कश्मीर में पिता की तलाश - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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शनिवार, 6 अप्रैल 2019

कश्मीर में पिता की तलाश


फिल्म समीक्षा
नो फादर इन कश्मीर (3 *)
निर्देशक - अश्विन कुमार
कलाकार - जारा वेब, शिवम रैना, कुलभूषण खरबंदा, सोनी राजदान, अश्विन कुमार, नताशा मागो


*रवींद्र त्रिपाठी
इस फिल्म में हिंदी, अंग्रेजी और कश्मीरी - तीनों ही भाषाओ का प्रयोग हुआ है। शायद इसलिए कि इसे एक अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आसानी से दिखाया जा सके।
बहरहाल मुख्य रूप से यह फिल्म कश्मीर की उन अर्ध-बेवाओं या अर्ध-विधवाओं की पीड़ा और समस्या को सामने लाती है जिनके पति सेना के द्वारा पकड़े गए लेकिन वापस नहीं लौटे। कहां गए वे लोग? उनकी गिरफ्तारी भी कहीं दर्ज नहीं हुई। क्या वे जिंदा हैं या मर गए?  ऐसे लोगों की बेवाएं क्या करें? अपने पति का इंतजार करें या दूसरी शादी करें? उनके बच्चे क्या करे? क्या वे अपने पिता को तलाशें? तलाशें तो कहां?  और क्या तलाशने में जोखिम नहीं है?
नूर (जारा वेब) एक पंद्रह - सोलह साल की लड़की है। वो अपनी मां (नताशा मागो) के साथ इंग्लैंड से वापस कश्मीर आती है। नूर मोबाईल पर फोटो खींचती रहती है। उसके पिता को कई साल पहले सेना पूछताछ के लिए ले गई थी और उसके बाद उनकी वापसी नहीं हुई। इसलिए नूर की मां अर्धबेवा है और फिर से शादी करना चाहती है। कश्मीर में नूर की मुलाकात माजिद (शिवम रैना) से होती है। माजिद के पिता को भी कभी सेना पूछताछ के लिए ले गई और वो भी वापस नहीं लौटे। इसलिए माजिद की मां भी अर्धबेवा है। नूर को अपने पिता के बारे में जिज्ञासा है कि उनके साथ क्या हुआ। वो माजिद के साथ मिलकर अपने और उसके पिता के साथ हुए हादसे का पता लगाना चाहती है। दोनों दूर पहाड़ों के ऊपर चले जाता है। वहां नूर को मिलती हैं कुछ हड्डियां और कुछ नरकंकालों के अवशेष। लेकिन उसके बाद दोनों - नूर और माजूद – सेना के हाथों पकड़े जाते हैं। उनके साथ क्या होता है? क्या वे छूट पाएंगे?
इसमें संदेह नहीं कि `नो फादर इन कश्मीर एक मानवीय त्रासदी को उभारनेवाली एक बेहतरीन फिल्म है। साथ ही ये कश्मीर की प्राकृतिक सुषमा को भी दिखाती है। इसे देखते हुए मन में एक सवाल उभरता है- एक तरफ इतना प्राकृतिक सौंदर्य़ और साथ ही वहीं पर इतनी मानवीय त्रासदी? फिल्म ये भी दिखाती है कि कैसे इस तरह की हालत मे कुछ लोग सेना के लिए मुखबिरी भी करते हैं और आतंकवादियों को पनाह भी देते हैं। यह उनकी मजबूरी है क्योंकि जीना तो है। निर्देशक अश्विन कुमार ने एक ऐसे ही एक शख्स अर्शद की भूमिका निभाई है। फिल्म में कुलभूषण खरबंदा की भूमिका बहुत अच्छी है। उन्होंने नूर के दादा की भूमिका निभाई है। एक ऐसे शख्स की, जिसका बेटा गायब हो गया और ठीक से रो भी नहीं सका।
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क – 9873196343

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