अगर सुरेश न मिलते तो सत्यजीत रे शतरंज के खिलाड़ी शायद ही बना पाते ! - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 16 जून 2019

अगर सुरेश न मिलते तो सत्यजीत रे शतरंज के खिलाड़ी शायद ही बना पाते !


माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–87

'शतरंज के खिलाड़ी' फिल्म का एक दृश्य 

सुंदरनगर, दिल्ली। लगभग सन् 1978-1980. सुरेश ने मुझे एक छोटी सी किताब पढ़ने को दी – ब्राज़ील के पत्रकार-लेखक-कवि पाउलो कोहेल्हो के पुर्तगाली उपन्यास का इंग्लिश अनुवाद द अल्कैमिस्ट(कीमियागर - The Alchemist)
ब्राज़ील के एंदालूशियाई गड़रिए सांतियागो को गड़े ख़ज़ाने का सपना आता रहता था। भाग्य बताने वाली ने कहा,दूर समंदर पार मिस्र के पिरामिडों में मिलेगा तेरा ख़ज़ाना! वह निकल पड़ा धनाढ्य भविष्य की खोज में। रास्ते में सेलम के राजा मेल्चिज़ेदेक (धर्मराज) ने कहा, मिस्र जाने के लिए अपनी भेड़ बकरी बेच दे। साथ ही दिया संदेश, कर वही जो कहे दिल! उसने वही किया। समय बीता। अफ़्रीकी रेगिस्तान में कारवां में मिला एक इंग्लिस्तानी। उसने समझाए उसे कीमियागरी के रहस्य। इंग्लिस्तानी का कहा कुछ वैसा ही था राजा मेल्चिज़ेदेक ने कहा था: करो दिल की। हम सब में निवास करती है एक विशाल विश्वात्मा! इंग्लिस्तानी को ज्ञान किताबों से मिला था। सांतियागो आप भोगकर पाना चाहता था। आख़िर वे पहुंचे कीमियागर के घर अल्फ़ौयूम नख़लिस्तान। वहां उसे मिली अरब बाला - फ़ातिमा। मन में जागा प्रेम – यह वही था जो विशाल विश्वात्मा था। फ़ातिमा ने कहा, सपना पूरा कर, मैं मिलूंगी। वह बढ़ चला आगे। वहां अंतर्बोध ​हुआ - लड़ाई होने वाली है! लौट आया अपने नख़लिस्तान। बुज़र्गों को बताया –लड़ाई होने वाली है!’ बात पक्की निकली तो लोगों ने उसे परामर्शदाता बनाना चाहा। वह वहीं फ़ातिमा के साथ बस जाने की बात सोचने लगा। कीमियागर ने कहा, चल, मेरे साथ ख़ज़ाने तक! वह चल पड़ा। कीमियागर ने कहा, कर वही जो कहे तेरा दिल! दिल बड़ा फ़रेबी है। उस का कहा बड़े ग़ौर से समझना चाहिए। वे पिरामिडों तक पहुंचे ही थे कि दोनों को लड़ाका क़बायलियों ने पकड़ लिया। कीमियागर ने उनसे कहा,यह लड़का सांतियागो बड़ा जादूगर है। जब चाहे तूफ़ान बन सकता है! क़बायली राज़ी हो गए। बोले, तुम्हारी जान बख़्श दी जाएगी – बस,लड़का करिश्मा कर दिखाए! सांतियागो क्या करे? बेचारा तीन दिन तक समाधि लगाए रहा। विश्वात्मा को जगाता रहा। पहले पूछा नख़लिस्तान से, फिर वायु से, फिर सूरज से और अंत में विश्वात्मा से। अचानक बवंडर उठा। सांतियागो पड़ाव के एक छोर सेउड़ा तो दूसरे पर दिखाई दिया। कीमियागर अपनी राह चला गया, सांतियागो पिरामिडों तक जा पहुंचा, लेकिन लुटेरों के हाथ पड़ गया। एक लुटेरा बोला, यहां क्यों आया है रे तू! एक बार मुझे भी यही सपना आया था पर मेरा ख़ज़ाना तो बहुत पीछे स्पेन में गड़ा था! समझ गया सांतियागो भी कि उस का ख़ज़ाना भी उसी पेड़ के नीचे है, जहां सपना आया था। समय बीता, उसी पेड़ के नीचे सांतियागो गड्ढा खोद रहा है। सचमुच सोने से भरा संदूक़ है वहां! अब वह और फ़ातिमा बड़े आराम से ज़िंदगी बसर कर सकते हैं। लेकिन उदासी ने सांतियागो को घेर लिया। बाद में समझ में आया कि सच्चा प्रेम कभी मरता नहीं, न ही किसी को इस की भेंट चढ़ा देनी चाहिए अपनी तक़दीर।
मेरी राय में सुरेश अपनी तरह का एक सांतियागो ही है...सच माने में कीमियागर है, विश्वात्मा में समाया है।
सत्यजीत रे और सुरेश जिंदल उन दिनों

