आज 'गर्म हवा' को फिर याद करना पड़ा क्योंकि... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 27 जनवरी 2019

आज 'गर्म हवा' को फिर याद करना पड़ा क्योंकि...

 माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–67


पिछली क़िस्त (भाग 66) के अंतिम पैरे में मुल्क के बारे में मैंने लिखा था: समीक्षक के तौर पर मैं द हिंदू में छपे अनुभव के इस स्टेटमैंट से सहमत हूं कि मुख्यधारा की यह फ़िल्म किसी विचारधारा का विरोध या समर्थन नहीँ करती। आज के वक़्त की यह वैसी ही मुस्लिम सोशल है, जैसे सत्तरादि दशक में गर्म हवा थी। तब पाकिस्तान जा रहे मुसलमानों के रेले की कहानी के आख़िरी दृश्य में बेटे सिकंदर मिर्ज़ा (फ़ारूख़ शेख़) के साथ सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) ने पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला कर लिया था, आज पैंतालीस साल बाद ऐडवोकेट मुराद अली मोहम्मद (ऋषि कपूर) से कहा जा रहा है पाकिस्तान जाओ, और वह नहीँ जा रहा।
-‘गर्म हवा का वह जो सलीम मिर्ज़ा (बलरज साहनी) था जो पाकिस्तान की रेल पकड़ने के लिए अपनी पत्नी जमीला (शौकत आजमी) और बेटे सिकंदर मिर्ज़ा (फ़ारूक शेख़) के साथ निकला था और थोड़ी दूर चल कर बाज़ार में तांगे से उतर गया था बेटे सिकंदर के पीछे, उसकी कहानी पर बनी गर्म हवा हिंदी फ़िल्म इतिहास में लीजेंड बन गई है।
पैंतालीस साल पहले बनी गर्म हवा का ज़माना था अब से तिहत्तर साल पहले सन् 1947-48 का ज़माना। 14-15 अगस्त 1947 भारत के विभाजन का, भयानक मारकाट का, जलते मकानों का पाकिस्तान से आते हिंदुओं और सिखों का और भारत से पाकिस्तान जाते लाखों मुसलमानों का। 1973-74 की फ़िल्म गर्म हवा की तस्वीर है 1948 की 30 जनवरी को गांधीजी की हत्या के बाद के कुछ महीनों की। आगरा में बसने वाले मुसलमानों की। उनमें भी आगरे के जूता कारोबारियों की।
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कहानी शुरू करने से पहले कहानी की पृष्ठभूमि स्पष्ट करने के लिए नामावली के दौरान गर्म हवा हमें कुछ तस्वीरें दिखाती है: महात्मा गांधी, संपूर्ण भारत का भौगोलिक नक़्शा, भारत के प्रदेशों का नक़्शा; वायसराय के साथ गांधी, बातचीत के लिए जाते नेता; जिन्ना के क्लोज़प से पीछे हटता कैमरा दिखाता है मुसलिम लीग के नेता, पाकिस्तान की मांग करते मुट्ठी ताने लीगी नेता का क्लोज़प। विचारमग्न महात्मा गांधी और नेहरू, प्रधान मंत्री की शपथ लेते नेहरू, लाल क़िले पर झंडाभिवंदन करते नेहरू, ख़ुशी मनाते लोग, अपार भीड़, जय हिंद का पोस्टर, सैनिक हथियार, टूटे उजड़े घर, शरणार्थी, बड़े तवे पर रोटियां सेंकती कई औरतें, भूखों कोरोटियां परोसते लोग, गोली चलने के तीन धमाके, गांधी की हत्या, जलती चिता, भड़कते शोले, रेलगाड़ियों पर लदे लोग...
