मृणाल सेन : एक वामपंथी चलचित्रकार - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 5 मई 2019

मृणाल सेन : एक वामपंथी चलचित्रकार

 माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग81

मृणाल सेन


मेरे लिए वे नशे के दिन थे। दुनिया भर की एक से बढ़कर एक बढ़िया फ़िल्म देखने के, फ़्रांस की, इटली की, चैकोस्लाविया की, स्वीडन की नई धारा से परिचित होने के...साथ-साथ भारत की अच्छी से अच्छी पुरानी शांताराम की, पी.सी. बरुआ की, सहगल की फ़िल्मों को उनके परिदृश्य में परखने के।
ये वे दिन थे जब माधुरी पत्रिका और कला फ़िल्म परस्पर पर्याय बन गए थे। जब हिंदी की फ़िल्मों में कथ्य और तकनीक के क्षेत्र में कुछ नया करने की एक लहर उमड़ आई थी। कोई इसे कला फ़िल्म आंदोलन, कोई प्रयोगवादी सिनेमा, कोईनया सिनेमा, कोई न्यू वेव और कोई पैरेलल सिनेमा कह रहा था। अंततः माधुरीने दिया इसे समांतर सिनेमा नाम।
ये दिन थे सन् 1969 की मणि कौल की पहली फ़िल्म उसकी रोटी के, आषाढ़ का एक दिन के, दुविधा के, श्याम बेनेगल की अंकुर के, कुमार शाहनी की माया दर्पण के, सत्यु की गर्म हवा के, बिमल रॉय स्कूल के हृषीकेश मुखर्जी के, बासु चटर्जी और भट्टाचार्य के, गुलज़ार के, बाबूराम इशारा के, कांतिलाल राठौर के, सईद अख़्तर मिर्ज़ा के, गोविंद निहलानी के, अरुण कौल के...और कलकत्ता से बंबई आए मृणाल सेन के।
मृणाल सेन से एक दो बार नहीं, बार-बार मिलना होता था, बंबई में मेरे दफ़्तर में, रेस्तराँ में। कलकत्ते जाता तो ब्रेकफ़ास्ट पर वह मेरे होटल आ जाते। कई घंटे बातचीत। जो बात मुझे आकर्षित करती वह यह थी कलकत्ता सिने आकाश में चमकते नक्षत्र मंडल बंगत्रयी (सत्यजीत, मृणाल और ऋत्विक) में से मृणाल का ही स्पष्ट और सुपरिभाषित मार्क्सवादी दृष्टिकोण। इप्टा से संबंधित होने के बावजूद वह कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य कभी नहीं रहे, पर थे।
मृणाल का जन्म 14 मई 1923 को विभाजनपूर्व बंगाल के फ़रीदपुर में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है। स्कूली शिक्षा-दीक्षा वहीं हुई, उच्चतर शिक्षा के लिए स्काटिश चर्च कॉलिज में फ़िज़िक्स में बीए करके कलकत्ता विश्वविद्यालय से एमए किया। वहीँ उनका संपर्क इप्टा से हुआ, परिणामस्वरूप सांस्कृतिक सामाजिक चेतना विकसित हुई। उसी काल में फ़िल्म सुरुचि बोध पर किताब पढ़ी, पर फ़िल्म जगत में प्रवेश का विचार नहीँ आया। काम मिला दवा कंपनी के प्रतिनिधि का जो बहुत नहीं चल पाया। एक बार फिर कलकत्ता। फ़िल्म स्टूडियो में ध्वनि तकनीशियन, और सिने संसार में प्रवेश।
बंबई पहुंचने से पहले वह (लगभग नए) कलाकार उत्तम कुमार के साथ 1955 की असफल-सी रात भोरे बना चुके थे। वहीं तीन साल बाद नील आकाशेर नीचे (नीले गगन के तले) से कुछ नाम बना पाए, बाइशे श्रावण (विवाह दिवस) से कुछ आगे आए। पांच फ़िल्में और बनाईं।
बंबई के उभरते कला सिनेमा क्षेत्र ने उन्हें कौली भर कर अपना लिया। इस धरातल पर बनी भुवन सोम’ – सन् 1969। वितरक बने ताराचंद बड़जात्या जो नई चेतना के उत्साही समर्थक थे और फ़िल्म कैसे जमाई जाती हैकला के माहिर थे। पहले पहले उसे एक सिनेमाघर में सुबह के शो में लगाया गया। फ़िल्म की ताज़गी बंबई को रास आई। अब वह बड़े सिनेमाघरों में लगाई गई।
