बुद्धिजीवी परिवेश से ताल्लुक रखती हैं राज बब्बर की पहली पत्नी नादिरा - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

रविवार, 21 अप्रैल 2019

बुद्धिजीवी परिवेश से ताल्लुक रखती हैं राज बब्बर की पहली पत्नी नादिरा

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–79

राज और नादिरा
वह हिंदुस्तान के सर्वोच्च बुद्धिजीवी माहौल में पली बढ़ी है। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया, प्रगतिशील लेखक संघ, इप्टा जैसी संस्थाओं के जन्मदाता सज्जाद ज़हीर की बेटी नादिरा का माहौल बड़े बड़े लेखकों, नाटककारों का, फ़िल्मी हस्तियों का माहौल था। बचपन से ही उसके लिए मुल्कराज आनंद, अली सरदार ज़ाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी, किशन चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, इस्मत चुग़ताई, अब्बास जैसे नाम अजनबी नहीं थे।
नादिरा के बाबा बैरिस्टर सर सैयद वज़ीर हसन अवध के चीफ़ जस्टिस थे। चाचा सैयद अली ज़हीर ईरान में भारत के राजदूत रहे थे। लखनऊ में परिवार रहता था सर सैयद की शाही हवेली वज़ीर मंज़िल के एक खंड में। वहीं वामपंथी मीटिंग होतीं, कैफ़ी आज़मी और इस्मत चुग़ताई जैसे लेखकों का आना जाना लगा रहता।
20 जनवरी 1948 को जन्मीं नादिरा चार बहनों में तीसरी हैं। उसे पढ़ाई में बहुत होशियार क़तअन नहीं कहा जा सकता। सन् 1967-68 में परिवार लखनऊ से दिल्ली आया तो उसका दाख़िला लाइब्रेरी साइंस में हो जाता तो पता नहीं क्या होता। होना कुछ और ही था। नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के निदेशक इब्राहिन अल्काज़ी से सज्जाद ज़हीर की मुलाक़ात क्या हुई, वह अभिनय सीखने लगी। शुरू में तो उसे सब कुछ अटपटा सा लगा, पर अंततः 1971 में उसे स्वर्ण पदक मिला। ब्रेख़्त के नाटक थ्री पैनी आपेरा का भारतीयकरण तीन पैसे का तमाशा मंचित किया तो नादिरा को वाहवाही मिलने लगी। स्कॉलरशिप पर जर्मनी गई जहां ग्रोटोविस्की और पीटर ब्रुक्स जैसे महारथियों से संपर्क हुआ।
1973 में पिता की मृत्यु पर वह बीच में ही दिल्ली लौट आई। दो साल बाद उसके जीवन में आया राज बब्बर – उम्र में नादिरा से चार साल छोटा। नादिरा का कहना है, हम जस्मा ओडन नाटक के दौरान मिले और रोमांस कर बैठे। हमारे अफ़ेअर में कोई ड्रामा श्रामा नहीं हुआ।मम्मी ने पूछा तो राज ने कहा, एनएसडी का डिप्लोमा ही मेरा सब कुछ है। आमदनी के नाम पर एक पैसा भी नहीँ। मम्मी परेशान तो हुईं पर मुझे राज़ी देख कर रज़ामंद हो गईं। और राज भी हमारे साथ रहने लगा। मकान का किराया था छह हज़ार, पर राज साहब और मेरे पास उनकी मदद के लिए एक पैसा भी नहीं था। राज के बंबई के चक्कर लगाने लिए हमने एक स्कूटर बेच दिया। दिल्ली में मैं अपनी बेटी और घर संभालती रही।