पार्श्व में हम कैफ़ी आज़मी की आवाज़ में सुन रहे हैं उन की नज़्म:
[तकसीम हुआ मुल्क - दिल हो गए टुकड़े
हर सीने में तूफ़ान - वहां भी था यहां भी
हर घर में चिता जलती थी, लहराते थे शोले
हर शहर में शमशान - वहां भी था यहां भी
गीता की कोई ना सुनता / ना कोई कुरआन की सुनता
हैरान सा इनसान - वहां भी था यहां भी]
आगरा स्टेशन। इंजन भाप छोड़ता है, रेल चलती है। सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी) हाथ हिला कर किसी को विदा कर रहा है। स्टेशन से बाहर आता है। कारख़ाने के लिए तांगे में सवार होता है। तांगे वाला पूछता है, आज किसे छोड़ आए, मियां। उदास सलीम मियां बताता है,“बड़ी बहन को, उनके शौहर पहले ही कराची चले गए थे, अब वे गई हैं।

गरम हवा की कहानी दो स्तरों पर चलती है। दोनों साथ साथ या एक के पीछे एक चलते हैं।
-1. पहला स्तर है आधुनिक भारत की सब से बड़ी त्रासदी देश प्रलयंकर विभाजन का और उससे उपजे हालात का। तांगे वाले के शब्दों में बड़ी गरम हवा चल रही है!’ कब क्या होगा, कौन झुलसेगा, कौन बचेगा कोई नहीं जानता।
पाकिस्तान की मांग पर अड़ा उत्तर भारतीय मुसलमान अब दिशाहीन है, समझ नहीं पा रहा क्या करे, क्या ना करे। हर इनसान हैरान सा था। यह था नए हालात में डावांडोल मुसलिम समाज का अंतर्द्वंद्व। हर मुसलमान को अपने स्तर पर इस डावांडोलपन से उबरना है। सलीम मिर्ज़ा यहीँ रहना चाहते हैँ। यही उनकी दुनिया है। यहीँ मरना और जीना है। लेकिन तब के हालात में उनका जीना इतना आसान नहीँ था।
यह जो कठिन समय था, उसका बयान कुछ इस तरह करती है गरम हवा। स्टेशन से निकल कर सलीम सीधे कारख़ाने पहुंचता है। बहुत से कारीगर पाकिस्तान चले गए हैं, कई जाने वाले हैं। बशीर नाम के कारीगर को लाहौर में जूतों का कारख़ाना अलॉट हो गया है। ख़ूब कमा रहा है। उसके ख़त दूसरों को ललचाते हैं पाकिस्तान जाने को। सलीम का कहना है,गांधी जी की शहादत रायग़ां नहीँ जायगी। जल्द ही अमन चैन हो जाएगा। बेटा बाक़र ख़ुशख़बरी लाता है, अजमानी ने बड़ा ऑर्डर दिया है। सलीम कहता है, देखा-व्यापार में मज़हब आड़े नहीँ आता। बाक़र कहता है, मज़हब से बढ़ कर भी है कुछ और!” क्या?” रिश्वत। मैंने इंस्पेक्टर की मुट्ठी गरम की, तभी... यह रिश्वत वाली बात सलीम को पसंद नहीं आती। वह एक तरफ़ चला जाता है।
-2. दूसरा स्तर है घर का। दिन ब दिन बदलते हालात में आम मुसलिम परिवार के ज़िंदगी से जूझने का।
विभाजन से उत्पन्न घटनाक्रम में फंसी नाज़ुक बेचारी आमिना (गीता) के सीने में ख़ुशियों की तमन्नाएं बसतायसरे भाई काज़िम (जमाल हाशमी) तक हैँ।