मृणाल ने लिखा है, “हम सब के लिए भुवन सोम हर कोण से नई थी। मेरी पहली हिंदी फ़िल्म, उत्पल दत्त की पहली हिंदी फ़िल्म, सुहासिनी मुले की पहली फ़िल्म, विजय राघव राव की पहली फ़ीचर फ़िल्म, फ़ीचर फ़िल्म में के.के. महाजन की पहली फ़ोटोग्राफ़ी, और अमिताभ बच्चन की वॉयस ओवर की पहली कमाई – तीन सौ रुपए! फ़िल्म की कुल लागत बस दो लाख – 2,00,000.00 रुपए!”
भुवन सोमकहानी है बड़े बंगाली बाबू भुवन सोम के अफ़सरशाही से निकल कर पूरब से धुर पश्चिम के गुजरात में पक्षी आखेट के बहाने गांव की गोरी गौरी के संपर्क में आ कर ठोस ज़मीनी वास्तविकता से परिचित होने की और बदल जाने की।...
भुवन सोम का एक दृश्य
ट्रेन चल रही है। हम देखते हैं हमारे नीचे पीछे छूटती रेल की पटरियां और स्लीपरों के बीच की रोड़ी। ट्रेन में बैठा है बड़ा बंगाली बाबू रौबीला अफ़सर। मुंह से सिगार छूटता ही नहीँ। पीछे छूटती जा रही हैं रेल की पटरियां। स्टेशन पर चिंता है। बड़ा बाबू बड़ा सख़्त है। बेटे तक को रिश्वत के मामले में बर्ख़ास्त कर दिया था!’ टिकट चेकर जाधव पटेल (साधु मेहर) की इनक्वाइरी होनी है – रिश्वत के लिए। छह महीने बाद उसका गौना है। बड़ा बाबू भुवन सोम (उत्पल दत्त) जीवन में पहली बार मन बहलाव के लिए निकला है। गुजरात में चिड़ियों का शिकार करने। यहां शुरू होता है नया सफ़र...गुजराती गांवगोठ, मैदान, उजाड़...। सुबह चार बजे का अलार्म लगा कर उठता है, शिकार का साज़ सामान थामे – बैलगाड़ी में। कहानी आगे नहीँ बढ़ रही है, बढ़ रहे हैं नए परिवेश में नए अनुभव... हमें बांधे रखते हैं उस के हावभाव, के.के. महाजन के कैमरे से दृश्यावली, भैंसे से बचते भागते भुवन सोम का गन्ने के खेत में घुसना... और फिर षोडशी गौरी का भैंसे पर बैठकर आराम से चले जाना। भुवन बाबू को ठहरना है उसी गौरी के मिट्टी के घर में। वहां टंगा है फ़ोटो – भुवन की निगाह में दुष्ट बेईमान जाधव पटेल का! गौरी के होने वाले पति का! गौरी भुवन सोम को बताती है, कोई दुष्ट बड़ा बाबू जाधव को तंग कर रहा है। वे तो बड़ी ईमानदारी से सवारियों की सेवा करते हैं, मुसाफ़िर उसे चाय पानी के लिए कुछ देते हैं,” गौरी पूछती है, यह अपराध कैसे है?” बड़े बाबू बहुत कुछ देखते हैं, गौरी से बहुत कुछ सीखते हैं। दफ़्तरों की चहारदीवरी के बाहर फैली प्रकृति, उजड़ी हवेली की भूली कहानी, बहुत पहले राजा के रानी के साथ आने के क़िस्से। यह है भुवन बाबू के नज़रिए का टर्निंग पाइंट। अंत तक उनके मस्तिष्क में कौंधती रहती है भैंसे पर सवार गौरी...। जैसे गौरी ने भैंसा साध लिया था, वैसे ही उससे सध जाते हैं बड़े बाबू। अपने दफ़्तर में वापस आए बड़े बाबू पहले वाले कठोर नहीँ हैं। दफ़्तर पहुचते ही वह जाधव को हाज़िर होने का हुक्म देते हैँ। उसकी बर्ख़ास्तगी ​का ऑर्डर फाड़कर तबादला किसी बड़े स्टेशन पर कर देते हैं। जाधव चिट्ठी लिखता है गौरी को, बड़ा स्टेशन बड़ी आमदनी!”


