कैसे गुजारती हैं जिंदगी कोई अंजु महेंद्रू से भी तो पूछे ...! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 6 जनवरी 2019

कैसे गुजारती हैं जिंदगी कोई अंजु महेंद्रू से भी तो पूछे ...!


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–64  

(नोट-सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है)
9 दिसंबर 2018 को आपने पढ़ी सुरैया की दास्तान। देव आनंद से अलगाव के बाद  अंत में उसका एकाकी जीवन। 
किसी रिपोर्टर ने देव आनंद का ज़िक्र किया तो बूढ़ी सुरैया ने कहापुरानी बातों में क्या रखा है, कोई और बात करो। (मुझे याद आती है वह ग़ज़ल जो सुरैया ने ग़ालिब में गाई - ‘ये ना थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता / अगर और जीते रहतेयही इंतज़ार होता।)

एक बार पुरानी सहेली तबस्सुम ने पूछा – कैसी हो आपा, तो सुरैया ने कहाकैसी गुज़र रही है सभी पूछते हैं, कैसे गुज़ारती हूं कोई नहीं पूछता।
इस क़िस्त में पढ़िए इससे बिल्कुल उलटी कहानी अंजु महेंद्रू की : राजेश खन्ना से जुदाईफिर नियराई, और जैसा चाहा वैसा मनचाहा जीवन गुज़ारा।
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पिछले दिनों स्टार प्लस चैनल पर रिश्तों का चक्रव्यूह और आजकल अपने अंतिम दौर में मरियम ख़ान रिपोर्टिंग लाइव सीरियल में अंजु महेंद्रू को देख कर मैं माधुरी पत्रिका के अपने सन् 1964 से लेकर सन 1978 तक के वक़्त में पहुंच जाता हूं, विशेषकर राजेश खन्ना की राजेश खन्ना से गहरी दोस्ती के दिनों में। 

'मरियम खान रिपोर्टिंग लाइव' में अंजु महेंद्रू
भाग 33 ‘राजेश अंजु प्रेम कथा’  मैंने लिखा था:
[दिन ब दिन राजेश का सितारा चढ़ रहा था। हर तरफ़ उसी का नाम था। वह पूरे हिंदुस्तान की क्रेज़ था। उसकी हर नई फ़िल्म देखने को सिनेमाघरोँ पर टूट पड़ते थे। गली गली मेँ लड़के उसके दीवाने थे, लड़कियां उस पर पागल थीँ।
[और एक लड़की थी जिसके पीछे राजेश खन्ना पागल था। वह थी सन 1942 में जिनमे राजेश से चार साल छोटी 1946 में जन्मी अंजु महेंद्रु। तेरह साल की उम्र से ही वह मॉडलिंग करने लगी थी। विज्ञापनों में उसके फ़ोटो छपते थे। एक चाहने वाले ने उसे ‘टाइमलैस ब्यूटी’ (कालातीत सुंदरी) भी कहा है।]
[दिन ब दिन राजेश का सितारा चढ़ रहा था। हर तरफ़ उसी का नाम था। वह पूरे हिंदुस्तान की क्रेज़ था। उसकी हर नई फ़िल्म देखने को सिनेमाघरोँ पर टूट पड़ते थे। गली गली मेँ लड़के उस के दीवाने थे, लड़कियाँ उस पर पागल थीँ।
[और एक लड़की थी जिस के पीछे राजेश खन्ना पागल था। वह थी सन 1942 में जनमे राजेश से चार साल छोटी 1946 में जन्मी अंजु महेंद्रु। तेरह साल की उम्र से ही वह मौडलिंग करने लगी थी। विज्ञापनों में उस के फ़ोटो छपते थे। एक चाहने वाले ने उसे ‘टाइमलैस ब्यूटी’ (कालातीत सुंदरी) भी कहा है।राजेश ने उस से शादी करने का प्रस्ताव किया। शर्त यह थी कि वह अपना मस्तीभरा जीवन त्याग कर घरनी बन कर रहेगी। यह अंजु को मंज़ूर नहीं था। 
ग़ुस्से से भरे राजेश ने अंजु का कैरियर बरबाद करने मेँ कोई क़सर नहीँ छोड़ी। एक दिन सुनने में आया कि जिन भी फ़िल्मोँ मेँ अंजु काम कर रही थीवे राजेश ने दोगुने दाम दे कर ख़रीद कर बंद कर दी हैँ। फिर एक और दिन ख़बर आई कि जिन भी विज्ञापनोँ मेँ अंजु का फ़ोटो थावे वापस ले लिए गए हैँ।
राजेश ने ‘बौबी’ डिंपल कापड़िया से शादी की तो बारात अंजु के घर के सामने ले ले कर गया। उल्लेखनीय है कि डिंपल कई साल घरनी बन कर रही। 1982 में राजेश से अलग हो कर 1984 में फ़िल्म संसार वापसी ‘ज़ख़्मी शेर’ से की।
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राजेश खन्ना और अंजु महेंद्रु
अथ अंजु कथा:
11 जनवरी 1946 को जन्मी सुंदरी अंजु तेरह साल की उम्र से ही मॉडलिंग करने लगी थी। उसकी दुनिया थी फ़ैशन की और मस्ती की दुनिया। 1966: कवि कैफ़ी आज़मी की सिफ़ारिश पर बासु भट्टाचार्य ने बीस साल की अंजु को ‘उसकी कहानी’ में मुख्य भूमिका दे दी। शूटिंग अपने आप में लीजेंड बन गई। निर्माता मुग़नी अब्बासी कोई धनी व्यक्ति नहीं थे। पर शैलेंद्र की ही तरह बासु की सहायता करने पर तुले थे। उन्हें बताया गया था कि फ़िल्म बस पचास-साठ हज़ार में बन जाएगी जो उस सस्ते ज़माने में भी असंभव था।
इस संदर्भ में एक निजी संस्मरण। मैं बिमल राय परिवार के नज़दीकियों में आ गया था। जनवरी 1966 में उनका देहांत हुआ था। एक दो महीने बाद किसी काम से बांद्रा में मेहबूब स्टूडियो गया था। सोचा पास ही हिल रोड पर बिमल दा की पत्नी बऊदी (मोनबिना राय) से भी मिल लूं। ‘उसकी कहानी’ की बात चल निकली। मैंने बताया कि बासु ने मुग़नी से कहा है कि साठ सत्तर हज़ार में बन जाएगी। वे भड़क उठीं,या तो बासु अनाड़ी है या मक्कार।)


