अबकी बार गीतकार - जिन्होंने लिखा 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...' - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 31 मार्च 2019

अबकी बार गीतकार - जिन्होंने लिखा 'फूल तुम्हें भेजा है खत में...'


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–76


फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीँ मेरा दिल है लिखने वाला फूल सा इंदीवर
सन् 1924 के पहले दिन बुंदेलखंड के गांव धमना में जन्मे और वहीं के बरुआ सागर में पढ़े बढ़े श्यामलाल बाबूराय से बंबई में जब मेरी मुलाक़ात हुई तब तक उसने अपना नाम इंदीवर' रख लिया था। इंदीवर याने नील कमल। कमल जैसे कोमल मृदुल मन वाला इंदीवर। यह मुलाक़ात हुई थी 25 मई 1964 को। सांताक्रुज़ पश्चिम में घोड़बंदर रोड के उस पार किसी फ़्लैट के ग्राउंड फ़्लोर पर। वह अकेला नहीँ था। उसके साथ थे गीतकार अनजान, और दो तीन अन्य अल्पज्ञात हिंदी कवि। मेरे लिए वे सभी अज्ञात थे।
बंबई आए मुझे छह महीने होने को आए थे। दिल्ली की सरिता और कैरेवान से जुड़े किसी पत्रकार का माधुरी संपादक बन कर आना हिंदी फ़िल्म वालों में उत्सुकता और उत्साह का विषय था। सांताक्रुज़ वाले मकान में नया नया आया था। यही बहाना बना था उस मुलाक़ात का। किसी कुंवारे का घर था। उन्हीं का बनाया खाना था। मैं और वे सब एक दूसरे से परिचित हुए। गीतकारों ने सुंदर रचनाएं सुनाईं। इदीवर ने अपना गीत संग्रह प्यार बांटते चलो मुझे भेंट किया था। कई गीत पढ़ कर मैंने कहा था कि इस के गीतों को पिरोकर एक पूरी फ़िल्म कहानी लिखी जा सकती है।
मैं ठहरा नया। सबके विगत से अपरिचित। मुझे लगा सभी फ़िल्मों में लिखने के मौक़ों की तलाश है। पर ऐसा था नहीं। अनजान सन् 1953 से ही लिख रहे थे (प्रिज़नर ऑफ़ गोलकुंडा निर्माता प्रेमनाथ), अनजान से और भी पहले सन् 1951 में 27 वर्षीय इंदीवर को खोजा था 28 वर्षीय मुकेश ने। फ़िल्म थी डार्लिंग फ़िल्म्स की सहभागिता में मुकेश द्वारा बनी मल्हारइंदीवर का पहला गीत था बड़े अरमानों से रक्खा है बलम तेरी क़सम। इसकी अंतिम दो पंक्तियाँ थीं तेरा आंचल हो तो पतवार भी दरकार नही/ तेरे होते हुए क्यों हो मुझे तूफ़ान का ग़म। (यहां अकथित तुलना है आंचल की नाव के पाल से, जिस के होते पतवार की दरकार नहीं होती।) शेष तीन गीत थे: होता रहा यूं ही अगर अंजाम वफ़ा का, इक बार अगर तू कह देऔर तारा टूटे दुनिया देखे, देखा ना किसी ने दिल टूट गया। ये सभी मुकेश ने गाए थे। यह जो दिल टूटने की बात है, यह इंदीवर के और मुकेश के गीतों में बार-बार दोहराई जाती है।  
लता, इंदीवर और मुकेश
वह मुलाक़ात जल्दी ही अच्छी मित्रता बन गई। सांता क्रुज़ वाला मेरा घर लोकल ट्रेन के रास्ते से थोड़ा सा हट कर ही था। जब तब मिल जाना आम घटना थी। और जब मैं अंधेरी गया तो मैं घोड़बंदर रोड के उस पार था, तो इस पार यानी लोकल ट्रेन से थोड़ी ही दूर पर था इंदीवर का। किसी कंपनी के तिमंज़िला फ़्लैटों में ग्राउंड फ़्लोर पर उस ने किसी से सब-टैनेंट के तौर पर ले रखा था। उस के पास था। कहीं न कहीं भेंट हो जाती। न उस में कोई अहम न मुझ में कोई ईगो। दोस्ती जिस में किसी को किसी से कोई तवक्को, कोई अपेक्षा न। 1965 की राज कपूर और साधना वाली सन् 1964 में दूल्हा दुल्हन में उसके गीत आए – हम ने तुझ को प्यार किया है जितना, तुम सितम और करो, जो प्यार तुम ने मुझ को दिया था कल्याणजी आनंदजी के संगीत निर्देशन में और अगले ही साल कल्याणजी आनंदजी के संगीत वाली हिमालय की गोद में एक तू ना मिला, एक तू जो मिला सारी दुनिया मिली। ऑस्ट्रेलिया से आता मनोज कुमार का जहाज़ हिमालय पर दुर्घटना ग्रस्त हो गया। वहां उसे मिली माला सिन्हा। विजय भट्ट की इस फ़िल्म में हिमालय का मतलब नेपाल दार्जीलिंग वाला क्षेत्र रहा होगा। समालोचकों ने लिखा: कहां हिमालय और कहां ऑस्ट्रलिया से आते जहाज़ मार्ग! ’जो भी हो सुंदर दृश्यावली और लोकप्रिय गीतों के कारण फ़िल्म सफल रही। उसी साल आई प्रदीप कुमार कल्पना वाली अर्जुन हिंगोरानी निर्देशित सहेली। संगीत वही कल्याणजी आनंदजी, छह में से पांच गीत इंदीवर के –जिस दिल में बसा था प्यार तेरा (मुकेश), जिस दिल में बसा था प्यार तेरा (लता मंगेशकर), बहाने क्यों करती हो तुम हम से, इतना तो कह दो हम पे तुम भी मरती हो, इतना तो कह दो हम से तुम से भी प्यार है और काहे तू बीन बजाए

