“इंसान कब तक अकेला रह सकता है?"- यह था बलराज साहनी का आखिरी संवाद - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 3 फ़रवरी 2019

“इंसान कब तक अकेला रह सकता है?"- यह था बलराज साहनी का आखिरी संवाद


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–68
गर्म हवा के लोग, भाग 1
बलराज साहनी की आखिरी फिल्म 'गर्म हवा'

गर्म हवा का यह एक शॉट हज़ारों शब्दों से कई गुना कह रहा है, और मेरे लिए बलराज साहनी का प्रतीक बन गया है। अपने वक़्त से लड़ते लड़ते हार कर सलीम मिर्ज़ा पाकिस्तान जाने को तैयार हो गया है। अपनी मिट्टी से और अपनी सांस्कृतिक थाती से बिछुड़ना क्या होता – यह तस्वीर उसका सशक्त बिंब, कहें तो प्रतिबिंब है, दर्पण है, एक पूरी दास्तान है।
गर्म हवाउनकी आखिरी फ़िल्म थी - उनकी अभिनय कला का उत्कृष्टतम उदाहरण भी। इसकी डबिंग पूरी करने के अगले दिन पंजाब के बड़े त्योहार बैसाखी (13 अप्रैल 1973) को दिल का दौरा पड़ा और वह चले गए। जो शब्द उन्होंने इस पहले दिन डब किए वे थे: “इंसान कब तक अकेला रह सकता है?” यही था गर्म हवा का संदेश।
उनकी अन्य सार्थक सामाजिक फ़िल्म हैं: 1946 की धरती के लाल, 1953 की दो बीघा ज़मीन, 1961 की काबुली वाला। सार्थक से मेरा मतलब है मीनिंगफ़ुल, अर्थपूर्ण, संदेशपूर्ण।
उनका जन्म सन् 1913 में पहली मई को हुआ था, मानों उन्होंने स्वयं चुना हो मज़दूर दिवस पर पैदा होना, और उनके लिए अंतिम गर्म हवा भी एक वैसा ही सामाजिक संदेश देने वाली फ़िल्म थी। इसी तरह संदेशवाहक थी उनकी पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म 1946 की धरती के लालउनके मित्र ख़्वाज़ा अहमद अब्बास ने बनाई थी इप्टा के लिए। 
न्यू यार्क टाइम्स ने इसके बारे में लिखा था-"...a gritty realistic drama." यानी एक कठोर यथार्थवादी कृति। 
उनका जन्म रावलपिंडी में हुआ था। नाम था युधिष्ठिर। पिताने उनके छोटे भाई भीष्म का नाम भी महाभारत के पात्रों में से चुना था। बलराज ने अपना नाम कब बदला – इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।
अपने बचपन के बारे में उन्होंने लिखा है: मैं आठेक साल का रहा हूँगा। प्लेग की महामारी के डर से पूरी पिंडी आतंकित थी। एक दिन बेबे ने घर के पास खेलता चूहा क्या देखा, हम सब को लाद कर हमारे पुश्तैनी भेड़ा भाग आई।
बलराज ने गवर्नमैंट कालिज यूनिवर्सिटी लाहौर से इंग्लिश में बीए और एमए किया और हिंदी में बीए। उसके बाद दमयंती साहनी से शादी कर ली।

बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती

तीसादि दशक के अंतिम बरसों में वे दोनों गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन में इंग्लिश और हिंदी पढ़ाने दाख़िल हुए। यहीं उनके बेटे परीक्षित साहनी का जन्म हुआ। (ध्यान रहे परीक्षित का नाम भी महाभारत से लिया गया है।) सन् 1938 में एक साल ये लोग गांधी जी के साथ रहे। अगले साल गांधी जी की अनुमति ले कर लंदन में बीबीसी के हिंदी विभाग में शामिल हुए और 1943 में भारत लौट आए – बंबई। पति-पत्नी को अभिनय का शौक़ था। शुरूआत हुई नाटकों से। बलराज की पहली बड़ी फ़िल्म थी ख़्वाजा अहमद अब्बास की विश्व क्लासिक धरती के लाल– बंगाल के अकाल का बेरहम चलचित्रण। सन 1947 में दमयंती का देहांत हो गया। इस के दो साल बाद उनकी पत्नी बनीं संतोष चंडौक।
मुझे धूमिल सी याद है ज़िया सरहदी के निर्देशन में बनी सन् 1951 की हम लोग और उस में बलराज साहनी (राज) और अनवर हुसैन (कुंदन) के बीच प्रतिद्वंद्वात्मक अभिनय की। इससे अधिक मैं इस पर कुछ नहीं सकता। हां, बंबई में जब मैं किसी फ़िल्म या समारोह में था, वहां घोषित किया गया था कि पाकिस्तान से आए ज़िया सरहदी मौजूद हैं यहां।  ज़िया ने बैजू बावरा के संवाद लिखे थे, और फ़ुटपाथआवाज़ जैसी स्मरणीय फ़िल्में दी थीँ।
बलराज जी से मेरी पहली मुलाक़ात कराई थी 1963 के दिसंबर में हिंदी ब्लिट्ज़ के प्रथम और तत्कालीन संपादक मुनीश नारायण सक्सेना ने। जूहु तट पर मुनीश के शैक से सटा था बलराज जी का शैक। आजकल की पीढ़ी को उस ज़माने के शैक समझाना आसान नहीँ है। शैक कहें तो झोंपडों जैसी छत वाले आधे कच्चे और आधे पक्के मकान। बड़े बड़े फ़िल्म वाले, लेखक, कलाकार भी रहते थे उनमें। मुझे याद है एक जानकी कुटीर। कुछ समय उस में मीना कुमारी रहा करती थीं। कभी पहले उसमें कुछ दिन महात्मा गांधी रहे थे। उसके समुद्र तट से प्रवेश वाले भाग में अब्बास ने किसी मौक़े पर कोई आयोजन किया था। मैं भी था उस में और पृथ्वीराज जी भी थे।
तो मुनीश ले गए मुझे बलराज से पास मिलवाने। मैं चाहता था कि वे माधुरी में कोई कालम लिखेँ। उन्होंने मुझे समझाया था कि किस तरह वे पंजाबीयत के लिए कटिबद्ध हैं और उसके अलावा अब किसी और भाषा में नहीं लिखते। मैंने कहा था कि हम हिंदी अनुवाद करा लेंगे। पर वे अड़े रहे, माने नहीं थे। संदर्भवश: बहुत कम लोगों को याद होगा कि देव आनंद की सुपरबिट बाज़ी (1951) की कहानी, पटकथा और संवाद बलराज जी ने लिखे थे। (बाद में बलराज जी ने जूहु तट के दूसरे दूर वाले हिस्से में बंगला बनवा लिया था। एक दो बार मैं गया था वहां। उसी से सटा छोटा सा मकान था मेरे मित्र और माधुरी में निरंतर लिखने वाले उमेश माथुर का। उमेश के घर मैं और कुसुम अकसर ही जाते थे।)

