उस लड़की को देखा तो ऐसा लगा... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

उस लड़की को देखा तो ऐसा लगा...

फिल्म समीक्षा
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
निर्देशक - शेली चोपड़ा धर
कलाकार- अनिल कपूर, सोनम कपूर आहूजा, राजकुमार राव, जूही चावला आदि।


*रवींद्र त्रिपाठी
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा स्त्री समलैंगिकता (लेसबियनिज्म) की वकालत करने वाली फिल्म है। कह सकते हैं कि फिल्म बोल्ड विषय वाली है। लेकिन सिर्फ विषय के स्तर पर। इसके के लहजे में वो बोल्डनेस नहीं है। फिर भी जिस तरह आज यौन आजादी को लेकर नए विचार सामने आ रहे हैं उसे देखें तो ये परंपरा से भिन्न राह पर चली तो है। खासकर भारतीय समाज में। हालांकि इस विषय पर हिंदी में पहले भी कुछ फिल्में बन चुकी है। पर अदालत अब समलैंगिकता को अपराध मुक्त घोषित कर चुकी है। इसलिए कोई कानूनी लफड़ा नहीं रह गया है।
फिल्म की कहानी
एक लड़की है स्वीटी (सोनम कपूर आहूजा) जोकि अपने में सिमटी सी रहती है। एक दिन वह छुपते छुपके उस जगह पहुंच जाती है जहां एक नाटक का रिहर्सल चल रहा है। नाटक एक लव स्टोरी है। इसका लेखक साहिल मिर्जा (राजकुमार राव) उससे पूछता है कि वहां किससे छुपने आ गई। लड़की सीधे सीधे तो इस सवाल का जवाब नहीं देती लेकिन कहती है जिस लव स्टोरी में कोई स्यापा न हो वो सही ढंग की लव स्टोरी नहीं होगी। खैर लड़की फिर भागती है और लड़के को पता चल जाता है कि वो मोगा (पंजाब) की रहनेवाली है। लड़के को तो अपनी तरफ से उससे इश्क हो चुका है इसलिए वो भी मोगा पहुंच जाता है। पर वहां पहंचकर उसे पता चलता है  कि लड़की को भी इश्क है लेकिन उससे या किसी और लड़के से नहीं बल्कि किसी लड़की से। अब क्या होगा? लडकी उस लड़के यानी साहिल मिर्जा की होगी या लड़की की? क्या लड़की के भाई और पिता उसकी समलैंगिकता को स्वीकार करेंगे या उस पर दबाव बनेगा कि वो सामान्य यानी नॉर्मल जिंदगी जिए?
फिल्म हल्के फुल्के ढंग से कहानी को आगे बढ़ाती है। जूही चावला ने इस छत्रो नाम की एक प्रौढ़ा औऱत की भूमिका निभाई है जो उस उम्र में भी हीरोइन बनना चाहती है और एक प्राइवेट संस्थान से उसने अभिनय की कोचिंग भी ली है। यह  फिल्म का मजाकिया पहलू है। दूसरा मजाकिया पहलू यह है कि स्वीटी के पिता की भूमिका उनके वास्तविक पिता अनिल कपूर ने निभाई है वो बलबीर चौधरी नाम से मोगा में फैक्ट्री चलाता है। बलवीर की कपड़े की फैक्ट्री है लेकिन उसका असल शौक खाना बनाना है। छत्रो भी खाना बनाने में कुशल है। फिल्म में दोनों के बीच इश्क भी पनपने लगता है। ये भी दर्शकों को हंसी के कई मौके देता है।
निर्देशन और अभिनय
एक जमाने में स्त्री समलैंगिकता भारतीय समाज में वर्जित विषय रहा है। हालांकि धीरे धीरे मान्यताएं बदल रही हैं लेकिन ऐसी नहीं बदली हैं कि समाज उसे पूरी तरह से स्वीकार कर ले और बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म दनादन पैसे की बारिश करने लगे। फिर भी फिल्म की निर्देशक शैली चोपड़ा धर के बारे में ये तो कहना होगा कि उन्होंने साहसिक काम किया है और इस विषय को इतने फुल्के ढंग से पेश किया है कि दर्शक को जोर का झटका नहीं लगता। सोनम कपूर ने एक डरी डरी सहमी सहमी सी लड़की की भूमिका निभाई है। अगर उनके चरित्र में थोड़ा धाकड़पन होता तो शायद फिल्म बहस तलब होती है। लेकिन निर्देशक की मंशा इसे बहस तलब फिल्म बनाने की नहीं है बल्कि हौले हौले तरीके से एक विवादास्पद विषय को ठंडा करके परोसने की रही है। लेकिन फिल्म बनाने की शैली लेकर कोई नियम नहीं बनाया जा सकता और जरूरी नहीं कि हर निर्देशक की एक ही राह पर चले।
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क – 9873196343  

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