आखिरी दिन स्मिता पाटिल ने कहा-मैं अपने सारे गीत गा लेना चाहती हूं... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 28 अप्रैल 2019

आखिरी दिन स्मिता पाटिल ने कहा-मैं अपने सारे गीत गा लेना चाहती हूं...

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–80


सन् 1967-68; एक शाम। मंत्री शिवाजीराव गिरधर पाटिल के घर एक मीटिंग। किसी काम से वह आई, हम सब पर नज़र घुमा कर चली गई। यह थी पूरे आत्मविश्वास से क़दम रखने वाली शिवाजीराव जी की बेटी स्मिता पाटिल – भविष्य की सुपर स्टार जो बॉलीवुड के आकाश पर दमदमाती आई और अचानक विलीन हो गई। बंबई का समांतर सिनेमा और स्वयं बॉलीवुड धक् से रह गया।
17 अक्तूबर 1955 को जन्मीं स्मिता ने अभिनय की शिक्षा पाई पुणें के फ़िल्म इंस्टीट्यूट से। ठीक वैसे ही जैसे राज बब्बर की पहली पत्नी नादिरा ज़हीर ने दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में। नादिरा दिल्ली में और बंबई में स्मिता नाटकों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थीं। स्मिता बंबई दूरदर्शन पर समाचार बोलती तो उसके हलके से सांवले मुखमंडल पर बोलती सी आंखों से समाचार रोचक हो जाते थे। ऐसी स्मिता पर नज़र पड़ी श्याम बेनेगल की। इसके बाद कुल बारह साल के सक्रिय जीवन में उसने अस्सी से ज़्यादा हिंदी और मराठी फ़िल्मों में काम किया। मतलब हर साल लगभग साढ़े छह फ़िल्म। इतने से सालों में उसे दो राष्ट्रीय अवॉर्ड मिले और एक फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड। भारत सरकार ने उसे पद्मश्री से अलंकृत किया और पांच रुपए वाला डाक टिकट जारी किया।
श्याम बेनेगल के साथ उसकी पहली फ़िल्म थी बच्चों के लिएचरणदास चोर (1975। इसके बाद आईं गुजरात में अमूल दूध संकलन का विकास दिखाने वाली 1977 की मंथन जिसकी बिंदु अछूत आंदोलन का नेतृत्व करती है। 1980 की आक्रोश से पहले 1977 की भूमिका ने स्मिता को चोटी पर पहुंचा दिया था।
भूमिका
भूमिका का आधार थी मराठी-हिंदी फ़िल्मों की अभिनेत्री हंसा वाडकर की 1971 में प्रकाशित आत्मकथा साङ्त्ये ऐका (पूछो सुनो)। हंसा ने तेरह साल की उम्र से ही काम शुरू कर दिया था। पहली फ़िल्म थी 1936 की द्विभाषी विजयची लग्न (शादी का मामला)। 1941 की संत सखु से लोकप्रिय हुईं। तमाशा शैली में बनी 1947 की लोकशायर रामजोशी और उसी साल की साङ्त्ये ऐका में वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचीं। बोल्ड हंसाकई कुटिल षड्यंत्रों, वैवाहिक समस्याओं, मद्यपता, थुक्का फ़जीहत, मैजिस्ट्रेट द्वारा दुष्कर्म आदि से चर्चा का विषय बनी रहीं। अंततः शादी का टूटना और बेटी से दूर रखा जाना।
भूमिका में पहली बार स्मिता को मौक़ा मिला एक ही फ़िल्म में कई भाव और रूप दिखाने का। इसके लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों में उसे श्रेष्ठ अभिनेत्री अवॉर्ड मिला। पच्चीसवें फ़िल्मफ़ेअर अवॉर्ड में भूमिका बैस्ट फ़िल्म घोषित हुई।