दो बीघा ज़मीन का एक दृश्य
बलराज की पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म थी बिमल राय की दो बीघा ज़मीन।फ़िल्म की प्रेरणा थी वित्तोरिया द सिक्का की बाइसिकल थीफ़, जिसने कई भारतीय फ़िल्मकारोँ को प्रभावित किया था। आधार थी सलिल चौधरी की कहानी रिक्शावाला। संगीत भी सलिल चौधरी का था और गीत थे शैलेंद्र के। कहा जाता है कि पहले बिमल राय रिक्शावाले शंभु महता के लिए अभिनेता जयराज, त्रिलोक कपूर या नाज़िर हुसैन को लेना चाहते थे, पर हम लोग देख कर फ़ैसला बलराज के पक्ष में किया। टीम के लोगों की राय थी कि उच्चवर्ग के पंजाबी बलराज को कलकत्ते के निम्नतम वर्ग का रिक्शावाला बन पाना संभव नहीं होगा। स्पष्ट है कि वे लोग अब्बास वाली धरती के लाल में बलराज को नहीं जानते थे जिस का क्षेत्र बंगाल ही था। वे यह भी नहीं जानते थे कि हर ज़िम्मेदार कलाकार की तरह बलराज अपने आप को तैयार करते थे। इस सुनहरी मौक़े पर खरा उतरने के लिए वे जी जान से जुट गए शंभु महतो बनने में। सिर पर गमछा लपेट कर कलकत्ते की सड़कों पर रिक्शा में बेटे परीक्षित और बेटी शबनम को बैठा खीँचने का अभ्यास करने लगा। शांति निकेतन में बंगला भाषा से परिचित हो गए थे। उसके सहारे कलकत्ते के रिक्शावालों की संगत करते। तभी वह साकार कर पाए वह छोटा किसान जो 235 रुपए का भुगतान न कर पाने के कारण अपने बीवी बच्चे गांव में छोड़ कर कलकत्ता में मोटे मोटे सेठों का लाद रिक्शा रिक्शा चलाने को विवश हो गया है।
यही वह अभ्यास था कि बलराज साहनी प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा पर कृष्ण चोपड़ा की 1959 की हीरा मोती के निर्धन किसान धुरी और उसके बैलों की कहानी सजीव कर पाए।
उनकी फ़िल्मों के बारे में और कुछ न लिख कर मैँ उनकी आत्मकथा से कुछ अंशों के स्वतंत्र अनुवाद पेश कर रहा हूं:
एक समय ऐसा आता है जब हर फ़िल्मी सितारे के नाम से पहले भूतपूर्व लग जाता है। तो गीता बाली भी इस से कैसे बची रह सकती थी। अच्छा है कि आज वह हमारे बीच नहीं है। मैं ने देखा था उसे अपने चारों तरफ़ घिरती विस्मृति की काली छायाओं से घिरते हुए...।
हम सब शोमैन अपनी अलग दुनिया में रहते हैँ। मायावी, डरावनी, अजीबो ग़रीब दुनिया - लोगों को फ़ैंटेसियों और आसमानी कुलाबों के लोक में ले जाने वाला संसार। और हम भी इस दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं। वह दुनिया जो हमारे चाहने वालों को भी लपेट लेती है। जितनी बड़ी हमारी गाड़ी, हमारे फ़ैन उतने ही ख़ुश!
ऐसा कोई बड़ा या छोटा सितारा नहीं है जो फ़िल्म मैगज़ीन में अपनी तस्वीर देखना न चाहता हो – बड़े क़रीने से सजाई गई बड़ी तस्वीर। हर कलाकार को इससे अपार ख़ुशी मिलती है।...सच कहूं तो मैं अपने आप को लोगों को छलने वाली इस दुनिया से ऊब चुका हूं...कई बार मैं अपने से कहता हूं, क्या तुम नहीं जानते कि तुम ज़िंदगी के सफ़र के छोर पर हो।...
बहुत पहले हमारे स्कूल में बताया गया कि बच्चों को बायस्कोप दिखाया जाएगा। शहर के बाहरी इलाक़े में बड़े अहाते में खुले आसमान के नीचे रात को शो होगा। सिनेमा के परदे के पास एक ऊंचा मचान बना था। उस पर खड़ा अनाउंसर बता रहा था कि साइलैंट मूवी में क्या दिखाया जा रहा है। हमारे साथ थे तमाम मास्टर और हैमास्टर। बच्चों के लिए हाफ़ टिकट था। बेबे ने ख़ुशी ख़ुशी मुझे और भाई को सिनेमा देखने भेज दिया। यह बात कोई पैंतालीस साल पहले की है। मुझे बस इतना याद है कि यह कोई जासूसी फ़िल्म नहीं थी। और हाँ कि प्रेम दृश्यों हीरोइन बार बार पूरे कपड़े उतार देती थी। अनाउंसर कहता, साहबान, यह औरत नंगी नहीं है। उसकी ड्रैस जादुई है। इसके बल पर वह जहां चाहे जा सकती है। वह तो सब को देख सकती है, पर किसी और को वह दिखाई नहीं देती...
कमसिन उम्र में मुझे अनाउंसर की बात का पूरा भरोसा था। शायद वह ठीक ही कह रहा है। उसके नंदापन अनोखा ही था। चेहरा तो गोरा चिट्टा दिखता था, लेकिन बाक़ी बदन पूरा काला। या तो उसके बदन पर काला रंग पोता गया था या उसने पूरे बदन पर देह से चिपके काले कपड़े पहने थे।