ये वही दिन थे जिन के बारे में भाग 24–8 अप्रैल 2018 - (संगम -2) संगम के लेखक इंदरराज में मैंने लिखा था:
[सही तारीख़ अब याद नहीँ पर घटना दिमाग़ मेँ जब तब चल ही जाती है। हम दोनोँ (मुझे और कुसुम) को मनोज कुमार और शशि ने आचार्य रजनीश के साथ एक गोष्ठी में शामिल होने के लिए बुलाया था तीसरे पहर। ऐसे गुरुओँ के प्रति मेरा कोई आकर्षण नहीँ रहा। मनोज ने बुलाया था। रजनीश क्या है यह जानने की उत्सुकतावश हम गए। संयोगवश मनोज दंपति हमारी अगवानी कर ही रहे थे कि आचार्यजी ने प्रवेश किया, मनोज और शशि को यथोचित संबोधित किया, और फिर जैसा कि किसी को ख़ुश करने के लिए जो करना चाहिए’, वह किया - मनोज के दोनोँ बेटोँ के नाम लेकर उनका हाल पूछाअब मेज़बान हमें सब को ले कर हमेँ दाहिने एक लंबोतरे कमरे मेँ ले गए। अंतिम दीवार के सामने आचार्यजी का आसन था। उन के सामने लगभग पच्चीस भक्त थे। कई अभिनेत्रियां (मुझे हेमामालिनी याद है जो मेरी ओर देख कर पहचान-स्वरूप मुस्कराई। इंदरराज आदि कुछ लेखक, मेरे मित्र गीतकार इंदीवर, संगीतकार कल्याणजी (जो माधुरीमेँ चुटकुलोँ का एक अधपेजी कालम लिखवाया करते थे)।]
मेरे अलावा सभी को आचार्यजी में पूरी आस्था थी। आरंभिक संवाद में उनके परम भक्त इंदरराज ने एक किताब भेंट की। पहले पेज पर जो लिखा था वह पढ़ कर सुनाया था, आचार्यजी, मैं सड़क पर पड़ा पत्थर हूं। मुझे ठोकर मार कर आगे बढ़ा दीजिए ताकि मैं कुछ आगे बढ़ सकूं। मैं इंदरराज की भक्ति से प्रभावित हुआ था। इस पर रजनीश ने कहा, तू सचमुच सड़क पर पड़ा पत्थर है! मूर्ख, इतना भी नहीं जानता कि आने जाने वाले ठोकर लगाते रहे तो तू वहीं का वहीं पड़ा रह जाएगा। बहुत देर रजनीश कुछ ऐसा ही कहता रहा था। मौजूद लोगों के लिए अपने महान् लेखक को बार बार मूर्ख कहना पसंद नहीं आ रहा था। पहले असंतोष और फिर रोष के भाव उभरने लगे तो आचार्यजी ने सहलाना शुरू किया था, मैं जानता हूं यह तू ने भक्तिभाव से कहा है। मैंने जो कुछ कहा, वह अमुक और अमुक कारणों से कहा था। एक दिन तू अवश्य ही अमुक और अमुक दिशाओं में उन्नति करता रहेगा। तेरा कल्याण होगा। छोटे से सभा कक्ष में सौमनस्य फिर उभर आया था।