फ़िल्म शुरू होती है फ़िल्म शूटिंग से। उषा (स्मिता) अन्य नर्तकियों के साथ तमाशा शैली में उन्मुक्त नृत्य कर रही है। काफ़ी देर हो चुकी थी। परेशान और नाराज़ उषा गाड़ी का इंतज़ार कर रही है। नायक राजन (अनंत नाग) अपनी गाड़ी में उसे छोड़ने का प्रस्ताव करता है, हिचकिचाती है,कार में बैठ जाती है। रास्ते में हम देखते हैं कुछ मज़दूर अग्निपरीक्षा फ़िल्म का बड़ा होर्डिंग ले जा रहे हैं। हर स्त्री की तरह उषा को भी शक़ और संदेह से देखा जाएगा।
उषा के बंगले पर कार रुकती है। उषा उतरती है। राजन उतरता है। मिनट भर रस्मी बातें करते दिखाई देते हैं। छत से पति केशव डाल्वे (अमोल पालेकर) देख रहा है, देखता रहता है। उषा ऊपर पहुंचती है। देरी का हिसाब मांगा जाता है। उषा जवाब नहीं देती। बात बढ़ जाती है, घर छोड़ कर जा रही है। बेटी मेरे साथ जाएगी। नहीं, वह मेरी बेटी है। जाएगी। ले जाओ, अपने जैसा बना लेना इसे। उषा अकेली चली गई टैक्सी में।

पुरानी यादें ब्लैक एंड व्हाइट में दिखती हैं - उषा का बचपन, सूटबूटधारी केशव डाल्वे, महंगे रेस्तरां में राजन और फ़िल्म फ़ाइनेंशर के बीच उषा। केशव लाया है उषा को किसी बड़े फ़िल्म हीरो और निर्माता की फ़िल्म में रोल के लिए।
एक और शूटिंग। उषा लौटी तो खाते खाते केशव बोला, सुना है तुम्हारी तबीयत ख़राब हो गई थी। बोली, कुछ ख़ास नहीं, ख़ुशी से चहकती केशव के कान में कुछ कहती है। मतलब वह मां बनने वाली है। केशव ने फ़ैसला सुना दिया, “यह बच्चा इस घर में नहीं पलेगा!” क्रुद्ध उषा ने उसका गरेबान पकड़ लिया, यह बच्चा तुम्हारा है, मुझे हर हालत में बच्चा चाहिए!” पर सोने की चिड़िया उषा की सुनने वाला कहां था बिज़नेस मैनेजर केशव।
हम देखते हैं गर्भपात के बाद उषा को सहारा देता केशव मानों उसे पाताल ले जा रहा है चक्करदार ज़ीने से नीचे।
-उषा को दरवाज़े पर देख राजन हिचकिचाता है। उषा की ज़िद पर भीतर ले जाता है। धनी विनायक काले (अमरीश पुरी) उषा को अच्छा नहीं लगता था। पीछे कमरे में जा कर वह ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड सुनने लगती है। वह रिकॉर्ड बदलने लगती है। विनायक काले उषा का अपमान से करने पर तुला है, महमान को कोई हक़ नहीं हमें पसंदीदा रिकार्ड न सुनने देने का!”
(मैंने इस दृश्य का विवरण विशेषकर इसलिए दिया है कि इसका भविष्य के एक बेहह महत्वपूर्ण और लंबे प्रकरण से संबंध है।)
-किसी और फ़िल्म की शूटिंग। निर्देशक है बौद्धिक सा रवि (नसीरुद्दीन)। होली के दिन हैं। सब गुलाल लगा रहे हैं। उषा किसी से पीछे नहीं है। कुछ को गुलाल लगा कर बढ़ती है निर्देशक रवि की तरफ़। लोग रोकते हैं। वह होली नहीं खेलता, होली के दिन बेटी मर गई थी। उषा रुकने वाली नहीं है। रवि को गुलाल लगा कर ही रहती है। वह कहता है,“होली खेलना मैं भी जानता हूं!” उषा को गोदी में उठा कर पानी के हौज में डाल देता है।
-रवि की खुली छत वाली लाल कार शानदार है। यह सच है मेरी बेटी पांच साल पहले मरी थी, लेकिन... अब वे रवि के घर पर हैं, अपने देश में दिमाग़ से तो कोई सोचता नहीं है...हम लोगों की ख़ासियत है – जो गुज़र गया उसी की दुहाई देते रहते हैं। उससे भी मन नहीं भरा तो पुनर्जन्म आत्मा जैसी बड़ी बड़ी बातें करते हैं। सच यह है कि हम पैदा होते हैं और बिला वज़ह मर जाते हैं! पेड़ों में और हम कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है...उषा कहती है, तब तो जिंदगी में कोई अर्थ ही नहीं रहा...
