सारा आकाश में रजनीगंधा को जीनियस वासु दा ही महका सकते थे... - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 9 जून 2019

सारा आकाश में रजनीगंधा को जीनियस वासु दा ही महका सकते थे...

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–86

साहित्य और सिनेमा का एक और बेमिसाल संगम 

पिछले भाग में मैंने लिखा था -
[यह कहानी हैसमांतर सिनेमा के दो महारथी बासुओं में से पहले भट्टाचार्य की। दोनों बासु एक दूसरे से बिल्कुल अलग थे। दोनों का फ़िल्मी कैरियर शुरू हुआ तीसरी क़सम से जिसमें पहले बासु का सहायक था दूसरा बासु। भट्टाचार्य का जन्म हुआ कलकत्ते के पास कासिम बाज़ार में (सन 1934), तो चटर्जी का जन्म हुआ राजस्थान के अजमेर में (सन् 1930), उम्र के लिहाज़ से भट्टाचार्य चार साल छोटा था, पर मैंने बड़ा कहा इसलिए कि तीसरी क़सम में भट्टाचार्य निर्देशक था, जबकि चटर्जी उसका सहायक था (यह और बात है कि जब भट्टाचार्य ने तीसरी क़सम की शूटिंग पर आना बंद कर दिया तो फ़िल्म का काम संभालते थे चटर्जी या फिर बाबूराम इशारा)। भट्टाचार्य बातें बहुत करता था, बड़ी बड़ी ऊंची ऊंची बातें करता था। चटर्जी बस उतना बोलता था, जितना ज़रूरी हो। भट्टाचार्य की फ़िल्में शोई (showy) होती थीं और दांपत्य जीवन में निष्ठा-अनिष्ठा के पहलुओं का हास्यविहीन आडंबरपूर्ण चित्रण करती थीं, तो चटर्जी की फ़िल्में मध्यम वर्ग में होने वाली सामान्य घटनाओं को लेकर रोचक हास्यपूर्ण चित्रण करती थीं... ]

तीसरी क़समके बाद चटर्जी को गोविंद सरैया की क्लासिक फ़िल्म सरस्वती चंद्र में सहायक निर्देशन का अवसर मिला था। दोनों फ़िल्म अलग तरह की और अलग तरह की अलग मिजाज की क्लासिक साहित्य कृतियों पर आधारित थीं। रिलीज़ होने पर तीसरी क़सम फ़्लॉप हुई पर बाद में क्लासिक मानी जाने लगी, लेकिन सरस्वती चंद्र रिलीज़ होते ही सुपरहिट होने से अभी तक लोकप्रिय है।
फ़िल्म निर्माण-निर्देशन का बासु चटर्जी का तरीक़ा था – सहज, शांत, मधुर और दृढ़ – ठीक बासु के अपने व्यक्तित्व जैसा। कुछ समय उनके सहायक रहे दिनेश शैलेंद्र शंकर ने एक क़िस्सा यूं बयान किया है-
दिल्लगी की शूटिंग के दिनों की बात है। शिफ़्ट सुबह नौ से चार तक थी। गेस्ट ऐपीयरेंस में शत्रुघ्न को आना था। शत्रु आया शाम के चार से कुछ पहले। किसी तरह अपने पर ज़ब्त करने की कोशिश किए थे बासुदा। बड़ी आवभगत से शत्रु का स्वागत किया और बोले, कॉस्ट्यूम पहन आएं। कुछ देर बाद शत्रु आया और बोला, मैं तैयार हूं!” इधर बासुदा और कैमरा निर्देशक मणि कौल में बहस हो रही थी। मणि कह रहा था, आधे घंटे में सूरज ढल जाएगा, तो दिन का यह सीन कैसे पूरा कर लेंगे आप?” निराश से बासु शत्रु को देखते बोले, अब तो पैकअप करना होगा... कल कोशिश करते हैं!!!” यह था निर्देशक का कठोर और सहज संदेश। अगले दिन शत्रु ठीक दस बजे मौजूद था!