अब आचार्य बन कर रजनीश ने पहले से निश्चित कार्यक्रम के अनुसार योग आसन का प्रशिक्षण शुरू किया। वह बोले, आज हम शव आसन का अभ्यास शुरू करेंगे। आप में कौन इस में भाग ले कर प्रदर्शन में यह आसन करेगा? हाथ उठाया इंदीवर ने। उसे आंखें बंद कर के फ़र्श पर लेटने को कहा गया। वह लेट गया। आचार्यजी कह रहे थे, कल्पना करो तुम मर गए हो। तुम मर गए हो। तुम मर गए हो। धीरे-धीरे इंदीवर का बदन निढाल हो गया। उसी टोन में आचार्यजी ने बोलना शुरू किया, कल्पना करो तुम्हारी आत्मा शरीर से निकल गई है। तुम्हारी आत्मा शरीर से निकल गई है। कुछ देर बाद आचार्यजी की आवाज़ गहरा गई, कल्पना करो तुम्हारी आत्मा कक्ष में ऊपर मंडरा रही है। आवाज़ विश्वासोत्पादक होती जा रही थी। तुम्हारी आत्मा क्या देख और सुन रही है, क्या देख और सुन रही है। फिर कुछ देर बाद, आस-पास कौन-कौन हैँ? और फिर वे क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं।
फ़र्श पर लेटा मानों सक़ते में इंदीवर कहने लगा, कई लोग हैं। कल्याणजी भाई का बुरा हाल है। रोए जा रहे हैं। विलाप कर रहे हैं, मेरा प्यारा गीतकार मुझे छोड़ गया। अब किस के गीतों को मधुर संगीत दूंगा? उस के जैसे गीत लिखने वाले हैं ही कितने... आदि इत्यादि...
मैं स्वभाव से ही अविश्वासी था और अब तक हूं। उस दिन मुझे भगवती बाबू के उपन्यास चित्रलेखा का दृश्य याद आ रहा था। विशाल सभागार में संन्यासी कपोल कल्पनाओं को अपने शब्दों से साकार कर रहा है। अकेला सामंत बीजगुप्त अप्रभावित है। मनोज वाली सभा में अकेला मैं समझ पा रहा था कि इंदीवर कल्याणजी को प्रसन्न कर रहा है।
तो यह था इंदीवर।
सीधा-सादा भावुक कवि, जो बहुत कुछ सीख गया था। जिस जगत में वह रह रहा था, उस की रीति मेंढल रहा था। जैसा देश वैसा भेष।
तब तक मैं अंधेरी वाला मकान छोड़ कर कंपनी द्वारा प्रदत्त नेपियन सी रोड पर रहृने आ चुका था। पर इंदीवर से मिलना जुलना कम नहीँ हुआ था। जब कभी याद आता तो मैं फ़ोन कर लेता। एक बार की बात है। कुसुम बच्चों के साथ दिल्ली गई थीँ। एक शाम मैं अकेला था। घर जल्दी ही आ गया था। बार बार इंदीवर को फ़ोन करने की तलब हो रही थी। और नंबर याद नहीँ आ रहा था। बस, अंधेरी के शुरूआती नंबर याद आ रहे थे। मैंने वह नंबर डायल किए और बाक़ी नंबर अटकल से डायल कर दिए। उघर से आवाज़ आई इंदीवर की!
एक बार जब वह बांद्रा या ऐसे ही किसी उपनगर में रहने लगा था, मैं मिलने जा पहुंचा। उस के बारे में बात होने लगीं। मुझे पता था कि कभी वह विवाहित भी था। मैं पूछ बैठा, पत्नी को क्यों छोड़ दिया? उसने बताया,वह बड़े तौर तरीक़े और बँध बँधाए ढंग से रहने वाली थीँ। यह गंदा क्यों है, जूते वहाँ क्यों पड़े हैँ? मैं उकता जाता था। मेरे बस का ही नहीँ है घर में ऐसी पाबंदियों में रह पाना। कब तक हम एक दूसरे को झेलते! वे ही चली गईं। मैं ने आज़ादी में जीना शुरू किया।
तो यह था इंदीवर।
कठोर सांचे में बंध कर रहने से इनकार करने वाला। घर में अपने समय पर आने जाने वाला। जहां जो चाहे फैलाने वाला।
एक और संस्मरण। एक गीत के माध्यम से उस की याद का। कई साल बीत चुके थे। मैं सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट का संपादक था। अमेरीकी कार्यालय से फ़ैलीसिटी मीड नाम की महिला आई थीं। ताज मानसिंह होटल में उनके कमरे में बैठा मैं उत्तर भारतीय शादियों और बारातों की बात कर रहा था। तभी नीचे एक बारात जाती दिखाई दी। हम दोनों वह देखने नीचे दौड़े। जगमगाते हंडों से प्रकाशित बारात, सजी धजी घोड़ी पर सेहरा बांधे राजकुमार सा दूल्हा! आगे बैंड बजाता रहा था क़ुर्बानी फ़िल्म की धुन –आप जैसा कोई मेरी ज़िंदगी में आए तो बात बन जाए!’ फ़ैलीसिटी को मैं गीत के बोल इंग्लिश में समझाने लगा, ओ, इफ़ समवन लाइक यू वुड बी विद मी इन माई लाइफ़, व्हाट ए ब्लैसिंग इट वुड बी!’
तो यह था इंदीवर!