सुरेश की अपनी ज़ुबानी –

मैं पला तो दिल्ली में था, पर जन्मा था सन् 1942 में पंजाब में। सिख इतिहास के महत्वपूर्ण शहर मलेर कोटला में। पूरे पंजाब में अधिकांश मुस्लिम आबादी वाला शहर। अभिनेता सईद ज़ाफ़री के पिता वहां के नवाब के दीवान थे। नज़दीक कहीं धर्मेंद्र ट्यूबवैल कंपनी में काम करता था। जिन दिनों मैं अमेरीका के UCLA विश्वविद्यालय से ऐरोस्पेस ऐंड इलेक्ट्रोनिक्स की पढ़ाई कर रहा था, मेरा एक रूम मेट वहां के फ़िल्म स्कूल का छात्र था। वहीं भविष्य का मशहूर फ़िल्मकार फ़्रांसिस फ़ोर्ड उस का सहपाठी था। उन्हीं दिनों कैलिफ़ोर्निया में हिप्पी बीटनिक उभर रहे थे। उन्होंने सांता मोनिका बौलीवार्ड में दुकानें खोलीं और उनके सामने कुर्सियां बिछा कर एक से एक बढ़िया कला फ़िल्म दिखाना शुरू किया– फ़ेलिनी, कुरोसावा और बर्गमैन जैसों की फ़िल्में। वहीं मैंने देखी सन् 1958 की सत्यजित राय की चौथी फ़िल्म जलसाघर। 1974 में सत्यजित राय ने पुणे के फ़िल्म संस्थान में जो भाषण दिया वह रोमांचक था। मैं उनका दीवाना अमेरीका में ही हो चुका था।
अमेरीका से लौटा तो पहले तो घर वालों के कहने पर इलेक्ट्रोनिक्स का काम शुरू किया था। लोग मरम्मत के लिए रेडियो लाने लगे! मेरा मन हाहाकार कर उठा!
तभी बेचैन सुरेश ने बंबई में उभरते कला फ़िल्म आंदोलन के बारे में पढ़ा। पढ़ा कि फ़िल्म फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन ने मणि कौल की उस की रोटी और मृणाल सेन की भुवन शोम को वित्त दिया है। बासु चटर्जी की पिया का घर के बारे में पढ़ा। तीस साल का सुरेश सीधे बासु के पास जा धमका और बोला,आप को मेरी फ़िल्म बनानी है, कहानी बताइए। बासु ने बताईं चार, सुरेश ने पसंद की मन्नु भंडारी की यही सच है जो रजनीगंधा नाम से सफल सिद्ध हुई। इतने मात्र से आप को अंदाज़ा हो जाएगा सुरेश की सुरुचि का, और अपनी पसंद के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहने के हौसले का। रजनीगंधा के बारे में मैं पिछली क़िस्त में विस्तार से लिख चुका हूं। अतः अब सुरेश की और सत्यजित राय की बात करूंगा।

