जावेद अख़्तर ने कहा कि अजीब आदमी था क़ैफी आज़मी! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 17 फ़रवरी 2019

जावेद अख़्तर ने कहा कि अजीब आदमी था क़ैफी आज़मी!


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–70

गर्महवा के लोग (3)
जिन्होंने 'गर्म हवा' को बनाया 'गर्म' !
गर्म हवा को गर्म बनाया था कैफ़ी ने। देश के विभाजन, गांधी जी की हत्या – यानी 1947-48-49-50 के सालों केसटीक चित्रणके लिए चाहिए था एक पूरे इतिहास की शक्तियों का विहंगावलोकन - सामाजिक चेतना की, इनसान और इंसानियत की गहरी समझ - आज़ादी से पहले और बाद के भोगे वाक़यात का अनुभव। यह सब था अजीब आदमी कैफ़ी के पास। इस्मत चुग़ताई की कहानी के रेलवे के स्टेशन मास्टर के नज़रिए से पाकिस्तान जाने वाले मुसाफ़िरों को आगरे के जूता उद्योग में लगे मुसलमान बना देना - यूं ही नहीँ हो पाया था। विभाजन से जूता उद्योग में लगे मुसलमानों पर क्या असर हुआ, किस तरह कर्ज़ मिलना दुश्वार होता गया, किस तरह पाकिस्तान से आए अजमानियों ने उस उद्योग पर पैसा लगाया, किन हालात में उनके घर और हवेलियां अजमानी जैसों के पास पहुंचीँ, किस तरह मुसलमानों का एक तबक़ा पाकिस्तान जाने लगा, चाहे जूता कारीगर हो या मालिक, लीडर हो या मतलबी छुटभैया - यह कहानी में पूरी डिटेल के साथ पिरोना कोई कैफ़ी जैसा ही कर सकता था जो हालात से भीतर से वाकिफ़ हो और ऊपर उठ कर उन का  तटस्थ विवेचन कर सके। एक तरफ़ बाज़ार है तो दूसरी तरफ़ घर हैं। घरों में रहने वाले मर्द हैं, और औरतें हैं, बहुएँ बेटियाँ हैँ, उन पर क्या गुज़र रही है जो चहारदीवारी के भीतर से बड़े मंज़र को देख नहीँ पातीं पर उस से उन की ज़िंदगी के दुखसुख बंधे हैं। नौजवान लड़के लड़कियां इश्क़ करते हैं, पर उन का मिल पाना या न मिल पाना देश में हुई बड़ी बड़ी घटनाओं पर मुनहस्सर है।
यह अजीब आदमी पैदा हुआ था उत्तर प्रदेश के चीनी मिलों एवं वस्त्र बुनाई जैसे उद्योगोँ वाले ज़िले आज़मगढ़ के एक छोटे से गांव मिजवां में 14,15,17 या 19 जनवरी 1919 से लेकर 1925 तक कभी। अजीब आदमी ख़िताब उसे दिया दामाद जावेद अख़्तर ने।
आठ साल का था शायरी करने लगा। ग्यारहवें साल मेँ फ़िलबदी ऐसी गज़ल (इतना तो ज़िंदगी मेँ किसी की ख़लल पड़े-हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े) कह गया, जो बेगम अख़्तर के गले से निकल कर हिंदुस्तान और पाकिस्तान मेँ लोकप्रिय हो गई।