जो भी हो उषा पूरी तरह उस की हो चुकी है। शयन कक्ष में पलंग पर दोनों साथ लेटे हैं। रवि वही फ़लसफ़ाना निहिलिस्टिक (शून्यवादी) बातें कर रहा है। उषा को विष पीने के लिए उकसा रहा है। उषा साथ साथ मरने की बात करती है, वह इनकार कर देता है। हम कोई लैला मजनूं नहीं हैं। बाथरूम में उषा विष पीना चाहती है, पी नहीं पाती। सुबह नींद खुलती है तो पास के पलंग पर रवि नहीं है। तकिए पर नैकलेस रखा है।
-उषा जाती है विनायक काले (अमरीश पुरी) के कमरे पर। वह कहता है,“इस बार मैं कमरे में अकेला हूं!” उषा फ़ैसला कर के आई है। विनायक की कार में दोनों जा रहे हैं शहर से दूर।
गाड़ी एक बड़ी जायदाद में प्रवेश कर रही है। विनायक कहता है, वो देखो मेरा बेटा!” उषा ने कहा, पहले बताया नहीं!” विनायक गाड़ी रुकवाता है, गाड़ी चलती है, “चाहो तो उतर सकती हो। मैंने बताया नहीं या तुमने पूछा नहीं - इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?”
महल में मां से कहता है, कोई मेरे साथ आई है। मां स्वीकार कर लेती है। उषा से कहती है, जवान मर्दे को औरत तो चहिए ही। तुम्हारा कोई बच्चा होता तो और बात होती। अब विनायक उषा को सेज पर लेटी अपाहिज पत्नी से मिलवाता है।
-उषा सब का ध्यान रखती है। अब यही उसकी ज़िंदगी है। बेटा तो उषा का खिलौना हो गया है! दोनों महल में बाहर बाग़ में साथ साथ खेलते हैं। विनायक घर की चाभियां उषा को देता है, वह कहती है,“क्या करूंगी इनका!”
-काफ़ी समय बीत गया है। बेटा मेले में जाना चाहता है। उषा ड्राइवर से गाड़ी निकालने को कहती है। बड़े साहब की आज्ञा के बिना वह बाहर नहीं जा सकती। विनायक से शिकायत करती है। वह साफ़-साफ़ कह देता है, इस घर की औरतें बाहर नहीं निकल सकतीं। उषा चोरी छिपे केशव को चिट्ठी भेजती है। पुलिस उषा को विनायक से आज़ाद करा के ले जाती है।
-केशव और वह कभी नाव में कभी कार में जा रहे हैं। वह बताता है, मां अब नहीं रहीं।" बंबई की सड़कों पर खंभे पर अग्निपरीक्षा फ़िल्म का पोस्टर दिखाई देता है। केशव कह रहा है, अब मेरा कारोबार अच्छा चल रहा है। तुम शायद घर जाना न चाहो। होटल में कमरा बुक करा दिया है।
-होटल का कमरा। बेटी बड़ी हो गई है। मिलने आई है। बताती है,“उसे दो महीने चढ़ चुके हैँ। उषा चौंकती है, यह तू ने क्या कर दिया?” बेटी कहती है, आई, तुम अब भी फ़िल्मी बातें करती हो। मेरी शादी हो चुकी है। हम दोनों चाहते हैं तुम हमारे साथ रहो। टेलिफ़ोन बजता है। हीरो राजन बोल रहा है, कहता है अब भी फ़िल्मों में तुम्हारी मांग है!”