काश, उसकी ज़िंदगी में कोई वैसा आता! ज़रूर ही कोई रही होगी जिसके लिए उस ने यह या ऐसे अनेक गीत लिखे:तेरा आंचल हो तो पतवार भी दरकार नहीं या तारा टूटे दुनिया देखे देखा ना किसी ने दिल टूट गया या वह गीत जो माधुरी में छपे उस पर लिखे लेख में उद्धृत किया गया था जिस दिल में बसा था प्यार तेरा/ उस दिल को कभी का तोड़ दिया/ बदनाम न होने देंगे तुझे/ तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया
पेश हैं मेरी पसंद के कुछ गीतों के बोल-
अनोखी रात-
ओह रे ताल मिले नदी के जल में
नदी मिले सागर में
सागर मिले कौन से जल में
कोई जाने ना
ओह रे ताल मिले..
सूरज को धरती तरसे, धरती को चंद्रमा
पानी में सीप जैसे प्यासी हर आत्मा
ओ मितवा रे...
पानी में सीप...
बूंद छुपी किस बादल में
कोई जाने ना
ओह रे ताल मिले...
अन्जाने होंठों पर ये पहचाने गीत हैं
कल तक जो बेगाने थे जनमों के मीत हैं
ओ मितवा रे...
कल तक जो...
क्या होगा कौन से पल में
कोई जाने ना
ओह रे ताल मिले..
अनोखी रात-
महलों का राजा मिला के रानी बेटी राज करेगी
खुशी-खुशी कर दो बिदा तुम्हारी बेटी राज करेगी
गलियों-गलियों धूम मचेगी -२
कांधे-कांधे डोली चलेगी
डोली में डोलेगा जिया -२
के रानी बेटी राज करेगी
खुशी-खुशी कर दो बिदा ...
जिस घर जाए स्वर्ग बना दे -२
दोनों कुल की लाज निभा दे
यही बाबुल जी देँगे दुआ -२
के रानी बेटी राज करेगी
खुशी-खुशी कर दो बिदा ...
बेटी तो है धन ही पराया -२
पास अपने कोई कब रख पाया
भारी करना ना अपना जिया -२
तुम्हारी बेटी राज करेगी
खुशी-खुशी कर दो विदा ...

उपकार-
कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
कोई किसी का नहीं ये झूठे, नाते हैं नातों का क्या
कसमें वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
होगा मसीहा
होगा मसीहा सामने तेरे
फिर भी न तू बच पायेगा
तेरा अपनाऽऽऽ आऽऽऽ
तेर अपना खून ही आखिर
तुझको आग लगायेगा
आसमान में
आसमान मे उड़ने वाले मिट्टी में मिल जायेगा
कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
सुख में तेरे
सुख में तेरे साथ चलेंगे
दुख में सब मुख मोड़ेंगे
दुनिया वाले
दुनिया वाले तेरे बनकर
तेरा ही दिल तोड़ेंगे
देते हैं
देते हैं भगवान को धोखा, इनसां को क्या छोड़ेंगे
कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या
सरस्वती चंद्र-
चन्दन सा बदन चंचल चितवन
धीरे से तेरा ये मुस्काना
मुझे दोष न देना जग वालों - (२)
हो जाऊँ अगर मैं दीवाना
चन्दन सा ...
ये काम कमान भँवे तेरी
पलकों के किनारे कजरारे
माथे पर सिंदूरी सूरज
होंठों पे दहकते अंगारे
साया भी जो तेरा पड़ जाए - (२)
आबाद हो दिल का वीराना
चन्दन सा ...
तन भी सुंदर मन भी सुंदर
तू सुंदरता की मूरत है
किसी और को शायद कम होगी
मुझे तेरी बहुत ज़रूरत है
पहले भी बहुत मैं तरसा हूँ - (२)
तू और न मुझको तरसाना
चन्दन सा ...

क़ुरबानी-
आप जैसा कोई मेरी ज़िंदगी में आये
तो बात बन जाये, हाँ हाँ बात बन जाये   ...
फूल को बहार, बहार को चमन
दिल को दिल, बदन को बदन
हर क्सी को चाहिये तन-मन का मिलन
काश मुझ पर असिआ दिल आपका भी आये
तो बात बन जाये   ...
मैं इनसान हूँ फ़रिश्ता नहीं
डर है बहक न जाऊं कहीं
तन्हा दिल न सम्भलेगा, प्यार बिना ये तड़पेगा
आप सा कहाँ है दिल आप को ही पाये
तो बात बन जाये ।

सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)       

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