युवा कैफी
जन्म का नाम था अतहर हुसैन रिज़्वी, मुशायरे मेँ यह ग़ज़ल सुनकर अब्बा सैयद फ़तह हुसैन रिज़्वी ने उसे तख़ल्लुस बख़्शा–कैफ़ीकैफ़ का मतलब है-सक़ते का आलम, समाधि मेँ स्थिति, आत्मानंद। मुंबई मेँ जब भी उससे मेरी निजी मुलाक़ात हुई उसके चेहरे पर एक आत्मस्थ भाव होता था, नफ़ासत, शराफ़त और तहज़ीब उसके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग थे। और खुलापन।
मिजाज़ जितना आशिक़ाना और शायराना था, उतना ही बाग़ियाना भी था। इसलाम की शिक्षा दीक्षा के लिए लखनऊ के मदरसे में दाखिल किया गया तो यूनियन बना कर हड़ताल करा डाली। हड़ताल में कोई न कोई तेज़ धार नज़्म सुनाता। आख़िर मज़हब का ही फ़ातिहा पढ़कर वहां से निकल गया।
1966 में गुरुदत्त की शाहिद लतीफ़ निर्देशित धर्मेंद्र माला सिन्हा वाली फ़िल्म बहारें फिर भी आएंगी का गीत बदल जाए अगर माली / चमन होता नहीं ख़ाली / बहारें फिर भी आती हैं / बहारें फिर भी आएंगी मुझे बहुत अच्छा लगा था जो डेढ़ साल पहले हुई पंडित नेहरू की मृत्यु से उदास देश को आशा का संदेश दे रहा था। अगले साल की नौनिहाल में नेहरू की शवयात्रा बाक़ायदा दिखलाई गई थी और उन्हीं की तरफ़ से कैफ़ी की पुकार थी: “मेरी आवाज़ सुनो, प्यार के राज़ सुनो/ मैंने एक फूल जो सीने पे सजा रक्खा था / उसके परदे मैं तुम्हें दिल से लगा रक्खा था / था जुदा सब से मेरे इश्क़ का अंदाज़ सुनो। मशहूर शायर और कम्यूनिस्ट नेता सज्जाद ज़हीर से मुलाक़ात ने उस की ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। कांग्रेसी जलसे जलूसों और सत्याग्रहोँ मेँ शामिल रहने वाला कैफ़ी अब कम्यूनिस्ट बना और सज्जाद के कहने पर बंबई जा बसा। नए खुलेपन मेँ मिज़वाँ का क़स्बाती और लखनऊ के सुल्तानुल मदारी सका मुल्लाई माहौल अब किसी गुज़रे ज़माने की याद था। अब था नया चमचमाता शहर, नए लोग, नए दोस्त। प्रगतिशील लेखक संघ, जननाट्य संघ (इप्टा)। नई सोच, नए जलसे, जुलूस। मज़दूरों के बस्ती, मज़दूर आंदोलन। हड़ताल। नारे। उर्दू पत्रिका मज़दूर मोहल्ला का संपादन। मुशायरे।
शैलेंद्र ने पहला फ़िल्म गीत लिखा था पहली संतान के समय पैसों के लिए। प्रगतिशील लेखकों के संगठन की इस्मत चुग़ताई ने देखा कि चालीस रुपए महीना भत्ता पाने वाले कैफ़ी की बीवी को बच्चा होने वाला है, तो उसने पति शाहिद लतीफ़ से कहा कि बुज़दिल (1951) के लिए गीत लिखवा लें। कैफ़ी कैफ़ियत देने लगे,“मैं गीत लिखना कहां जानता हूं! शाहिद ने समझाया बुझाया, मेहनताना सीधे शौकत को मिलेगा। कैफ़ी ने हां कर दी। (यह पहली संतान थी भविष्य की महान अभिनेत्री शबाना!) शचिन देव बर्मन के संगीत वाली बुज़दिल में एक गीत मैं अलबेली रुमझुम बाजे घूंघर मेरा था, बाक़ी तीन कैफ़ी के –डर लागे दुनिया से बलमा, रोते रोते गुज़र गई रात, और मझदार में किश्ती डूब गई
जैसे-तैसे गुज़र हो रही थी। कैफ़ी की दूसरी संतान हुई अहमर - भविष्य का सिनेमैटोग्राफ़र बाबा आज़मी। 
बड़ा ब्रेक मिला गुरुदत्त की 1959 की काग़ज़ के फूल में। फ़िल्मों में धुन पहले बनती है, बोल बाद में लिखे जाते हैं। कैफ़ी का कहना था, यह ऐसा है पहले क़ब्र खोद लो और गाड़ने के लिए लाश उसके मुताबिक तलाश लो।... कभी सिर बाहर निकला रहेगा, कभी पैर। लेकिन मेरे डायरेक्टर ख़ुश थे कि मैं लाश सही तरह फ़िट कर देता था!”