आइए, उनके घर चलते हैं। टॉप ऐंगल से कैमरा पुरानी हवेली में नीचे झांक रहा है। बच्चे के साथ पतंग उड़ाता काज़िम बार बार मुंडेर के टूटे हिस्से से नीचे झांक रहा है।
चौक में चूड़ियां पहनती आमिना छत पर काज़िम को देखती है। मां जमीला (शौकत आज़मी) शादी का जोड़ा तैयार कर रही है। आमिना को उढ़ाती है,“तेरी शादी का है!” शरमाती सी आमिना ख़ुश होती है।
तभी अब्बू सलीम आ जाते हैँ। आमिना उठ कर अब्बू से सट जाती है। मनुहार सी करती हाथ की चूड़ियां दिखाती है, ये चूड़ियां कम हैं ना!” अब्बू कहते हैं,“हां, कम हैं। कितने की चाहिए?” बारह रुपए की!” अब्बू बटुए से निकाल कर रुपए देते हैँ। अम्मी कहती हैं, लाडली को बिगाड़ोगे तो शौहर को ऐसे ही तंग करेगी!” सलीम: यह कोई पराए घर जा रही है!” जवाब देता सलीम मिर्ज़ा कमरे की तरफ़ जाता है। आमिना छत की ओर देखती है। काज़िम को देखती कुछ गर्व से शरमाती है।
तो यह है गरम हवा का दूसरा स्तर। आमिना की शादी होगी या नहीँ, होगी तो कब होगी, किसी और से होगी, होगी या नहीँ होगी। ताऊ क्या करेंगे, छोटी बुआ क्या करेगी, आमिना उसे झेल पाएगी या नहीँ – यह सब दर्शक को वैसे ही बांधे रखता है जैसे घर के बाहर मर्द रिश्तेदारों और ग़ैररिश्तेदारों की करनी धरनी और पाकिस्तान से आए हमदर्द सिंधी जूता व्यापारी अजमानी और उग्र हिंदूवादी सहयोगी, आदि, का उनसे बरताव।

-मुसलिम नेता खुलेआम जो कहते हैं, करते उसका उलटा हैं। काज़िम का बाप और सलीम का बड़ा भाई हलीम (दीनानाथ ज़ुत्शी) पाकिस्तान के पहले प्रधान मंत्री लियाक़त अली के बाद यू.पी. (मतलब तत्कालीन यूनाइटिड प्रौविंस आफ़ आगरा ऐंड अवध) में अपने को सब से बड़ा मुसलिम नेता मानता है। भारी मज़मे में सीना ठोंक ठोंक करदावा कर रहा है,चाहे हिंदुस्तान के सब मुसलमान पाकिस्तान चले जाएं, एक मैं हूं जो यहीं रहेगा। घर में वह पाकिस्तान जाने की बात कर रहा है। नतीज़तन हलीम के साथ काज़िम भी पाकिस्तान चला गया। वापस आने का वादा करके भी हलीम लौटता नहीँ।
हवेली हलीम के नाम थी तो उसके जाने के बाद वह एवाकुईevacuee जायदाद हो गई। सरकार उसे बेचेगी। छोटा बहनोई यूनुस परवेज़ (यूनुस परवेज़) जो रातोंरात मुसलिम लीगी से कांग्रेसी हो गया है और स्थानीय कमेटी का अध्यक्ष है, पेशकश करता है कि सलीम कांग्रेस में आ जाए, तो मकान बच सकता है। सलीम किसी पार्टी से कोई तअल्लुक़ नहीं रखना चाहता। वह नए मकान की तलाश में है। लोग मुसलमान को मकान देना नहीं चाहते – क्या पता कब किराया मार कर वह पाकिस्तान चला जाए। कुछ मकान मालिक साफ़ मना नहीँ करते, कोई बहाना बना देते हैँ। फिर भी एक मकान मिल ही गया।