आइए अब बासु चटर्जी की दो फ़िल्मों पर चर्चा करते हैं :

सारा आकाश का एक दृश्य
सारा आकाश
बासु चटर्जी की पहली फ़िल्म थी प्रसिद्ध लेखक-संपादक राजेंद्र यादव के उपन्यास के प्रथम भाग पर आधारित सारा आकाशसमांतर सिनेमा आंदोलन की बहुचर्चित कृति। आगरा के पारंपरिक परिवार का सजीव चित्रण।
नायक समर (राकेश पांडे) कॉलेज में पढ़ रहा है, सुभाष बोस जैसे बड़े नेताओं की बातें करता है, सामाजिक क्रांति पर भाषण देता है। ज़बर्दस्ती उसका विवाह करा दिया जाता है मैट्रिक पास प्रभा (मधु चक्रवर्ती) से। नायक को ख़ुश करने के लिए एक महिला कहती है, प्यार की बातें इंग्लिश में करना!” लेकिन समर उससे बात करना ही नहीं चाहता। पहली ही रात कमरे से निकल कर खुली छत पर सोने चला जाता है।
घर वाले उन्हें निकट लाने के लिए सिनेमा देखने या चप्पल ख़रीदवाने साथ साथ भेजते हैं तो निर्देशक यह दिखाना नहीं चूकता कि समर आगे आगे चल रहा है और उसके बहुत पीछे आ रही है प्रभा (उस समय उत्तर भारतीय हिंदीभाषी क्षेत्रों में यह प्रचलन था।) मुझे याद आता है समर की बारात में आगे चल रहे हैं वरदीधारी बैंड वालों का एक शौट – निर्देशक ने कैमरा नीचे कर के उन के नंगे पैर दिखाए थे। अब पचास साल बाद मैं ने सारा आकाश देखी तो नंगे पैरों वाला शॉट नहीं था।
समर और प्रभा के बीच अबोलापन है। यह दूर करने की प्रभा की सारी कोशिशें बेकार जाती हैं। एक दो बार प्रभा को पत्र लिख कर समर अपनी बात कहना चाहता है, पर कह नहीँ पाता। उपेक्षित प्रभा में घरवाले भी खोट निकालने लगते हैँ। धीरे धीरे समर सब देख रहा है। अबोलापन के छह सात महीने बीत जाते हैं। और एक रात प्रभा छत के कोने में रो रही है। सहानुभूति से भरा समर उसे आलिंगन में समेट लेता है।
फ़िल्म की अधिकांश शूटिंग आगरा में राजेंद्र यादव के पुश्तैनी घर में हुई थी। यही कारण है कि सारा आकाशअपने समाज का सजीव चित्रण बन पाई। संवाद यादव के दोस्त कमलेश्वर ने लिखे थे, जो उस समय टाइम्स में सारिका के संपादक थे।

बासु चटर्जी - साहित्य अनुरागी फिल्मकार
लगभग पचास साल बीत जाने पर तटस्थ भाव से एक दो बार फिर देखने के बाद मेरी सुविचारित राय है कि यह बासु चटर्जी की सर्वोत्कृष्ट कृति है - और भी आगे बढ़ कर कहूं तो यह हिंदी सिनेमा की ऑल-टाइम क्लासिकों में से एक है। राजेंद्र यादव की लेखिका पत्नी मन्नु भंडारी की कहानी यही सच है पर आधारित रजनीगंधा बासु चटर्जी की चौथी फ़िल्म थी और निर्माता सुरेश जिंदल की पहली।
मन्नु भंडारी
फ़िल्म के बारे में पढ़ने से पहले पढ़िए उसके बनने की कहानी सुरेश जिंदल के अपने शब्दों में :