-भूमिका समाप्त होती है।
चक्र में स्मिता
स्मिता को अभिनय का राष्ट्रीय अवॉर्ड दिलाने वाली 1981 की चक्र का निर्देशन किया था रवींद्र धर्मराज ने, सहकलाकार थे नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा। कहानी थी बीजापुर में रहने वाली अम्मा (स्मिता पाटिल) और उसके बेटे बेन्वा (रणजीत चौधरी) की। सूदख़ोर ने बलात्कार की कोशिश की तो पति ने उसे मार दिया। बचते भागते पति मारा गया। बेन्वा को लेकर वह बंबई की गंदी बस्ती में ट्रक ड्राइवर के साथ रहती है। वह अकसर बाहर रहता है। वह एक और चाहने वाला पकड़ लेती है – औरतों का दलाल और छोटामोटा चोर चकार घमंडी लुक्का (नसीरुद्दीन शाह) जो जूते पॉलिश करने वाले बेन्वा का हीरो बन गया है। लुक्का को हर दिन थाने में हाज़री देनी होती है। बेन्वा ने अमली से शादी कर ली, इधर अम्मा गर्भवती हो गई है। बच्चा किस का है यह साफ़ नहीं है, लेकिन भरोसेमंद मर्द अण्णा (कुलभूषण खरबंदा) को बताती है कि बच्चा उसी का है और अब उसी के साथ रह रही है। बदकार लुक्का लौटता है। आतशक का मरीज़ और पूरी तरह ड्रग ऐडिक्ट वह अब ईमानदारी की ज़िंदगी जीने की कोशिश कर रहा है। क्लाईमेक्स में बिना नक़द लिए कैमिस्ट दवा नहीं देता तो लुक्का मारपीट कर दवा चुरा कर पुलिस से बचता भागता अम्मा की झोंपड़ी में छिप जाता है। पुलिस उसे और बेन्वा को पीट रही है, अम्मा को गर्भपात हो जाता है। अंत में बुलडोज़र गंदी बस्ती तोड़ रहे हैं बेन्वा और अमली किसी नई बस्ती चले जाते हैं। कुछ भी हो जीवन का (कु) चक्र यूं ही चलता रहता है।


मलयालम फ़िल्म चिदंबरम
1985 की समांतर सिनेमा शैली की जी. अरविंदम द्वारा निर्मित-निर्देशित चिदंबरम इंग्लिश मुहावरे में कहें तो वाज़ ऐनदर फ़ैदर इन स्मिताज़ कैप।
तमिलनाडु के एक डेरी फॉर्म में रहने वाले तीन जनों के पारस्परिक संबंधों के द्वारा पाप, पश्चात्ताप और मानसिक मुक्ति जैसे पेचीदा सवालों से जूझने वाली सी. वी. श्रीरामन की कहानी। मुख्य पात्र निभाए थे भारत गोपी, स्मिता पाटिल, श्रीनिवासन और मोहनदास ने। फ़िल्म को व्यावसायिक और कलात्मक सफलता मिली। श्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय अवॉर्ड तो मिला ही, केरल राज्य के श्रेष्ठ फ़िल्म और श्रेष्ठ निर्देशन सहित पांच अवॉर्ड मिले।
[मेरा निम्न वर्णन कई स्रोतों पर आधारित है। हिंदी पाठकों ने स्मिता की कई हिंदी फ़िल्म तो देखी होंगी, पर मलयालम चिदंबरम शायद ही किसी ने देखी हो। इस विलक्षण कलाकृति का परिचय आप तक पहुंचाना सार्थक सिद्ध होगा। तो पेश है...]
तमिलनाडु-केरल की सीमा। पहाड़ी इलाक़े में बहुत बड़ा सरकारी फ़ार्म। मैनेजर है शंकरन (भारत गोप)। सुपरवाइज़र है जैकब (मोहन दास)। एकाकी शंकरन स्वभाव से मधुर और मुलायम है। मज़दूरों से हिलमिल जाता है। मवेशियों की देखभाल करने वाले सीधा सादे दब्बू मुनियांडी (श्रीनिवासन) ने उसे अपनी होने वाली शादी की बात बताई। ख़ुश होकर शंकरन ने उसे बार रम पिला दी। फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ीन शंकरन शादी के और तमिलनाडु के फ़ोटो खीँचने के लालच में साथ गया।
तमिलनाडु के अपने बंजर इलाक़े से पहली बार बाहर निकली विस्मित शिवकामी (स्मिता) के लिए केरल काउतरता चढ़ता हरियाला धरातल मानों नंदन कानन है। खिड़की से देख रहा है शंकरन। रुक रुक कर शिवकामी का सुंदर दृश्य निहारना। ज़रा सी आहट से हिरनी सा चौंकना। बड़ी बड़ी हृष्टपुष्ट गाएं, मोटरबाइक की आवाज़, नए नए चेहरे। उसका सिमटना, सहमना। धीरे धीरे नई भूमि में आश्वस्त होना। चाल में आत्मविश्वास जागना। यह सब शंकरन देख रहा है, देखता रहता है।
पति मुनियांडी काम पर जाता है तो पत्नी शिवकामी लक्ष्यहीन सी इधर उधर विचरती है। शंकरन उसकी ओर बढ़ता है कोमल सहज भाव से। अब वह शंकरन से डरती नहीं। घर चिट्ठी भेजनी है तो उस के पास जाती है पता लिखवाने। उसके कैमरे से अब वह लजाती नहीँ। शंकर के लिए वह कोमल सुमधुर सौंदर्य की प्रतिमा है, केरल की सुरम्य शस्यश्यामल धरा सी।
और एक दिन दूर तक फैले मैदान में शंकरन महमानों के स्वागत में मदिरापान गोष्ठी कर रहा है। नीचे सड़क पर जाते सहयोगी जैकब को बुला लेता है। बात चल पड़ती है फ़ार्म पर नई आई सुंदरी शिवकामी की। जैकब ने शिवकामी में उसकी दिलचस्पी पर फ़िकरा क्या कसा, शंकरन लड़ने पर उतारू हो गया! मेहमान एक एक कर के चले गए। अंधेरा घिर आया। घास पर लेटा शंकरन समझ नहीं पा रहा कि वह शिवकामी से क्या चाहता है, जो ज़रा सी चुटकी पर आपा खो बैठा!