उससे मेरी पहली मुलाक़ात इसी समय (लगभग 1971-72) हुई थी और 1978 में मेरे दिल्ली लौट आने के बाद धनी लोगों की कालोनी सुंदरनगर में भी कई बार होती रही। वहां वह अपने बड़े भाई रमेश जिंदल के साथ रहता था। दोनों के ऊपर नीचे के दो अलग फ़्लोर थे। मैं समांतर कोश में जुटा था, सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट का संपादन भी किया पांच साल, शब्दों को कंप्यूटरित करवाने में कई महीने अलस्सुबह से देर रात लगा रहा, उसे अंतिम रूप दिलवाने बेटे सुमीत के पास बंगलौर चला गया। हमारा संपर्क टूटा तो आज तक टूटा है। उसके बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की तो पता चला कि इसी साल (2019) की जनवरी में हैदराबाद के लिटरेचर फ़ैस्टिवल में वह कई सत्रों का संचालक था और ऐसा दिखता था। यह भी पता चला है कि बौद्ध हो गया है। उस का बौद्ध अध्ययन केंद्र है ख्येन्त्से फ़ाउनडेशन।
-एक बार फिर मैं आप को सन् 1971-72 ले चलता हूं– बंबई। रजनीगंधा की शूटिंग होते होते सुरेश का सारा पैसा ख़त्म हो गया। वह लगा रहा, लगा रहा, पैसे जुटाने में। थकना हारना सीखा ही नहीं था। सन् 1974 में फ़िल्म परदे पर आई। बासु की रुकी गाड़ी फिर चल पड़ी अगली फ़िल्मों की ओर, और पैसा बरसा तो बरसता रहा सुरेश पर। वह नए ऐडवैंचरों की तलाश में निकल पड़ा। और एक दिन – उसने ख़ुशख़बरी दी - सत्यजित राय तैयार हो गए हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर हिंदी फ़िल्म का निर्देशन करने के लिए। मैं उछल पड़ा, खड़ा होकर उससे हाथ मिलाया, कहा, आज ही माधुरी में स्कूप छाप देता हूं। लेकिन सुरेश ने रोक दिया, अभी समाचार छापना ठीक नहीं रहेगा। काफ़ी कुछ करना बाक़ी है। सब ठीक होने पर स्वयं पहले आप को बताऊंगा! पर ऐसा हो नहीँ पाया। सत्यजित राय के स्रोत से घोषणा कर दी गई। सुरेश मिला तो गिला शिकवा करना बेकार था –बात उसके वश से बाहर थी। फ़िल्म बनते बनते सन 1977 आ गया। मुझे बस इतना संतोष रहा कि अक्तूबर 1977 के एक अंक में सत्यजित और मुंशी प्रेमचंद से माधुरी का कवर पेज सुशोभित कर पाया।
पर यह संभव कैसे हुआ – इसका नाटकीय ब्योरा सुरेश ने इस तरह दिया है : -
लेखक इंदरराज आनंद का बेटा निर्माता टिन्नू मेरा दोस्त था। पांच साल तक वह सत्यजित का सहायक भी रह चुका था। मेरी रजनीगंधा अप्रत्याशित रूप से सफल हुई तो हौसला बढ़ गया था। मेरे मन में था कि सत्यजित से फ़िल्म बनवाऊं। जानता था कि वे उद्योग के कई बड़े महारथियों को इनकार कर चुके थे। टिन्नू ने पूछा, फ़िल्म हिंदी की या इंग्लिश की? मैंने कहा, टिन्नू, किसी भी भाषा की! बंगाली की भी चलेगी! तत्काल हमने कलकत्ता टेलिफ़ोन काल बुक की। (उन दिनों सीधे अंतर्नगरीयफ़ोन करने की सुविधा थी ही नहीँ।) लगा कॉल मिलने में अनंत समय बीता जा रहा है। कॉल मिली! टिन्नू बंगला में उनसे बात किए जा रहा था। मैं उसके चेहरे के हावभाव ताक रहा था। काल पूरी हुई, वे मिलेंगे हमसे? मैंने पूछा। वह बोला, हां, वे कह रहे हैं, आओ, मिल लो, बात करते हैं!
कलकत्ता - सुबह हम मिले। मेरे लिए अपने पर क़ाबू करना मुश्किल हो रहा था, उत्तेजना में मैं जो मुंह में आया एकमुश्त बोल गया, सर, आप मेरे लिए हिंदी फ़िल्म करें, क्योंकि मैं हिंदी में फ़िल्म बनाता हूं, न हो तो इंग्लिश या फिर बंगला... मैं पूरी तरह तनाव में था। समझ नहीं पा रहा था - हो क्या रहा है! मन ही मन मैं अपने को कोसने लगा, सुरेश, तू ने तो सारा गुड़ गोबर कर डाला! जल्दी से भाग या ज़मीन में गड़ जा! मर ही जा! इतना बड़ा मौक़ा गंवा दिया!’
तभी उनका मंद्र खड़ज स्वर सुनाई दिया। मानों - हज़रत मूसा गुरु गंभीर वाणी में टैन कमांडमेंट सुना रहे हों। वे कह रहे थे, मैं स्वयं हिंदी फ़िल्म बनाना चाह रहा था। वास्तव में वे प्रेमचंद जी की कहानी शतरंज के खिलाड़ी पर फ़िल्म बनाना चाह रहे थे। हाल ही में उन्होंने इसका इंग्लिश अनुवाद पढ़ा था। उन्होंने चेताया, लेकिन यह बहुत महंगी होगी। हो सकता है तुम मुझ पर इतना पैसा न लगाना चाहो। तब हम कोई कम ख़र्चीला विषय चुन सकते हैँ।
मैं भी शशपंज में था। इतना पैसा क्या अपने को बेच कर लाऊंगा!
रिचर्ड एटनबरो, सत्यजीत रे और सुरेश जिंदल
सचमुच यह सत्यजित की सब से महंगी फ़िल्म निकली। उन्नीसवीं सदी का शानदार लखनऊ साकार करना था। नवाब वाजिद अली की शहनशाहियत, बुलंद शख़्सियत, उनके दरबारी, ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सर, कमांडर, तेज़ी से बदलता इतिहास, फौज़ फ़र्राटा, हमला, लड़ाई, नवाब की नगरी नखलऊ (तब लोग लखनऊ को नखलऊ भी कहते थे) का उजड़ना, हम छोड़ चले लखनऊ नगरी गीत, महंगे फ़िल्म सैट, वेशभूषा, ज़ेवरात। महंगी फ़िल्म के लिए कलाकार भी महंगे चाहिए थे, तब दर्शकों में उसका आकर्षण बढ़ जाएगा। सत्यजित राय तथा सभी कलाकारों ने न्यूनतम मेहनताना लिया।
सत्यजित क़द के लंबे थे। आवाज़ गहरी थी। स्वभाव शर्मीला था, प्रसन्नचित थे। कलाकार उनकी पूजा करते थे। कोई शॉट हो जाने पर पूछते, दादा ठीक हो गया ना?’ दादा कैमरामैन और ध्वनि तकनीशियनों से पूछते। फिर कभी कलाकार से कहते, मेरे लिए एक शॉट और दोगे?’ कलाकार ख़ुशी ख़ुशी नया शॉट देते।
लोलिता और नॉर्थ बाई नॉर्थवेस्टजैसी फ़िल्मों से प्रसिद्ध जेम्म मेसन उनके साथ काम करने को उतावला था। जनरल आउटरम वाली भूमिका के लिए हम लोग रिचर्ड एटनबरो से मिले। वह अपनी फ़िल्म ए ब्रिज टू फ़ार का संपादन कर रहे थे। राय ने कहा, पहले ही जान लो, यह कोई बड़ा रोल नहीं है! इस पर एटनबरो बोला, सत्यजित, तुम्हारे लिए तो मैं पूरी टेलिफ़ोन डायरेक्टरी भी पढ़ लूंगा! (इंग्लिश मुहावरा: भारी से भारी काम करने को तैयार)। तब मैं समझा कलाकार क्या चीज़ होता है! एटनबरो ने राय के साथ काम करने के लिए अपना संपादन डेढ़ हफ़्तों के लिए बंद कर दिया!