सत्यजित राय ने फ़िल्म का सार सात इंग्लिश शब्दों में यूं किया: Big Bad Bureaucrat Reformed By Rustic Belle! मृणाल सेन के अनुसार फ़िल्म कहानी है सीधे-सादे गांव वालों द्वारा दफ़्तरी माहौल में फंसे बाबू को बुद्धू बहाने की!”
कुछ भी कहो, कैसे भी व्याख्या करो, यह ऐसी हलकी फुलकी फ़िल्म थी जो दर्शकों के दिलों तक पहुंच पाई। ऐसा मृणाल सेन की फ़िल्में बहुत कम कर पाती थीँ – एक मृगया को छोड़ कर। पर मृगया हलकी फुलकी फ़िल्म नहीँ थी। मृगया शुरू करने से पहले मृणाल ने हृषीकेश को तार भेजा, उस काले लड़के से संपर्क करो जो हम ने पुणे के फ़िल्म संस्थान में देखा था। यह लड़का था मिथुन चक्रवर्ती। मृणाल की पारखी नज़र में वह पहली बार ही जम गया था। और कुछ नहीं तो मृगया याद की जाएगी भविष्य के एक सुपर स्टार को प्रकाश में लाने के लिए। जहां तक मेरा सवाल है मैंने इतनी सशक्त फ़िल्में कम ही देखी हैँ।
उड़ीसा की वनसुषमा में संथालों का गांव। लोकगीत, जनजीवन के दृश्य...। अचानक शांति भंग हो जाती है। ख़तरा ! पुकार, आवाज़ें, भारी शोर। कोई शेर आ गया है। शोर है लोगों को चौकस करने का और आदमख़ोर को हकालने का। आदिवासियों के लिए जानवरों से भी ज़्यादा ख़तरनाक़ हैँ पुलिसिया ख़बरची डोरा (साधु मेहर) और लालची सूदख़ोर महाजन गोविंद (सजल राय चौधरी)। नवागत अंगरेज अफ़सर शिकार प्रेमी रौबर्ट ब्राइट को पसंद आ गया है हृष्टपुष्ट नौजवान तीरंदाज़ घिनुवा और उस की पत्नी डूंगरी। अफ़सर की कलाप्रेमी पत्नी डूँगरी की पेंटिंग बनाते दिखाई गई है। एक बार अफ़सर और घिनुआ के बीच समझौता हुआ था कि कभी घिनुआ सब से ख़तरनाक़ जानवर का शिकार कर पाया तो इनाम मिलेगा।
मृगया का एक दृश्य