-हवेली अजमानी ने ख़रीद ली है। सामान लादा जा चुका है। हम देखते हैं एक हृदयद्रावक दृश्य: बूढ़ी दादी कहीँ दिखाई नहीं दे रही। सब लोग हवेली के हर कोने में उसे तलाश रहे हैं। आमिना इधर से उधर झांक रही है। एक कोठरी से निकलते निकलते दादी एक कोने में छिपी मिली। वहां से बाहर आने को तैयार नहीँ है।
दादी का कोई नाम नहीँ दिया गया है। उसके रोल के लिए गायिका बेगम अख़्तर चुनी गई थी, पर उन्होंने इनकार कर दिया। फ़िल्म में हलीम और सलीम की हवेली वास्तव में आगरे की पीपल मंडी में आर.ऐस. लाल माथुर की हवेली थी। उन्हीं की मदद से आगरे के वेश्या महल्ले में मिली सत्तर साल की बदर बेगम। आंखों में मोतियाबिंद था। सोलह साल की उमर में वह फ़िल्मों में काम के लिए बंबई भाग गई थी। जल्दी ही जेब ख़ाली हो गई। वाडिया मूवीटोन में एक्स्ट्रा बन कर जो पैसे मिले उनसे आगरा वापस लौट आई। वेश्या बनने के अलावा कोई चारा नहीँ था। विधि का विधान ही कहा जाएगा कि बुढ़ापे में फ़िल्म में जो काम मिला, वह उसे अमर कर गया।] अब आमिना की दादी का नाम बदर बेगम ही कहा जाता है। दादी को ज़बरदस्ती गोद में उठा कर तांगे में लादा गया।
-कारख़ाना चलाने के लिए सलीम को न किसी बैंक से न किसी महाजन से लोन मिल रहा है। बैंक वाले डरते हैं किसी मुसलमान को कर्ज़ दिया और वह पाकिस्तान चला गया तो किस से क्या वसूल करेगा। महाजन से कुछ मिलने की उम्मीद थी कि बहनोई यूनुस परवेज़ भी आ पहुंचे और हलीम के पाकिस्तान चले जाने का ज़िक्र छेड़ दिया। कर्ज़ मिलने की जो भी संभावना थी, वह ख़त्म हो गई।)
-ऐसे में एक शाम चोरी-छिपे काज़िम आ गया। वह आया है आमिना की ख़ातिर। उसे पाकिस्तान सरकार से वज़ीफ़ा मिला है कनाडा में उच्च शिक्षा के लिए। अब्बा हलीम काज़िम की शादी किसी मिनिस्टर के बेटी से करवा रहे थे। काज़िम बच कर भाग आया। काज़िम और आमिना का निकाह कराया जा रहा है। आमिना सातवें आसमान पर है। काज़िम फूला नहीँ समा रहा। क़ुनबे की औरतें आ गईं। ढोलक पर शादी के गीत गाए जा रहे हैं। पुलिस आती है, निकाह से उठा कर काज़िम को पाकिस्तान वापस भिजवा देती आमिना की ख़ुशियां मानों दफ़्न हो जाती हैं।
-जूता उद्योग के संगठन ने सरकार के सामने मांगें रखी थीं, जिनके पूरा न होने पर कामबंदी का ऐलान कर दिया। ईद आने वाली है, कुछ ज़रूरी आर्डर अधूरे पड़े हैँ। सलीम और बाक़र चोरी छिपे कारख़ाना चलाते रहते हैँ। सरकार ने मांगें मान लीँ। एक बहुत बड़ा टैंडर भरा जाना है। बाप बेटा ख़ुश हैं, पर जूता यूनियन के अनुसार वही लोग टैंडर भर सकते हैं जो हड़ताल में शामिल थे।
शुरू से ही बाक़र का कहना था जहां जिस तरह सही रहना मिले वहां उस तरह बरतना चाहिए। अब तांगे में बैठे बाक़र ने कहा, मेरा तो आबोदाना उठ गया यहां से। उसने पाकिस्तान जाना तय कर लिया। अब फिर हम सलीम को देखते दिल पर पत्थर रख कर वह बाक़र, उस की बीवी और बच्चे को ट्रेन में बिठा कर विदा कर रहा है।