अरविंद कुमार
फ़िल्म निर्माण बड़ी गहन प्रक्रिया है। अनेक प्रतिभाओं के विभिन्न पृष्ठभूमि से आए दो सौ लोग एक उद्देश्य से – कुछ बनाने को – साथ साथ काम कर रहे होते हैं। कोई ऐसी फ़िल्म नहीं है जिसमें निर्माता और निर्देशक में झगड़ा न हुआ हो। यह फ़िल्म निर्माण का अंग है। हॉलीवुड के मुक़ाबले में हिंदुस्तान में निर्माता की हस्ती लतख़ोरे के अधिक कुछ नहीं है। वह अव्वल दर्ज़े का अहमक़ ही नहीं गुंडा भी समझा जाता है। हीनतम प्राणी। हमारी टीम में कुछ लोग थे जो सत्यजित और मेरे बीच दीवार खड़ी करना चाहते थे। मैं कुल तैंतीस साल का था। आज इतना समय बीत जाने के मैं वह सब अलग तरह से देख पा रहा हूं। जो भी हो हम ने सब समस्याएं सुलझा लीं। शतरंज के बाद हम लोग महाश्वेता देवी की कहानी बीज पर काम करना चाहते थे। पर... घरे बाहरे बनने के दौरान उन पर दिल का दौरा पड़ गया। डाक्टरों ने उन के कलकत्ता से बाहर जाने पर रोक लगा दी। उस के बाद उन की सभी फ़िल्मों की शूटिंग कलकत्ते में ही हुई। बीज के लिए काफ़ी यात्रा करनी पड़ती।

सुरेश जिंदल बाद के दिनों में

अंत में कुछ जानकारी संक्षेप में:
-रिचर्ड ऐटनबरो की 1982 की क्लासिक फ़िल्म गांधी का सुरेश ऐसोसिएट निर्माता था। उस पर मैं एक स्वतंत्र क़िस्त लिखूंगा।
-सुरेश ने सई परांजपे की 1983 की मेरी बहुत पसंद फ़िल्म कथा का निर्माण भी किया था। सई और कथा को भी एक अलग क़िस्त चाहिए।
- मणि कौल की1999 फ़िल्म नौकर की कमीज़ का निर्माता सुरेश था। मणि पर एक क़िस्त लिखूंगा मैं कभी।
-2013 की रिनपोचे की बंगला फ़िल्म वर का संचालक निर्माता था सुरेश।
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अगली क़िस्त शतरंज के खिलाड़ी– लंबी सचित्र समीक्षा।
 सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)    

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