क़ैफी, शौक़त और शबाना

कैफ़ी के यादगार गीत वक़्त ने किया क्या हसीं सितमका क़िस्सा अजीब ही है। बर्मन दा को गीत पसंद आया पर फ़िल्म में उस के लिए कोई मुकाम न था। गीत गुरुदत्त को भी पसंद था, पर काग़ज़ के फूल में लाश के लिए सही क़ब्र यानी सिचुएश गढ़ी गुरुदत्त ने। फ़िल्म बुरी तरह पिटी। गुरुदत्त का दिल डूब गया। (क्यों पिटी के लिए मेरे पास माकूल जवाब है। वह मैं लिखूंगा गुरुदत्त वाली क़िस्त में –अरविंद कुमार।)
ऊंच नीच के साल बीत रहे थे। कैफ़ी अपने को बदक़िस्मत, बदनसीब, बदबख़्त मानने लगे। तब जैसे आसमान से आ टपके निराश फ़रिश्ते से चेतन आनंद! लंबे अंतराल के बाद फिर से चेतन होने को बेताब। कैफ़ी ने कहा, चेतन साहब, लोग कहते हैं मैं कहता अच्छा हूं पर सितारे मेरे साथ नहीं हैं!” चेतन ने जवाब दिया, यही बात लोग मेरे बारे में कहते हैं...क्या पता हम दो नेगेटिव मिल कर पौज़ीटिव बन जाएं.. चलो चुनौती संभालते हैं बेखटके। हक़ीक़त दोनों के लिए ख़ुशनसीबी बन कर आई।
मदन मोहन के संगीत में कैफ़ी ने दिए ऐसे गीत जो अमर हो गए, जैसे: “मैं यह सोचकर उस के दर से उठा था/ कि वह रोक लेगी मना लेगी मुझको/ हवाओं में लहराता आता था दामन/ कि दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझकोऔर कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों/ अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों/ सांस थमती गई नब्ज़ जमती गई/ फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया/ कट गये सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं/ सर हिमालय का हमने न झुकने दिया/ मरते मरते रहा बांकपन साथियों/ अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। और पाकीज़ा (1972) का चलते चलते कोई यूं ही मिल गया था।
कैफ़ी का दूसरा नाम है जीवट, जिजीविषा। 1973 में उन्हें फ़ालिज का भारी दौरा पड़ा। लगा देश ने एक महान प्रतिभा को खो दिया। अगले ही साल मैं ने उन्हें देखा पहले जैसे सक्रिय, उत्साह से भरपूर। 

जावेद और शबाना
मुझे बंबई से आए कई साल हो गए थे। वह किसी अवॉर्ड के लिए आए थे। उन से मिलने को चाय पार्टी के लिए गिनेचुने लोगों में मैं भी था। सब को छोड़ कर वह देर तक मुझ से पुरानी यादों की बात करते रहे। और भी लोग थे उन से मिलने को बेचैन। आख़िरकार कैफ़ी से क्षमा मांग मैं कुछ दूरी पर जा बैठा और उन्हें निहारता रहा।
जीवन के अंतिम साल उन्होंने अपने पैदाइशी गांव मिज़वां में गुज़ारे। उसकी तरक़्क़ी के लिए
अंत में मैँ उनके फ़िल्मी गीतों का ज़िक्र न कर के अपनी पसंद के कुछ अशआर पेश कर रहा हूं :

