन गयी है उसी तरह राजनीतिक फिल्मों में भी परिवर्तन हो गया है । आखिर फ़िल्म समाज का ही दर्पण होती है ।

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