कंगना बनी सिल्वर स्क्रीन की भी बहादुर रानी - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 26 जनवरी 2019

कंगना बनी सिल्वर स्क्रीन की भी बहादुर रानी


फिल्म समीक्षा
मणिकर्णिका
(द क्वीन ऑफ झांसी)
निर्देशक - कंगना रानौत, राधा कृष्ण. जागरलामुडी
कलाकार - कंगना रानौत, अंकिता लोखंडे, अतुल कुलकर्णी, सुरेश ओबेराय, डैनी डेंजोग्पा, कुलभूषण खरबंदा, रिचर्ड कीप, जिशु सेनगुप्ता आदि ।


*रवींद्र त्रिपाठी
रानी लक्ष्मीबाई सन् 1857 के भारतीय स्वत्रंतता संग्राम की सबसे बड़ी नायिका है। भारतीय इतिहास की एक बेजोड़ शख्सियत। लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था। कंगना रानौत ने जन जन के मन में बसी इस रानी की जीवनीपरक फिल्म में जो किरदार निभाया है वो  भी लोगों के मन में बसा रहेगा। ये उनकी यानी कंगना की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म है। अब तक `क्वीन उनकी सबसे अच्छी फिल्म थीं। पर `मणिकर्णिका से वे एक सुपरस्टार बन गई हैं। हालांकि  फिल्म में कुछ अतिरंजनाएं भी हैं और कुछ जगहों पर इतिहास के साथ आजादी भी ली गई है। फिर भी ये भारत की आजादी की लड़ाई की पहले दौर की जोशीली याद दिलानेवाली है। फिल्म में देशभक्ति का जज्बा पूरे तेज के साथ उभरा है। इसके अतिरिक्त फिल्म स्त्रियों की सामाजिक और राजनैतिक भूमिका का बयान हो। हालांकि यहां भी बहुत कुछ काल्पनिक है लेकिन हर फिल्म इतिहास के अलावा वर्तमान में भी होती है।
मध्यांतर के पहले फिल्म हौले हौले चलती है और मणिकर्णिका के बचपन और युवावस्था के उस दौर को दिखाती है जिसमें उसका विवाह झांसी के राजा के साथ होता है। इस अंश में मणिकर्णिका की तलवारबाजी और तीरंदाजी भी उभरती है।  ये भी कि वो जबरदस्त निशानेबाज है पर उसके दिल में आम लोगों के साथ साथ जीव जंतुओं के लिए प्रेम भी है। एक दृश्य है जिसमे वो एक तीर से एक शेर पर निशाना लगा रही है। वो तीर चलाती है पर उसे मारने के लिए नहीं सिर्फ घायल करने के लिए। और जब वो शेर तीर लगने के बाद उछाल मारते हुए उसके सामने गिरता है तो उसकी मरहम पट्टी भी करती है। उसके बाद वो आस पास जुटे लोगों से कहती है कि उस घायल शेर को कहीं दूर छोड़ आएं ताकि वो किसानों के पालतू जानवरों को न मारे। यानी मणिकर्णिका एक साथ नरम दिल भी और कड़क दिल भी।
और मध्यांतर के बाद फिल्म उस वीरांगना की गाथा बन जाती है जिसने ब्रिटिश हुकुमत को हिला दिया था। एक अतिसाधारण परिवार में जन्म लेने वाली  लक्ष्मीबाई भारत की आजादी की लड़ाई लड़नेवाली एक ऐसी सेनानी बन गई जो हिम्मत और बहादुरी की मिसाल भी है। उसको तत्कालीन राजे रजवाड़ों का समर्थन नहीं मिला फिर भी जिस वीरता से उसने सैन्य संचालन किया वो बेमिसाल है।  कंगना रानौत ने इस `मर्दानी लक्ष्मीबाई को बखूबी दिखाया है। संकटों से घिरे होने के बावजूद वो हिम्मत नहीं हारती और `मैं झांसी नहीं दूंगी की प्रतिज्ञा पर मरने दम तक अड़ी रहती है। आम लोगों के मन में बसी झांसी की रानी और फिल्मी कंगना रानौत कई जगहों पर एक हो गई है। यानी दर्शक कंगना में लक्ष्मीबाई को ही देखेंगे।


कंगना शुरू से आखिर तक वही छायी हुई हैं। हालांकि इसी चक्कर मे तात्या टोपे (जिसका किरदार अतुल कुलकर्णी ने निभाया है) और गौस खां (जिसका किरदार डैनी ने निभाया है) के किरदार कुछ दबे से रह गए हैं। झलकारी बाई की भूमिका में अंकिता लोखंडे हैं और जैसा प्रचारित किया गया था उस तरह का बड़ा रोल उनका भी नहीं है। फिल्म शुरू से आखिर तब बांधे रखती है। युद्ध के दृश्यों में भव्यता भी है। फिल्म के दो निदेशक हैं और दूसरे दौर में निर्देशन पूरी तरह कंगना ने संभाला है। इस तरह ये कंगना की दोहरी उपलब्धि वाली फिल्म है। बतौर निर्देशक भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ दी है।
फिल्म का एक नारीवादी पहलू भी है। लक्ष्मीबाई विधवा हो गई थी और इस नाते पारंपरिक भारतीय समाज में उस पर कई तरह के दबाव थे। एक विधवा औरत किस तरह अपने परिवार के लोगों से भी भिड़ती है ये भी `मणिकर्णिका की कहानी मे गूंथा हुआ है। यही नहीं वो स्त्रियों को भी स्वतंत्रता की लड़ाई में शामिल करती है। एक सामंती परिवार की बहू आम जन के दिल में स्थान बना लेती है। `झांसी वाली रानीसिर्फ झांसी की नहीं रही वो हर भारतीय के दिल में समा गई है। फिल्म `मणिकर्णिकाउस बात को दर्ज कराती है।
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क – 9873196343 

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