पंजाब के संगरूर ज़िले के मलेर कोटला में मेरे परिवार का फ़िल्मों से कोई संबंध नहीं था। मैं अमेरीका से UCLA विश्वविद्यालय से ऐरोस्पेस ऐंड इलेक्ट्रोनिक्स में चार साल का इंजीनियरी कोर्स कर के आया था। घर वाले चाहते थे कोई फ़ैक्टरी चालू करूं। मैंने की भी। लोग सुनते कि मैं इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूं तो अपने रेडियो ले आते मरम्मत के लिए! मैं समझ गया कि यह मेरा काम नहीं है। उन्हीं दिनों कलात्मक फ़िल्मों का निर्माण शुरू हो रहा था। फ़िल्म फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन ने मणि कौल की उस की रोटी और मृणाल सेन की भुवन शोम को वित्त दिया था। तभी मैं ने बासु की पिया का घर के बारे में पढ़ा तो बासु से मिला और कहा, “मैं फ़िल्म बनाना चाहता हूं। मेरे पास कोई कहानी नहीं है। बासु ने मुझे चार संभावित विषयों के कथा सार और पात्र आदि के बारे में बताया। मुझे पसंद आई मन्नु भंडारी की कहानी यही सच है पर आधारित रजनीगंधा। नायिका दीपा दुबिधा में है। सतरह साल की उम्र में एक छात्र से प्रेम करती थी, उसकी झिड़की से नाराज़ हो कर आत्महत्या की कोशिश कर चुकी थी, अब एमए पढ़ रही है और अब वह एक और लड़के को चाहने लगी है। न कोई मिर्च मसाला, न चाशनी में पगा रोमांस। नारी मन की उलझनों की कहानी। वह नहीं जानती किसे चुने। बासु ने बताया, मुझ से पहले इस के लिए तीन निर्माता उसे साइनिंग अमाउंट दे चुके थे, पर लौट कर नहीं आए!’ मैं ने तय कर लिया यही मेरी फ़िल्म होगी! हम लोग शशि कपूर के पास गए। क्या जादुई कलाकार था! उस का सितारा बुलंदी पर था। दिन में एक एक घंटे के हिसाब से कई फ़िल्मों में काम करता था। इनकार करने का उस का अंदाज़ निराला निकला। बोला, मेरी फ़िल्म का हर टैरिटरी के लिए फ़िक्स्ड रेट है। प्लीज़ उस से कम में कहीं मत बेचना!’ हम बैरंग वापस!”
तय हुआ कि नए कलाकारों के साथ फ़िल्म बनाई जाए। विज्ञापन के जवाब में मिली विद्या सिन्हा। अब मुख्य कलाकार की तरह दो हीरो हिंदी फ़िल्म जगत में नए या अल्पज्ञात लेने का सही फ़ैसला लिया गया। जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में प्रशिक्षित चित्रकार अमोल पालेकर बैंक क्लर्क था, रंगमंच पर सक्रिय था और लोकप्रिय भी। दो मराठी फ़िल्म कर चुका था। कुछ ऐसा ही था दिनेश ठाकुर, रंगमंच पर सक्रिय, 1971 में गुलज़ार की पहली फ़िल्ममेरे अपने और बासु भट्टाचार्य की अनुभव में आ चुका था। दोनों ही सूट करते थे। एक लड़की के दो प्रेमी – एक बहिर्मनस्क बातूनी संजय (अमोल), दूसरा अंतर्मनस्क अल्पभाषी नवीन (दिनेश), दोनों के बीच बड़ी बड़ी दीप्त आंखोँ वाली कोमल-मनस्क उलझन में पड़ी अनिश्चयग्रस्त भावुक दीपा (विद्या)।
फ़िल्म शुरू होती है –
हरियाली भरा मैदान पीछे छूटता जा रहा है। ट्रेन में ऊंघती सी दीपा बैठी है, जागती है, खिड़की से झांकती है। ट्रेन भागे जा रही है। ट्रेन ख़ाली है। वह उठती है। दरवाज़े से देखती है। ट्रेन दौड़े जा रही है। कहां जा रही है – पता नहीं। ख़ाली ट्रेन में वह अचकचाती है, घबराती है। चेन खींच कर ट्रेन को रोकना चाहती है। चेन टूटी है। वह दरवाज़े पर जाती है। स्टेशन पर ट्रेन रुकती है। वह उतर जाती है। बियाबान में स्टेशन निर्जन है। ट्रेन चलने लगती है। वह चढ़ना चाहती है। जो ट्रेन ख़ाली थी, उस की खिड़कियां लोगों से भरी हैं। वे उसे देख हंस रहे हैं। कुछ लोग उसे ट्रेन में चढ़ाने को हाथ बढ़ाते हैं। वह चढ़ नहीं पाती। बियाबान में अकेली है। दीपा अपने बिस्तर में है। घबराई सी उठती है। भाभी कहीं जाने की तैयारी कर रही है। दीपा बताती है – कि उस ने एक भयानक सपना देखा है। भाभी कहती है सपने तो तू रोज़ देखती। भाभी के कहीं जाने पर दीपा अकेलेपन की बात करती है। भाभी मज़ाक़ करती है – कोई बात नहीं। संजय जो है। आता ही होगा।