सन् 1988 में नादिरा स्थायी रूप से बंबई में जम गई। इंसाफ़ का तराज़ू’, ‘निकाह और आज की आवाज़ से राज स्टार क्या बना, अनुपम खेर, किरण खेर, अनिता कंवर, कविता चौधरी, सतीश कौशिक जैसे उसके अनेक साथी कलाकार बंबई आने लगे। नादिरा ने राज के पैसे से स्थापित किया नाट्य समूह - एकजुट।  सबके सब और कई बंबइया नाट्य कर्मी जुड़ते गए। पारसी थिएटर की शैली में मंचित यहूदी की लड़की अभी तक उसकी उत्तम प्रस्तुतियों में गिना जाता है। एकजुटमें नई जान आई। 30-32 सालों में मंचित कुछ नाटक हैं संध्या छाया, बल्लबपुर की रूप कथा, बात लात की हालात की, भरम के भूत, शाबाश अनारकली, दयाशंकर की डायरी, सक्कू बाई, जी जैसी आपकी मर्ज़ी। स्वयं राज बब्बर भी इन नाटकों में आता रहा। 1990 में शुरू हुआ एकजुट के नए अंग एकजुट यंग पीपल्स थिएटर ग्रुप ने मंचित किए आओ पिकनिक चलें और अज़दक का इंसाफ़
तीस साल पूरे होने पर एकजुट ने पृथ्वी थिएटर्स में एक सप्ताह का थिएटर फ़ैस्टिवल मनाया – थर्टी ईयर्स कैरेवान।
नादिरा ने कहा है, मैंने कभी छिछोरापन नहीं दिखाया नाटकों में। मनोरंजन की ख़ातिर पर संदेश पर आंच नहीं आने दी।
राज की लोकप्रियता से सबकी नज़र मुझ पर रहने लगी। मुझे इसकी आदत थी ही नहीं। मुझे मछली वाली से सौदेबाज़ी करना अच्छा लगता है। लोग कहते देखो राज की बीवी आलू ख़रीद रही है। राज ने स्मिता पाटिल से शादी कर ली। और तभी वह हम से दूर चला गया,” कहते उसकी आवाज़ कोमल हो जाती है। गृहस्थी को संभाला कैसे। सुना तो डरी थी, पड़ी तो सही थी। अच्छा हो बुरा हो वक़्त कट ही जाता है!”
दूसरी शादी करने की सलाह देते रहे दोस्त अहबाब पर नादिरा ने किसी की नहीँ सुनी। नाट्य जगत और बच्चे नादिरा का मजबूत सहारा बने रहे। नादिरा ने कहा है, मैं अपनी पर टिकी ही रही क्योंकि राज बेहद अच्छा भरोसेमंद इंसान है, भला है। कभी ज़िम्मेदारियों से भागा नहीँ। मुश्किल वक़्तों में भी साथ निभाना जानता है।
जीवन के कठिनतम समय की बात करो तो कहती है, मुश्किल वक़्त इंसान को बहुत कुछ सिखा देता है। धीरज बड़े काम की चीज़ है। मोहब्बत का, प्रेम का. सही मतलब तभी समझ में आता है।
राज ने स्मिता से शादी कर ली तो मैं उन दिनों की बात करना नहीं चाहती। परिवार ने कैसे वह वक़्त काटा...उन दिनों की बात करके हासिल क्या होगा, कुछ भी तो नहीँ! कुछ कहना, पुराने ज़ख्म खोलना – क्यों?”
उस काल में थिएटर के साथ-साध बेटी जूही और बेटे आर्य बब्बर उसका सहारा साबित हुई। कई बार वह हंस कर कहती है, “मैं ठहरी ताश में जोकर का पत्ता। जहां चाहो फ़िट कर लो! राज भी कहता है बात बेबात हर बात पर कमेंट क्यों मारना !”
“13 दिसंबर 1986 को इकतीस साल की स्मिता का अकाल चले जाना फ़िल्म संसार के लिए बड़ी ट्रैजेडी था। मैंने राज को स्वीकारा तो चाहने वाले मुझे डोरमैट कहते रहे। मुझे इसकी फ़िक्र नहीँ थी। उसका नवजात बेटा प्रतीक कुल ग्यारह दिन का था। मुझे बहुत अफ़सोस, बहुत तकलीफ़ हुई थी। उसके सपने, तमाम ख़्वाहिशें अधूरी रह गईं। उसके जाने का ग़म बाक़ी सब ग़मों से बढ़ कर था। हम सब टूट से गए थे – राज, नन्हा प्रतीक, स्मिता के मां बाप, और कहीं गहरे मैं – सब। बड़ा बुरा वक़्त था। मैं सब कुछ माफ़ कर चुकी हूं। किसी से मुझे कोई शिकायत नहीं। ज़िंदगी ने मुझे बहुत कुछ दिया है। किसी से कैसा गिला, कैसे शिकवे। क्या पता कब कौन हमारे साथ न रहे! प्रतीक बहुत अच्छा बच्चा है। जितना प्यार बाप से करता है, उतना ही मुझ से। प्रतीक और आर्य अपनी कोशिशों लगे रहते हैं।