मुनियांडी नहीं चाहता कि घरवाली कोई काम करे। जैकब शिवकामी को काम दिलाने की बात करता रहता है। मुनियांडी को शक़ हो जाता है। जैकब हुक्म देता है, मुनियांडी अब से रात की ड्यूटी भी करेगा!”
रात। मुनियांडी के कान हर आवाज़ पर लगे हैं। मोटर बाइक के तेज़ी से गुज़रने की आवाज़। वह सतर्क होता है। क्या जैकब जा रहा है उसकी शिवकामी के पास? दौड़ा दौड़ा घर जाता है। घर बेआवाज़ है। घोर अंधकार। वह ज़ोर से दरवाज़ा पीटता है। एक छाया बाहर निकली और अंधेरे में विलीन हो गई। यह जैकब नहीं था, शंकरन था! वह शंकरन जिस पर उसे पूरा भरोसा था!!
गायों का बाड़ा। दीवार में बहुत ऊपर शटर से मज़दूर भीतर अंधेरे में झांकते हैं। कहीं से आती क्षीण सी किरण में दिखता है शहतीर से लटका थुलथुल मुनियांडी का हवा में झूलता निर्जीव शरीर। चरमराती शहतीर की आवाज़। बाहर से शंकरन शटर उठाता है। शंकरन के चेहरे पर जो लज्जा शर्म उभर आई है उसे घूरे जा रहा है मुनियांडी का आरोप लगाता बेजान चेहरा।
शंकरन जंगल में भाग रहा है। भाग रहा है, भागे जा रहा है। मन में छिपा शैतानउस का पीछा कर रहा है। थक कर चूर हो गया है। जंगल की धरती पर पड़ा है।
रात हो आई है। शंकरन के सहयोगी सोने की तैयारी कर रहे हैं। दरवाज़े पर ज़ोर की धड़धड़ाहट। दरवाज़ा खोलते हैं। शंकरन खड़ा है। दिन भर पश्चात्ताप से जूझते शंकरन की मानसिक और दैहिक थकान उऩकी समझ से परे है। वे उसे एक और कमरे में सुला देते हैं। वह मुरदों सा सोता रहा कई घंटे।
अपराध बोध ने शंकरन को बदल दिया। नौकरी छोड़ दी। शहर में भटकता रहा। उद्देश्यहीन, दिशाहीन, एकाकी। पियक्कड़, इस शराबघर से उस तक... जीवनहीन, सुधबुधहीन, खोया खोया. भटकता। मित्रों ने छापेख़ाने में प्रूफ़रीडरी दिलवा दी। बैठा बैठा प्रूफ़शीट ताकता रहता है। मुनियांडी का झूलता शव पीछा नहीं छोड़ता। डाक्टर कहता है,गीता पढ़ो। तीर्थस्थान जाओ। शांति मिलेगी!”