काबुलीवाला का एक दृश्य
तमाम दर्शकों की तरह हमारे मास्टरों को इस में कोई बातबेजा नज़र नहीँ आई। सब को मज़ा आ रहा था। किसी ने इस पर आपत्ति नहीँ उठाई। आख़िरकार अनाउंसर कहा तो था कि औरत नंगी नहीं है। हम बच्चों को अनाउंसर पर पूरा भरोसा था...।
कुछ दिन बाद हमारा रसोइया ले गया एक और फ़िल्म दिखाने। पैसे नहीं थे। हम पास के एक पेड़ की ऊंचाई पर बैठे थे। वहां से सिनेमा दिखाई दे रहा था। शो शुरू हुआ। पहले ही सीन में मर्द और औरत कुत्तों की तरह संभोग करने लगे। मैं बुरी तरह डर गया। समझ ही नहीँ आ रहा था कि हो क्या रहा है। मैं ज़ोर ज़ोर से रोने लगा, मुझ से ऊपर की डाल पर बैठे रसोइए का पैर खींचने लगा। मुझे चुप न होते देख, वह उतरा और हम दोनों घर आ गए।
बड़ा हुआ तो मुझे ऐसे दृश्यों में मुझे भी मज़ा आने लगा।
यह था फ़िल्मों से मेरा पहला साबक़ा। 
शहर के बीच ही था रोज़ सिनेमाघर। धीरे धीरे वह हिंदुस्तानी फ़िल्म दिखाने लगा। जिन दो फ़िल्मों ने मुझे बहुत प्रभावित किया वे थीँ हीर रांझा और अनारकलीअनारकली की हीरोइन थी सुलोचना। मैं उसकी ख़ूबसूरती का दीवाना हो गया। अनारकली के रूप में वह मेरे सपनों में आती। आख़िरी सीन में बेचारी अनारकली को अकबर के कारिंदों का दीवार में चिनना, धीरे धीरे उसका ख़ूबसूरत चेहरा छिप जाना! मेरा दिल छलनी हो जाता। कोई कहता कि यह सब दिखावा था, वह चिनी ही नहीँ गई थी तो मुझे उस पर भरोसा होता ही नहीँ। मैं तो यही समझता रहा कि सुलोचना मर गई। मेरी ज़िंदगी में कोई रस नहीं रह गया।
सुलोचना आज भी ज़िंदा है। कभी कभी मैं उसके साथ फ़िल्म भी करता हूं। बचपन के उससे प्रेम की बात उसे बताता हूं तो वह हंस देती है।

अरविंद कुमार
हम लोग लद्दाख में हक़ीक़त की शूटिंग कर रहे थे। रास्ते में एक जगह थी द्रास। वहां के कमांडिंग अफ़सर कर्नल साहब ने आफ़िसर्स मैस में पार्टी रखी। हमारे साथ धर्मेंद्र था, प्रिया थी, इंद्राणी मुखर्जी थी। कर्नल साहब ने देखा एक कोने में बैठी अधेड़ सुलोचना को। उनकी नज़र उससे हट ही नहीं रही थी। शायद वह सोच रहे थे – ‘पहले कहां देखा था उसे?’ अचानक उनका चेहरा खिल उठा। अरे, यह तो उनकी जवानी की सुलोचना है! बाक़ी किसी कलाकार में अब उनकी कोई दिलचस्पी नहीं बची। उनकी जवानी के सपनों की रानी तो वही थी। उनकी हालत भी वही रही होगी जो चौदह साल की उमर में मेरी थी।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क - arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। संपादक-पिक्चर प्लस)

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