सीमा पार जासूसी की एक और जांबाज कहानी - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

नवीनतम

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

सीमा पार जासूसी की एक और जांबाज कहानी


फिल्म समीक्षा
रोमियो अकबर वाल्टर (3*)
निर्देशक-रॉबी ग्रेवाल
कलाकार- जॉन अब्राहम, मौनी रॉय, जैकी श्रॉफ, सिकंदर खेर


*रवींद्र त्रिपाठी
यह फिल्म यानी `रोमियो अकबर वाल्टर सन् 2018 में आई `राजी’ (निर्देशक मेघना गुलजार) की तरह की फिल्म है। यानी पाकिस्तान के भीतर जाकर जासूसी करने की। फर्क यही है `राजी की जासूस एक महिला थी और यहां पुरुष। दोनों की पृष्ठभूमि 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध है। पाकिस्तान तब विभाजित नहीं हुआ था और बांग्लादेश नहीं बना था। रोमन लिपि `रोंमियो अकबर वाल्टर का छोटा रूप `रॉ कहलाएगा। रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) भारत की खुफिया एजेंसी रही है और इसने उस युद्ध में भारत की कामयाबी के लिए बड़ा काम किया था।
इस फिल्म में जॉन अब्राहम भारतीय जासूस की भूमिका में है। भारत में एक बैंक में काम करने वाला रोमियो (जॉन) एक बहुरुपिया किस्म का शख्स है। वो कभी शायर हो जाता है तो कभी एक सामान्य नागरिक। वैसे वो एक बैंक में काम करता है और अपनी मां से बहुत प्यार करता है। रॉ की नजर उस पर पड़ती है और उसे पाकिस्तान भेजा जाता है ताकि वहां खुफियागिरी को अंजाम देते हुए जरूरी जानकारियां भारत को दे सके। वो अकबर मलिक बनकर वहां पहुंचता है अपना काम बखूबी करता भी है। लेकिन जैसा कि इस तरह की फिल्मों में होता है, एक दिन उसका राजफाश हो जाता है और पाकिस्तानी सेना उसे पकड़ना चाहती है। अब अकबर क्या करे? कैसे बचे?
कहानी के स्तर पर फिल्म बहुत रोचक है लेकिन जिस तरह इसे फिल्माया गया है उसमे कई जगहों पर ढीलापन है। हालांकि फिल्म का अंत रहस्य से भरा हुआ है लेकिन बीच में कुछ जगहों पर लद्धढ़पन है। जैसे अकबर पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय में अफसर के वेश में कैसे पहुंच जाता है? वो भी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसई के प्रमुख के दफ्तर में! माना कि वो वेष बदलने में माहिर है लेकिन सेना मुख्यालय के गेट पर और रिसेप्शन पर हर किसी की पूछताछ होती है। और अकबर का फोटो हर टीवी चैनल पर चल रहा है लेकिन वो दनादन मुख्यालय में घुस जाता है। मतलब यह वाला हिस्सा अविश्सनीय हो गया है और इसी कारण इसे देखते समय कुछ जगहों पर वो तनाव नहीं पैदा होता जो अच्छी  सस्पेंस या देखते हुए होता है।
बहरहाल जॉन अब्राहम ने एक खुफिया एजेंट की अच्छी भूमिका निभाई है। जहां तक मौनी रॉय के चरित्र का सवाल है वो सिर्फ इसलिए है कि फिल्म में एक हीरोइन होनी चाहिए, वरना वो फिल्म की कोई खास कड़ी नहीं हैं। जैकी श्रॉफ रॉ के प्रमुख बने हैं। फिल्म इस दिशा में संकेत करती है कि देशभक्ति क्या है? यानी उनकी देशभक्ति का क्या जो गुमनाम होकर देश की सेवा करते हैं और अंत तक अनाम ही रह जाते हैं। राजी फिल्म में भी यह मुद्दा था। यह मुद्दा भी फिल्म में आता है कि क्या भारतीय मुसलमान उसी तरह देशभक्त होता है जैसे दूसरे लोग?  या उसकी देशभक्ति पर संदेह किया जाना चाहिए?
*लेखक जाने माने कला और फिल्म समीक्षक हैं।
दिल्ली में निवास। संपर्क – 9873196343

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Bottom Ad