वह फिर भटक रहा है - दर दर गली गली। शिव के धाम चिदंबरम मंदिर पहुँचता है। यह वही स्थान है जिसके बारे में कहा जाता कि लिंग रूप त्याग कर शिव यहाँ नटराज हो गए थे। मानव की आत्मा को भौतिक देह से मुक्त करने वाला वैश्विक नर्तक! बाहरी आंगनों को पार करता शंकरन गर्भगृह तक जाता है। द्वार पर बैठी स्त्री को जूते सौंपता है। दर्शन कर के बाहर आता है। जूतों की रखवाली करने वाली स्त्री बैठी है अंधेरे कोने में सिमटी सी। चेहरा उठाती है। यह शिवकामी है! आत्महत्या करने से पहले मुनियांडी ने उसके चेहरे पर जो भयानक घाव कर दिया था वह दिख रहा है।
शंकरन का सफ़र पूरा हो गया है। जीवन चक्र संपूर्ण हो गया है।

नमक हलाल
एक बार स्मिता को आभास हुआ कि समांतर सिनेमा क्षेत्र में कुछ लोग फ़िल्मों मॆं से उसका नाम कटवा रहे हैं। उसने फ़ैसला कर लिया अब वह कमर्शल बॉलीवुड में भी सफल होकर दिखाएगी। बहुत सारी फ़िल्म कीं, वे फ़िल्में जिन्हें आउट ऐंड आउट यानी पूरी तरह कमर्शल कहते हैं। जो सफल हैं पूरी तरह कमाऊ हैं। उनमें है प्रकाश मेहरा की नमक हलाल थी ऐक्शन, रोमांस और कॉमेडी की त्रिवेणी। स्मिता की बहुमुखी प्रतिभा का चिरस्मरणीय नमूना। कहानी थी कादर ख़ान की, अनजान के गीतों को संगीत दिया था भप्पी लाहिड़ी ने। अमिताभ और स्मिता के साथ कलाकार थे शशि कपूर, परवीन बॉबी, ओम प्रकाश, वहीदा रहमान, रंजीत, सत्येन कप्पू, सुरेश ओबेराय और राम सेठी।
नमक हलाल ने पहुंचाया स्मिता को घर घर। अब तक टीवी पर लोग देखते नमक हलाल में स्मिता और अमिताभ को बारिश में मस्ती में भीगते गाते रपटते उठते बहकते फिर रपटते खिलवाड़ करते। फ़िल्म की सफलता का आधा सेहरा तो इस गीत पर और उसके फ़िल्मांकन में स्मिता के खुलेपन के सिर पर बँधता है।
सादी सफ़ेद साड़ी में अपना तमाम ग्लैमर उंडेल कर विशाल दर्शक समुदाय का दिल जीत लिया था। कहीं अश्लीलता की झलक नहीं, बस इंग्लिश के शब्द ग्रेस की मूरत थी स्मिता के तन बदन में।
स्मिता का अंतिम दिन
मिर्च मसाला स्मिता की अंतिम फ़िल्म मानी जाती है। पता नहीं यह कितना सही है। पक्की बात यह है कि यह स्मिता की मृत्यु के बाद रिलीज़ हुई यह पहली फ़िल्म थी। अप्रैल 2013 में फ़ोर्ब्स (Forbes) पत्रिका ने भारतीय सिनेमा के 25 (पच्चीस) महानतम अभिनय की सूची में मिर्च मसाला में स्मिता के अभिनय को शामिल किया था। कोई कल्पना नहीं कर सकता था, किसी को राई रत्ती अंदेशा नहीं था कि इकतीस साल की स्मिता की मृत्यु हो जाएगी। पूरा फ़िल्म उद्योग और लाखों दर्शक उत्सुक थे बरसों तक उस की एक से बढ़ कर एक बेहतरीन फ़िल्म देखने को।
लेकिन 13 दिसंबर 1986 के मनहूस दिन वह जाती रही। दैनिक भास्कर के 13 दिसंबर 2017 अंक में उस दिन का जो विवरण दिया था, उससे कुछ अंश इस प्रकार हैं:
- 12 दिसंबर 1986 सुबह 6 बजे नवजात प्रतीक के रोने की आवाज आई, स्मिता बेड से उठीं और बेटे को चुप कराने की कोशिश करने लगीं। वे नहीं चाहती थीं रात देर से लौटे राज की नींद खुल जाए। दो दिन से स्मिता ने बेटे को छुआ तक नहीं था, ताकि वह वायरस से दूर रहे। लेकिन उस दिन वे बेटे को प्यार किए बगैर नहीं रह सकीं। उन दिनों राज को महीने-महीनेभर काम करना होता था। स्मिता सुनिश्चित करती थीं कि राज का सारा काम ठीक से चलता रहे। इस बार भी राज अपने इवेंट के लिए पूरी तरह एक्टिव थे और स्मिता चाहती थीं कि वे सक्सेसफुल हों।