-दुख आते हैं तो अकेले नहीँ आते। अम्मां बदर बेगम का आख़िरी वक़्त आ गया। यह नया मकान उसे कभी अपना नहीँ लगा। वह हवेली में भी मरना चाहती है। सलीम और सिकंदर ले जाते हैं उसे हवेली जो अब अजमानी की है। वह मिर्ज़ा परिवार का सब से बड़ा हमदर्द है। मरती आंखों में हसरतें बदर बेगम की बेहतरीन अदायगी और गर्म हवा के बेहतरीन दृश्यों में से एक है।
एक दफ़ा की बात है। कारख़ाने के नज़दीक़ तांगा किसी से टकरा गया। मामला इतना बढ़ा कि दंगा हो गया। आगज़नी में कारख़ाना चपेट में आ गया। थोड़ा बहुत जो बचा था, उसके सहारे सलीम मिर्ज़ा अपने हाथों जूते बनाता और बाज़ार में दुकानदारोँ को बेचने जाता है।
एमएस सथ्यू

-कभी पहले सलीम ने हवेली का नक़्शा भेजा था हलीम के पास पाकिस्तान। वह पुलिस के हाथ लग गया। सलीम पर पाकिस्तान के लिए जासूसी का इलज़ाम लग गया। तहक़ीक़ात के बाद वह बेदाग़ बरी हो गया था। पर यह कलंक उस के माथे लग तो गया ही था। ख़रीददार दुकानदार से थड़े पर रखा था सलीम का माल। तभी किसी ने शोर मचा दिया कि यह तो पाकिस्तानी जासूस है। धीँगामुश्ती होने लगी। ख़ुद्दार सलीम ने माल वापस उठा लिया। घर पर जमीला ने कहा, क्यों न हम भी चले जाएं। सलीम तैयार नहीँ है। मैं अब गया तो लोग कहेंगे मैं सचमुच जासूस था।
-काज़िम के ज़माने से ही आमिना की फूफी अख़्तर का बेटा शमशाद आमिना के पीछे पड़ा रहता था, और आमिना अपनी नापसंदगी ज़ाहिर करती रहती थी। अब मौक़ा पा कर अख़्तर शमशाद और आमिना की शादी की बात छेड़ती है जमीला से। पर उदास आमिना को शमशाद के नज़दीक लाया कैसे जाए? सिकंदर का बी.ए. के इम्तहान में पांच छह दिन बाक़ी हैँ। सिकंदर के पास होने की मन्नत मांगने के बहाने वे दोनों आमिना को सलीम चिश्ती की दरगाह जाने को कहती हैँ, साथ में शमशाद को लगा देती हैं। यहां से एक नया अध्याय शुरू होता है आमिना की ख़ुशियों का। दोनों मिलने जुलने लगे। कभी ताज, कभी कहीँ और।
- सिकंदर अच्छे नंबरों बी.ए. हो गया है। ख़ानदान में नई आशा, नई उमंगें पनप रही हैं। सिकंदर नौकरी की तलाश में है। एक इंटरव्यू से दूसरी पर जा रहा है। एक जगह बात बनती नज़र आ रही है। इंटरव्यू लेने वाले को वह पसंद है। तभी ऊपर से फ़ोन आता है। किसी और को उस जगह रख लिया गया है। सिकंदर तल्ख़ हो आता है। जब सिफ़ारिशियों को रखना है तो जॉब का विज्ञापन दिया ही क्योँ जाता है?” खिसियाया इंटरव्यू लेने वाला सलाह देता है, आप पाकिस्तान चले जाएँ वहाँ अच्छे मौक़े मिलेंगे!”
-मुसलमान अफ़सर सिकंदर को इसलिए नौकरी नहीं देता कि उस पर मुसलमानों को तरजीह देने का आरोप लग जाएगा!
