कश्मीर पर 'नोटबुक' - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 30 मार्च 2019

कश्मीर पर 'नोटबुक'

फिल्म समीक्षा
नोटबुक
निर्देशक - नितिन कक्क़ड़
कलाकार - जहीर इकबाल, प्रनूतन बहल, मीर सरवर


*रवींद्र त्रिपाठी
सन् 2014 में आई थाईलैंड की फिल्म `द टीचर्ज डायरी पर आधारित हिदी फिल्म `नोटबुक दो स्तरों पर चलती है। एक तो बच्चों की शिक्षा पर और दूसरे दो अनजान लोगों के बीच पनपते प्रेम पर। पर यहां जो प्रेम होता है वो आम मुंबइया फिल्मों में दिखनेवाले प्रेम से अलग है। यहां दो शिक्षकों को बीच प्रेम पनपता है जो एक दूसरे से काफी देर के बाद मिलते हैं। मिलने के पहले उनमें अनजाना लगाव विकसित होता है।
`नोटबुक सलमान खान प्रोडक्शन की फिल्म है और कश्मीर पर केंद्रित है। हालांकि यहां कश्मीर नहीं दिखता जो आतंकवाद से ग्रसित है, हालांकि उसकी छाया का एहसास यहां है। पर कश्मीर की प्रकृति का सौदर्य जहां भरपूर है। एक स्कूल है जो  झील के बीच में है। वहां पैदल या गाड़ी से नही पहुंचा जा सकता। नाव चलाकार या उसपर बैठकर ही वहां जाया जाता है। एक कश्मीरी पंडित का लड़का कबीर (जहीर इकबाल) अपने पिता द्वारा खोले गए इस स्कूल में तब पढाने जाता है जब  वो बंद होने के कगार पर है क्योंकि कि वहां कोई शिक्षक नहीं है। जब वहा जाता है तो पाता है कि इस स्कूल में पांच बच्चे हैं जो पहली से लेकर पांचवीं जमात में पढ़ते हैं। यानी अलग अलग कक्षाओं के बच्चे और शिक्षक सिर्फ एक।। फिर उसके हाथों वहां पढाने वाली शिक्षिका फिरदौस (प्रनूतन बहल) की डायरी हाथ लगती है। कबीर उस डायरी को पढ़ता है और इसका उस शिक्षिका और स्कूल के बारे में जानना शुरू होता है। धीरे धीरे वो फिरदौस से लगाव महसूस करने लगता है। अब एक ही सवाल बाकी रह जाता है कि क्या फिरदौस उस स्कूल में फिर से आएगी और दोनों एक दूसरे को करीब से जान सकेंगे?
`नोटबुक प्रचंड आवेग की फिल्म नहीं है। ये आहिस्ता आहिस्ता होनेवाले इश्क की कहानी है। और साथ ही कश्मीरी जीवन के उस पहलू को सामने लाती है जिसमें कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद एक खास तरह का खालीपन आ गया है। `नोटबुक उस खालीपन को भरने की कोशिश करती है। कबीर और फिरदौस के प्रति पनपता प्रेम सिर्फ दो युवाओं का नहीं है बल्कि उस तहजीब का उभरना है जिसे मोटे तौर पर गंगा-जमनी कहते हैं। (हालांकि कश्मीर में न गंगा है और न यमुना।)`नोटबुकमें भरपूर हास्य है। लेकिन जमकर ठहाके लगवाने वाला नहीं बल्कि मुस्कुराहट पैदा करनेवाला। बतौर अभिनेता जफर इकबाल और प्रनूतन तो अच्छे लगे ही है बच्चे भी अपनी मासूमियत के साथ मौजूद हैं और उनके हाव भाव, उनकी चपलताएं और शरारतें भी इस  फिल्म को दिल के करीब ले जाती हैं। हिंदी के कवि शमशेर बहादुर सिंह से क्षमा याचना के साथ कहा जा सकता है  `नोटबुक कश्मीर में `अम्न का राग है। ये दीगर बात है कि ये राग लगातार क्षीण होता जा रहा है।
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क – 9873196343

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