-13 दिसंबर सुबह। राज बब्बर घर से निकल गए और स्मिता अपने डेली रूटीन में लग गईं। बाल धोए। बाल धोतेधोते स्मिता ने डिसाइड किया कि वे अपने सभी गाने नोटबुक में लिख लेंगी। मां ने हैरानी से पूछा, "उनकी अब तुम्हें क्या ज़रूरत है?" स्मिता ने कहा, "बस ऐसे ही, मैं उन सब गानों को एक बार फिर गाना चाहती हूं।"
अचानक स्मिता उदास हो गई। कहीं मामूली दर्द हो रहा था। करीब 10.30 बजे डॉक्टर रेगुलर चैकअप के लिए आया, "मामूली सा बुखार है, चिंता की कोई बात नहीं।" स्मिता आराम करने लगीं।
स्मिता की हेयर ड्रेसर माया ने उन्हें गोदभराई की वीडियो कैसेट दी और कहा कि यह सिर्फ 30 मिनट की है। - कुछ देर बाद स्मिता ने माया से कहा, "मुझे अच्छी वाली फीलिंग नहीं आ रही है। प्लीज़ मेरे लिए दुआ करना कि मैं जल्दी ठीक हो जाऊं।" फिर कहा, मैं जाऊं तो मेकअप दुल्हन की तरह करना!”
क़रीब दो घंटे बाद मां से कहा, "इन दो सालों में मैं आपके लिए अच्छी नहीं रही। हर वक्त आपसे झगड़ा किया, अब मैंने अपनी सारी प्रॉब्लम सॉर्ट कर ली हैं।" दोपहर करीब 3 बजे पूनम ढिल्लन को फोन किया और कहा कि वे ठीक महसूस नहीं कर रही हैं। पूनम ने मज़ाकिया अंदाज़ में जवाब दिया कि प्रेग्नेंसी के बाद हर महिला के साथ ऐसा होता है। स्मिता ने पूनम से कहा, "मुझे बहुत बेचैनी हो रही है। क्यों नहीं तुम घर आ जाओ, हम बैठकर बात करेंगे।"

शाम को राज बब्बर मीटिंग से वापस लौटे, स्मिता की ट्यूब निकाल दी गई थीं और वे अच्छा महसूस कर रही थीं। राज बब्बर के कपड़े निकाल दिए, जो वे किसी फंक्शन में पहनकर जाने वाले थे। स्मिता ने राज के साथ फंक्शन में जाने की इच्छा जताई। राज बब्बर तैयार नहीं हुए। उन्होंने स्मिता को बेड पर लिटाया और कंबल उढ़ा कर नहाने चले गए। बाहर आए तो स्मिता का चेहरा पीला पड़ चुका था। बहुत दर्द हो रहा है और ख़ून की उल्टियां कर रही हैं। स्मिता डॉक्टर के पास नहीं गईं। वे बच्चे से दूर नहीं जाना चाहती थीं। रोती रहीं और बब्बर और अपनी मां से बहस करती रहीं।
बब्बर के स्मिता को लेकर अस्पताल पहुंचने तक वे कोमा में जा चुकी थीं। ख़बर आग की तरह फ़ैल गई कि स्मिता की हालत बहुत ख़राब है। इंडस्ट्री से जुड़े लोग उन्हें देखने जसलोक अस्पताल आने लगे। एक ही जवाब मिल रहा था, "उनकी हालत स्थिर है।"
स्मिता का ब्लड प्रेशर लो हो गया। स्मिता रेस्पिरेटर पर थीं, डॉक्टर इलाज कर रहे थे। स्मिता के दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया।
दूसरे दिन सुबह ख़बर आई, स्मिता नहीं रहीं। बांद्रा स्थित उनके घर से स्मिता की अंतिम यात्रा निकाली गई। तब स्मिता की मां विद्या पाटिल बेटी की एक फोटो को निहारे जा रही थीं। उन्होंने भरी आंखों के साथ स्मिता को अंतिम विदाई दी और कहा, "मेरी बेटी फाइटर थी। अगर उसके दिमाग ने साथ न छोड़ा होता तो वह हर तरह की लड़ाई लड़ सकती थी। फिर चाहे, वह पर्सनल हो या फिर करियर से जुड़ी।"
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)

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