-शमशाद और आमिना ताज में रोमांस कर रहे हैं। ताज के पीछे नाव में शमशाद आमिना के बेहद निकट आता है। कहता है, निकाह होता ही क्या है – कुछ जुमले!” ताज के पीछे जमना में नाव में इशारतन दोनों का परस्पर मिलन दिखाया जाता है।
रोशनी की जो किरण आमिना की ज़िंदगी में आई थी, जल्द ही उस पर काली छाया पड़ जाती है। फूफा यूनुस परवेज़ का हर काम धंधेबाज़ी का था। भारी कर्ज़ से दबा वह सपरिवार पाकिस्तान भाग गया। जाते जाते शमशाद वापस आने का पक्का वादा कर जाता है। कुछ महीने बाद आती उसकी माँ अख़्तर। शमशाद की शादी के कपड़े ज़ेवर ख़रीदने। हर पसंद में आमिना की राय माँगती है। आभास देती है कि यह शादी आमिना से होगी। एक दिन असली दुल्हन का नाम खुल जाता। तमाम ख़रीदारी करके अख़्तर चली जाती है। आमिना पूरी तरह टूट जाती है। शादी के कपड़े पहने लेटी सपनों में शमशाद से रोमांस के सीन देखती है। जमुना किनारे अपना निश्छल समर्पण देखती है। खाट पर पसर जाती है, हाथ की नस काट लेती है...।
उस के दफ़्न के लिए अब बाप बेटे सलीम और सिकंदर बचे हैँ।

-जासूसी का दाग़ तो सलीम के माथे लग तो गया ही था।शहर में, जूता उद्योग में, जानपहचान वाले – सब उस से मुँह फेर लेते है। आखिर वह टूट ही जाता है, और जाने को तैयार हो जाता है। जमीला कहती है,बेटी गँवा दी तो जाने को राज़ी हुए। पहले जाते तो आमिना को कोई तो लड़का मिल ही जाता।
-आगरा छोड़ना कोई आसान नहीँ है। यहाँ सलीम की यादें बसी हैँ। यहाँ उसकी तहजीब पनपी है। जाने से पहले वह ताज महल देखने जाता है। एक पूरे ज़माने से कटने का दुख बयान करने के लिए इससे अच्छा कोई दृश्य हो ही नहीँ सकता था।
-संकरी गली के बाहर ताँगे में पीछे जमीला बैठी है। बंद गली के अख़िरी मकान के दरवाज़े पर ऊपर की कुंडी पर ताला लगा कर सलीम बाहर की तरफ़ आ रहा। जमीला के पास पीछे बैठता है। आगे की तरफ़ तांगे वाले के पास बड़े बेमन से सिकंदर बैठ जाता है। तांगा आगे बढ़ता है। आज सड़कों पर भीड़ कुछ ज़्यादा है। हलचल है। छोटी सड़क से निकल कर सामने जो बड़ी सड़क है उस पर बड़ा भारी जलूस चल रहा है। तांगे को रुकना पड़ता है। जलूस चल रहा है। झंडे लहरा रहे हैँ। कई जनों ने बड़े बड़े पोस्टर हाथ में ले रखे हैं। तांगे में सिकंदर बेचैन है। एक पोस्टर पर लिखा है:सब को काम मिलना मौलिक अधिकार माना जाना चाहिए

अरविंद कुमार
जुलूस में सिकंदर के दोस्त भी शामिल हैँ। सिकंदर उन्हें देखता है। वे सिकंदर को देखते हैं। शोर से ऊपर आवाज़ उठाता एक दोस्त बोलता है, सिकंदर, तू जा रहा है!” सिकंदर अपने को रोक नहीँ पाता। तांगे से उतरने को है। पीछे बैठा सलीम भी जलूस के हजूम को देख रहा है। सिकंदर से कहता है, जा, बेटा जा। आज मैं तुझे नहीँ रोकूंगा!” सिकंदर कूद कर उतर जाता है। नारे लगाते दोस्तों में शामिल हो जाता है। पीछे वाली सीट से उतर कर सलीम तांगे को घर वापस जाने के लिए कहता है। अब वह भीड़ में शामिल हो जाता है। नारे लगा रहा है।
अब तक वह समाज के संघर्षों से अलग थलग रहता था। अब अपने अस्तित्व की लड़ाई सब के साथ मिल कर लड़ेगा। 
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)  

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