राजेश खन्ना पूरे परिवार के साथ अंजू महेंद्रू 
तो कड़की थी। सब कुछ शू-स्ट्रिंग बजट से भी कम में हो रहा था। स्टूडियो नहीं था, इक्विपमैंट काम चलाऊ था। साधारण से माहौल की कहानी के लिए बिजली भी मोहल्ले वाले देते थे। अंजु की माँ फ़िल्म की यूनिट के यातायात का इंतज़ाम अपनी जेब से करती थी। रात के दृश्यों का फ़िल्मांकन फ़ोटोग्राफ़र नंदू कारों की लाइट से करते थे। संवाद और गीत कैफ़ी के थे। दो गीत थे जो गीता दत्त और हेमंत कुमार ने कनु राय के निर्देशन में मुफ़्त में गाए थे।

कहानी बासु की अपनी लिखी थी। सब की निगाह में निठल्ला राजू (तरुण घोष) छुटपुट काम करके गुज़र बसर कर रहा है। कोई उसे किसी गिनती में नहीं गिनता। नए आए पड़ोसी प्रदीप की बहन रेखा (अंजु) उसे आशा बंधाती है कि वह भी कुछ कर सकता है। बस, वह साधना में लग जाता है और मन ही मन उसे चाहने लगता है। मशहूर हंसोड़ बन कर वह शहर शहर बुलाया जाता है। बहुत दिन बाद लौटता है तो रेखा की शादी हो रही है। शादी में राजू कमाल का शो करता है।
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अंजु ने कभी अपने मस्त जीवन से किनारा नहीँ किया। क्रिकेटर गैरी सोबर्स से एंगेजमैंट (सगाई) किया जो जल्दी ही टूट भी गया। हीरोइन तो नहीं बन पाई, लेकिन ‘उसकी कहानी’ के बाद तीस फ़िल्मों में काम किया। इन में से कुछ थीं: 1967 की ‘ज्वैल थीफ़’, 1968 की ‘संघर्ष’, 1969 की ‘बंधन’,1969 की ‘इंतक़ाम’, 1970 की ‘दस्तक’, 1974 की ‘प्रेमशास्त्र’,... 1977 की ‘मुक्ति’,1978 की ‘दरवाज़ा’, 1982 की ‘वकील बाबू’, 1987 की ‘ख़तरनाक़ इरादे’,1988 की ‘विजय’, 1992 की ‘जान तेरे नाम’, 1993 की ‘दिल की बाज़ी’, 2002 की ‘साथिया’, 2010 की ‘आई हेट लव स्टोरीज़’, 2011 की ‘डर्टी पिक्चर...
टेलिविज़न पर कई लोकप्रिय सीरियलों में आते उसे तीस साल हो गए हैँ। प्रवेश किया ज़ी टीवी चैनल के ‘हमारी बेटियों का विवाह’ में तृष्णा की सास के तौर पर। ‘गीत हुई सब से पराई’ में मान की दादी बनी तो ‘एक हज़ारों में मेरी बहना’ में दादी। स्टार प्लस के ‘ये है मोहब्बतें’ में सुजाता, ‘रिश्तों के चक्रव्यूह’ में अनामी की दादी। और फिर स्टार प्लस पर ही ‘मरियम ख़ान रिपोर्टिंग लाइव’ में मरियम / मनजीत को शरण देने वाली बीजी।
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हम सवाल कर सकते हैं कि राजेश खन्ना की घरेलू बीवी का जीवन बेहतर रहता या तस्वीरों के संसार में निरंतर सक्रियता।
सुरैया ने कहा थाकौन कह सकता है कि शादी हो जाती तो क्या होता। कई दोस्तोँ के घर मैंने बिखरते देखे हैं। मैं अपने अकेलेपन में मगन हूं। मनचाहा करती हूं, मनचाहा जीती हूं। मेरे अपने संगी साथी हैं। हां, मां के चले जाने के बाद कभी कभी अकेलापन सालने लगता है।
  

अरविंद कुमार
यह मनचाहा जीवन अंजु के लिए अपना मनचाहा करने की आज़ादी थी और है। अंजु का प्रेम राजेश के अंतिम दिन तक बना रहा। बीमार पड़ने से बहुत पहले से ही अंजु और राजेश साथ हो गए थे। राजेश ने नया दफ़्तर ख़रीदा तो अंजु वहां काम करती थी। जब अंजू ने कार ख़रीदी तो सब से ज़्यादा ख़ुशी राजेश को हुई थी। डिंपल से शादी होने के बाद दोनों मिलते जुलते रहते थे। राजेश के आख़री सालोँ में वह साथ थी, दवा दारू की देखभाल करती, अस्पताल ले जाती थी। आख़री सांस में राजेश के हाथ में अंजु का हाथ था। पवन हंस क्रिमेटोरियम मेँ हुआ था। पोते आरव ने मुखाग्नि दी तो अंजु और डिंपल साथ साथ रो रही थीँ।

सिनेवार्ता जारी है...

अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)    

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