इतना तो ज़िंदगी मेँ किसी की ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कलपड़े
जिस तर्ह हँस रहा हूँ मैँ पी पी के गर्म अश्क
यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े
इक तुम कि तुम को फ़िक्रे-नशेबो-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े
साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्न:-लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पड़े
मुद्दत के बाद उस ने की तो लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े
जिस तरह हंस रहा हूं मैँ पी-पी के गर्म अश्क
यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े
-
हाथ आकर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई
लग गया इक मशीन में मैं
शहर में ले के आ गया कोई
मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई
यह सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई
ऐसी मंहगाई है के चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई
अब वो अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई
वो गए जब से ऐसा लगता है
छोटा मोटा खुदा गया कोई
मेरा बचपन भी साथ ले आया
गांव से जब भी आ गया कोई
-
सुना करो मेरी जान, इन से उन से अफसाने 
सब अजनबी हैं यहा, कौन किसको पहचाने
यहां से जल्द गुज़र जाओ काफ़िलेवालो
हैं मेरी प्यास के फूंके हुए ये वीराने
मेरे जूनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग
सुना है बंद किए जा रहे हैं बुतखाने
जहां से पिछले पहर कोई तश्नकाम उट्ठा
वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने
बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने
हुआ है हुक्म कि कैफ़ी को संगसार करो
मसीह बैठे हैं छुप के कहां ख़ुदा जाने.
-
पत्थर के खुदा वहां भी पाए,
हम चांद से आज लौट आए.
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं,
क्या हो गए मेहरबान साए.
जंगल की हवाएं आ रही हैं,
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए.
लैला ने नया जन्म लिया है,
है क़ैस कोई जो दिल लगाए?
है आज ज़मीन का गुस्ल-ए-सेहत,
जिस दिल में हो जितना खून लाये.
सेहरा सेहरा लहू के खेमे,
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आए.
-
शगुफ्तगी का लताफ़त का शाहकार हो तुम,
फ़क़त बहार नहीं हासिल-ऐ-बहार हो तुम,
जो इक फूल में है क़ैदवोह गुलिस्तान हो,
जो इक कली में है पिन्हां वो लालाज़ार हो तुम.
हलावतों की तमन्ना, मलाहतों की मुराद,
ग़रूर कलियों का कलियों का इन्कसार हो तुम,
जिसे तरंग में फितरत ने गुनगुनाया है,
वो भैरवी हो, वो दीपक हो, वो मल्हार हो तुम .
तुम्हारे जिस्म में ख्वाबीदा हैं हजारों राग,
निगाह छेड़ती है जिसको वोह सितार हो तुम,
जिसे उठा न सकी जुस्तजू वो मोती हो,
जिसे न गूंथ सकी आरज़ू वो हार हो तुम.
जिसे न बूझ सका इश्क़ वो पहेली हो,
जिसे समझ न सका प्यार वो प्यार हो तुम
खुदा करे किसी दामन में जज़्ब हो न सके
ये मेरे अश्क-ऐ-हसीं जिन से आशकार हो तुम.
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इस अजीब आदमी ने जिसका नाम कैफ़ी था 10 मई 2002 को दुनिया को अलविदा कह दिया।
लखनऊ के एक होटल मेँ कैफ़ी गिर पड़े और कूल्हे की हड्डी मेँ तीन जगह फै्रक्चर हो गया। चार महीने तक उन्हें लखनऊ मेडिकल कॉलेज मेँ भरती होना पड़ा।

अरविंद कुमार
अजीब आदमी था वो, एक ऐसा आदमी जिसके शरीर का पूरा बायाँ अंग फालिज से प्रभावित हो चुका हो। कूल्हे की हड्डी मेँ तीन-तीन फ्रैक्चर हो चुके होँ, व्हीलचेयर के बिना न चल पाने की स्थिति मेँ हो फिर भी ज़िंदगी की आखिरी सांस तक जूझता रहा हो। अपने गाँव को मॉडल विलेज बनाने के लिए, सड़कें, अस्पताल, डाकघर ,टेलीफोन, प्रशिक्षण केंद्र, कम्यूनिटी सेंटर, लड़कियोँ का प्राथमिक, जूनियर, हायर सैकेंड्री स्कूल, जो कुछ भी मिजवाँ मेँ दिख रहा है, कैफ़ी के संकल्प और सपनों का प्रतिफल नहीँ तो और क्या है? इतना ही नहीँ मृत्यु के 2-3 वर्ष पूर्व कैफ़ी मिजवां की एक जनसभा मेँ अपनी बेटी शबाना से एक वादा भी करा लेते हैं कि मेरे न होने की स्थिति मेँ मेरी लड़ाई को आगे बढ़ाती रहोगी और अधूरा काम पूरा करोगी। अदब की दुनिया का यह रोशन ख्याल शायर 10 मई 2002 को जसलोक अस्पताल बंबई मेँ सबको अलविदा कर इस दुनिया सेचल दिया।

सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)    

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