यह जो संजय है, बहुत बोलता है, बोलता है तो बोलता ही रहता है। उस का बोलना है कंपनी में अपने प्रमोशन को ले कर है। इस पर ही दीपा से उस की शादी निर्भर करती है।
और दीपा है सीधी सादी आम लड़की है। शादी उसका सपना है। सादे लेकिन अच्छे कपड़े पहनती है, जब तक शादी न आम लड़की की तरह पढ़ते रहना चाहती है, एमए पास कर के पीएचडी करना चाहती है। भैया भाभी के सामने अपनी अनोखी अदा में संजय उस से शादी वादा कर चुका है। दीपा उस के साथ इधर उधर घूमना चाहती है, काफ़ी पीना चाहती है।
अगले सीन में हम देखते हैं वह बटुआ लाना भूल गया है, पर दीपा तो अच्छे पर्स लटकाए बग़ैर निकलती नहीं। संजय टूटी चप्पल मरम्मत कराता है, मोची को पैसे वह देती है, काफ़ी का पेमैंट भी आज वही करने वाली है। बैरा कुछ खाने को लाने की बात पूछता है, तो संजय कहता है, बस, काफ़ी!”काफ़ी के दो प्याले आ गए हैं। कैमरा बाएं घूमता है। एक मेज़ पर बैठे तीन लड़के इन दोनों को देख रहे हैँ। एक का कहना है,“संजय के बस का तो है नहीं, लड़की ही संबंध चला रही होगी!” तभी चौथा आ जाता है। बात संजय की हो रही थी तो वे उस का ध्यान संजय और दीपा की ओर दिलाते हैं। वह पुकार उठा, संजय!” संजय ने प्याला उठाया और उन के पास आ धमका। बात चल पड़ती है संजय के प्रमोशन की। पहले खड़े खड़े, फिर बैठ कर संजय प्रमोशन की असंभावना, कंपनी में पालिटिक्स की बातें करने लगा, करता रहा, करता रहा। उधर अकेली दीपा झुंझला रही है, संजय को रिमाइंडर भेजने के लिए काफ़ी का एक और प्याला भेजती है। संजय उठता है, पर फिर वही बातें करता रहता है, दीपा पर निगाह पड़ती है। वह पेमैंट कर रही है। दौड़ा दौड़ा उस के पास जाता है। मैं ख़यालों में खो जाता हूँ तो... यूँ रूठा ना करो, एक तुम्हीं तो हो...
तो यह है दीपा और संजय की प्यार भरी जोड़ी।

रजनीगंधा का एक दृश्य
दीपा ने अगली शाम संजय को घर बुलाया। संजय ने हिसाब लगाया, पाँच बजे छुट्टी, आधा घंटा बस में – साढ़े पाँच पक्का पहुँच जाऊँगा!” कमरे में दीपा। रजनीगंधा के फूल लगे हैं गुलदान में। कभी फूलों को देखती है, बैठती है, कुछ पढ़ने की कोशिश करती है, बाल्कनी में खड़ी हो जाती है। वह आता ही होगा। सड़क पर आता नहीं दिखता। कमरे में पढ़ने को पत्रिका उठाती है, रख देती है, बाल्कनी में जाती है, सड़क देखती है। समय बीत रहा है। नौकर काफ़ी के प्याले लाता है, आप ने छह बजे मँगवाए थे। बाद में लाने को कहती है। नीचे वालों का बेटा आता है, आंटी कहानी सुना दो। आज नहीं कल। कमरा, बाल्कनी, कमरा, बाल्कनी... सात बजने को हैं। नीचे गेट पर आटो से संजय उतर रहा