नादिरा और राज का रिश्ता एक दूसरे पर भरोसे का है। दोनों एक दूसरे के कामों की आलोचना समालोचना करते रहते हैं। मैं जो भी लिखती हूं राज उस पर खुल कर राय देता है। यह ठीक नहीँ है। ऐसी धज्जियां उड़ाते हैं! मुझे ग़ुस्सा आता है, रोती हूं, लड़ती हूं, भिड़ती हूं। अकसर उस का कहा ही ठीक होता है। मैं भी उसके काम की बुराई करती हूं – लेकिन नरमाई से।
स्मिता वाले नाज़ुक वक़्त के अलावा मैंने कभी भी अपने को कभी कमज़ोर पाया। राज से मुझे रूहानी ताक़त मिलती रही है। हर वक़्त उसे मेरी इज़्ज़त का, डिग्निटी का ख़्याल रहता है। जिस मुक़ाम पर मैं हूं वह उसकी बदौलत है। दोनों की उम्र बढ़ रही है। मैं बार बार कहती हूं मुझसे पहले मत जाना... नहीं सह पाओगे मेरा जाना – कहते कहते नादिरा की आंखें भर आती हैं।
याद लखनऊ की
लोग कहते हैं कि लखनऊ बदल गया है। मैं खुद यहां बहुत कम आती हूं, फिर भी ये दावे से कह सकती हूं कि लखनवी मिज़ाज, अपनापन, सम्मान - आज भी यहां के लोगों में जिंदा है। एक छोटी सी घटना नहीं भूलती। एक बार जब लखनऊ आई तो वजीर हसन रोड से होकर गुज़री। अचानक से गुज़रे दिन याद कर आंखें भर आईं, मैं फफक पड़ी। अभी मैं वहां से रवाना होती कि वहां से गुज़रते कुछ लोगों ने मुझे पहचान लिया। एक शख्स थे, जिनका नाम तो मुझे नहीं याद। उन्होंने कहा, नादिरा जी, आपके दादाजी की हवेली की एक दीवार आज भी मेरे मकान में सुरक्षित है। हमने उसे तोड़ा नहीं, सहेज रखा है। उन्होंने आग्रह किया, घर चलने के लिए। मैं पहुंची, देखा कि सच में उन्होंने उस दीवार को नहीं तोड़ा। मैं उनकी शुक्रगुज़ार और कर्ज़दार हूं।
जैसे रायबरेली की तुलना न्यूयॉर्क से करना बेमानी है, उसी तरह मुंबई और लखनऊ की संस्कृति, दोनों शहरों के मिज़ाज में फ़र्क़ की बात बेमानी है। दोनों ही शहरों की अपनी अलग अहमियत है। हां, इतना ज़रूर है कि सुकून, जो यहां है, वह कहीं नहीं। इसी तरह अपने काम को लेकर एक ईमानदारी, निरंतरता यहां के लोगों में है...