गांव का बेटा क्रांतिकारी शोल्पु (समित भंज) एक दिन लौट आया। उसे तलाशती पुलिस ने गाँव घेर लिया। पुलिसिया ख़बरची डोरा की मदद से शोल्पु मारा गया। डोरा को इनाम मिला। शोल्पू की मौत से संथालों और ग़ैरसंथालों के बीच तनाव है। ऐसे में सूदख़ोर महाजन गोविंद घिनुआ की पत्नी डूंगरी का अपहरण करवा लेता है। घिनुआ पीछा करता है। गोविंद को मार कर अपना इनाम लेने पहुंचता है। पिंजरे में बंद घिनुआ पर हत्या का केस चल रहा है। वह पूछता है,शोमू अच्छा आदमी था। उसे मरवाने वाले को इनाम मिला। सब से ख़तरनाक़ जानवर गोविंद को मारने पर मुझे इनाम क्योँ नहीँ?” घिनुवा को फांसी की सज़ा मिलती है। गांव वाले जानते हैं उन्हें घिनुआ को मरते नहीँ देखने दिया जाएगा। गांव का प्रधान कहता है,“न देखने दें वे, हम देखेंगे। फांसी सुबह होगी, सूरज के मंच से हम देखेंगे। डूंगरी कहती है वह जानती है सूरज का मंच कहाँ है। सारे गाँव वालों के पहाड़ की कगारों पर खड़े निकलता सूरज देख रहे हैँ।
ऐसी फ़िल्में अब नहीं बनतीं!
मृणाल सेन ने ढेरों वामपंथी फ़िल्म बनाईं। उनमें महत्वपूर्ण थी पदातिक (1973) - साम्यवादी कार्यकर्ता की कहानी। एक दिन मैंने मृणाल दा से कहा, आप मार्क्सवादी हैं, मार्क्सवाद का प्रचार करना चाहते हैं। ऐसी फ़िल्म से क्या लाभ जिसे आम आदमी ने देखे?” उन्होंने कहा,“मैं डिबेट कर रहा हूं। उनका उद्देश्य था मरते नक्सलाइट आंदोलन के संदर्भ में नवयुवा साम्यवादियों के मन में प्रश्न उठाना।


मृणाल सेन की अंतिम फ़िल्म थी 2002 की आमार भुवन (हमारा संसार)। बंगाल में छोटा सा गांव। समाज में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा से चिंतित बनी आमार भुवन का केंद्र है प्रेम। मेहर (कौशिक सेन), नूर (शाश्वत चटर्जी) और सक़ीना (नंदिता दास) की कहानी। नूर ने सक़ीना से शादी कर ली। जल्दी उसे छोड़ दिया। गल्फ़ देशों में पैसा कमाया, नई शादी रचाई और अब लौट आया। मेहर और सक़ीना के तीन बच्चे हैं। जैसे तैसे सक़ीना गृहस्थी चला रही है। नूर ने रिश्तेदार मेहर को हुनर के बल पर काम में रख लिया। उसकी भी अच्छी आमदनी होने लगी। मैंने यह देखी नहीँ है। एक समीक्षक ने लिखा है: “शायद मृणाल सेन ही एकमात्र निर्देशक हैं जिसने दलित लोगों के जीवन में ऐसा प्रेममय तानाबाना बुना है। एक अच्छी सीक्वेंस है दो शॉटों में अंधकार से उभरतीं प्रभात की किरणें। और वह दृश्य जिसमें सूदख़ोर से भागता मेहर, या फिर अपने बस से बाहर क़ीमती रेडियो ख़रीदना – सक़ीना और बच्चों के मनोरंजन के लिए। कई दृश्यों में नंदिता दास वातावरण के बीच कुछ ज़्यादा ही सौफ़िस्टिकेटिड लगती है।
सन 2018 की 30 दिसंबर को कलकत्ते मे भवानीपुर अपने घर बुढ़ापे से संबंधित बीमारियों से वह हम से बिछड़ गए।
उन्होंने सत्ताइस फ़िल्म बनाईं, अवार्ड इतने मिले कि नए अवार्ड बेमतलब से लगने लगे होंगे।
क्लैप देते हुये मृणाल सेन...

सिनेवार्ता जारी है...

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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com

(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लसके लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 

संपादक - पिक्चर प्लस)

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