स्मिता के निधन के पश्चात् गम में परिवार
एकजुट से राज बब्बर की गहरी एकजुटता का ब्योरा मैं देना चाहता हूं वी. कुमारस्वामी के शब्दों में:-
दरवाज़े पर खड़ा आदमी जाना पहचाना सा है। मैं पास जाता हूं – अरे, यह तो एक्टर राज बब्बर है!”
मैं नई दिल्ली में नादिरा के एकजुट द्वारा प्रस्तुत नाटक देखने आया हूं। मैं सीट पर बैठ गया हूं। राज बब्बर हर दर्शक का स्वागत कर रहा है। रोशनी मद्धम हुई, वह दूसरी पंक्ति में बैठ गया।
नादिरा निर्देशित नाटक पूरा होने को है। फ़ुटलाइटें अब दास्तानगोई का पात्र निभाने वाली नादिरा पर हैं। उसका एकल संवाद भावुक है। वह कह रही है सच्चा कलाकार कला प्रदर्शन के लिए काम करता है, नाम और दाम के लिए नहीं। बोलते-बोलते उस के गालों पर आंसू बहने लगे हैं।
मैं राज बब्बर को देखता हूं। मुस्कराते चेहरे पर बह आए आंसू पोंछ रहा है।
अगले दिन मैं नादिरा से पूछता हूं आंसुओं का बहना क्या हम कहें आप सुने नाटक की स्क्रिप्ट का अंश था। वह बोली, नहीं, मुझे याद आ गए थे नाट्य क्षेत्र में चालीस सालों झेली चुनौतियां और मुसीबतें। मैं कुछ ज़्यादा ही इमोशनल हो आई और आंसू...
हम उसी ऑडिटोरियम में बैठे हैं। स्टेज पर फ़ौजी वर्दियां पहने किसी जंगल में हैं। नाटक का नाम है क्लाउड बर्स्ट। इसका भी निर्देशन नादिरा कर रही है। कल के नाटक में उसने पहने थे शीशे जड़े चोली और लहंगा। तब वह चौंसठ साल की उम्र भी कम उम्र लग रही थी। आज उसने पहन रखा है धुंधियाला हरा सलवार सूट, वह अपनी सही उम्र की दिख रही है। चेहरे पर थकन और शिकन दिख रही है। मैं पूछता हूं क्या सचमुच वक़्त ने आप का यह हाल कर दिया है। वह कहती है, अरे नहीं, मेकअप करते ही यह सब बदल जाएगा।
नाट्य उत्सव का शीर्षक है एकजुट कारवां। उत्सव शुरू हुआ था एम एफ़ हुसैन के पैंसिल से ब्रश तक। इस के मुख्य कलाकार थे बेटी जूही और दामाद अनूप सोनी। नादिरा कहती है, हुसैन साहब हमारे परिवार गहरे दोस्त थे। यह उन के हमारी ट्रिब्यूट है। मैंने उनकी 2004 की फिल्म मीनाक्षी ए टेल ऑफ़ थ्री सिटीज में एक रोल भी किया था।
वह सुनाती है एक दिलचस्प क़िस्सा। एक दफ़ा हुसैन साहब मिलने आए। हम लोग घर पर नहीँ थे। इंतज़ार की घड़ियां काटने के लिए उन्होंने दरवाज़े पर पेंटिंग कर दी। मकान मालिक को शांत करने के लिए हमें नया
दरवाज़ा बनवाना पड़ा। वह पेंटिड दरवाज़ा हमारे बंबई घर में रखा है।
-नादिरा के दो नाटक:
-
सन् 1956 की फ़िल्म सी.आई.डी. का गीत ये है बंबई मेरी जान आप ने कभी न कभी ज़रूर सुना होगा। बाद में इसी नाम की एक फ़िल्म भी बनाई थी महेश भट ने, और इसी से प्रेरित हो कर नादिरा ने बनाया नाटक। यह उसके लोकप्रिय नाटकों में गिना जाता है। अनगिनत बार मंचित हो चुका है मुंबई के बाबर दिल्ली आदि शहरों में। विषय है फ़िल्मों में नाम और दाम कमाने के वास्ते आए लोगों की ज़िंदगी। छोटे से कमरे में पात्र बात बात पर लड़ते झगड़ते हैं, धोखा देते हैं, चोरी करते हैं। ज़िंदगी बसर करना उनके मुहाल है। घरवालों से कटे ये लोग हारते हैं पर भलमनाहत से भरे हैं। इनके अलावा नाटक में डब्बेवाला भी है, डाक्टर भी है। सब की अलग कहानी है।
-
मां रज़िया सज्जाद ज़हीर के जीवन पर नादिरा लिखित मेरी मां का हाथ का निर्देशन किया था मशहूर मराठी रंगमंच निर्देशक मकरंद देशपांडे ने। रिहर्सल के दौरान नादिरा ने कहा,मेरी मां बेहतरीन लेखक थीं, अच्छी पत्नी थीं, टीचर थीं, बढ़िया खाना बनाती थीं। मैं जो भी हूं उसमें मेरी मां का हाथ है। मां पर नाटक करना मेरे लिए बड़ी चुनौती है।

अरविंद कुमार
राज बब्बर उसकी जिंदगी में दोबारा आया तो नादिरा ने उसका स्वागत खुले हाथों किया। तोड़ना और छोड़ना आसान है, जोड़ना मुश्किल। आख़िरकार मेरा धीरज काम आया। वह जो चीज़ है ईगो वह मुझ में है ही नहीं। कोई ताअज्जुब नहीं नादिरा अपनी जगह मज़बूती से खड़ी है।
राज राजनीति में आया। नादिरा को यह भी मंज़ूर है। दोनों अपनी राह चलने को आज़ाद हैँ।
सिनेवार्ता जारी है...
अगली कड़ी, अगले रविवार
संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)  

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Bottom Ad