है। दीपा कमरे में आ जाती है। संजय आटो में से रजनीगंधा का बुके निकालता है, ज़ीने में रिस्टवाच पीछे कर के साढ़े पाँच बजाता है। रूठी दीपा पढ़ने का नाटक कर रही है, संजय ने फूल सैंटर टेबल पर रखे, सोफ़े के बाएँ हत्थे पर बैठ दीपा के दाहिने कंधे पर हाथ रखा, दूसरे हाथ से दीपा की कोहनी पकड़ी और झुक कर मनाने लगा। गुलदान से पुराने फूल निकाले, नए लगाए और लौट कर दीपा की जाँघों पर सिर रख कर मनाने लगा। सारा ग़ुस्सा भूल दीपा मुस्कराई, ऐसे भोले संजय पर प्यार उमड़ने से अलावा और हो भी क्या सकता था! हम देखते हैं उठंग कर वह दीपा की ठोड़ी तक पहुँच गया है, मुग्ध दीपा प्रसन्न है।
इस के बाद फ़िल्मांकन की चतुराई के अन्य दृश्यों का अधिक वर्णन न करके मैं कथा का विकास करूँगा। मूल कहानी और फ़िल्म में दोनों के संबंध की अनेक परतें हैं। बंबई के कालिज में लैक्चरार की पोस्ट के इंटरव्यू के लिएअकेली जाने से डर रही है। संजय उस का साहस बढ़ाता है। वह जानता है दीपा की सहेली इरा बंबई में है, उसे लेने स्टेशन आ जाएगी और दीपा का पहला प्रेमी नवीन भी तो वहीं है, डरने की क्या बात है।
दिल्ली का स्टेशन। हमेशा की तरह संजय कुछ लेट ही आया, पर समय से आया। दीपा खिड़की के पास वाली सीट पर है, वह प्लेटफ़ार्म पर। फूल लाना नहीँ भूला। अकेले जाते वह डर रही है। हाथ थाम कर वह हिम्मत बढ़ा रहा है, उसे लेने इरा स्टेशन पर आएगी ही, इंटरव्यू में सिफ़ारिश चाहिए होगी, नवीन भी मदद करेगा।
बंबई: इरा का पति लंबे इरा का पति लंबे टूर पर जा रहा है। डाकिया तार लाता है – दीपा आ रही है। इरा उस के लिए तरह तरह का सामान ख़रीद लाती है...
बंबई स्टेशन: दिल्ली की गाड़ी आ गई है। दीपा खिड़की से बाहर इधर उधर देख रही है। किसी को आया न समझ नीचे उतर आती है। नवीन को आता देख चौंक जाती है। उसे ले कर नवीन स्टेशन के बाहर आता है, टैक्सी में बैठा कर ख़ुद बैठ जाता है। इरा किसी दफ़्तर में काम करती है, उस ने नवीन को भेजा है। दीपा पुरानी यादों में खो जाती है – दिल्ली में छात्रों की हड़ताल का नेतृत्व कर रहा नवीन नारे लगा रहा है। दीपा को देख कर उसे भी अपने साथ आंदोलन में शामिल होने को कहता है। वह इनकार करती है। उग्र नवीन उसे दुत्कारता है, संबंध तोड़ देता है। घर पर सतरह साल की दीपा आत्महत्या कर रही है, पर इतनी सी बात पर मरने का इरादा त्याग देती है। नवीन के सारे प्रेमपत्र फाड़ देती है।
टैक्सी में नवीन दूरी पर बैठा है। इरा के फ़्लैट में दीपा को पहुचा कर बाद में आने का वादा कर के चला जाता है। शाम को इरा आती है, दीपा का हार्दिक स्वागत करती है। नवीन आता है। इरा बताती है कि दीपा इंटरव्यू के लिए आई है। कुछ जान पहचान हो तो काम बन जाएगा। नवीन तत्काल टेलिफ़ोन पर किसी से बात करता है। दीपा को भरोसा दिलाता है – काम हो जाएगा। इंटरव्यू में कुछ दिन हैं। नवीन दीपा को बंबई दिखा रहा है, टैक्सी से, बस से। मछलीघर, हैंगिंग गार्डन। ऊपर से दूर नीचे मैरीन ड्राइव। काफ़ी हाउस ले जाता है। हर जगह औपचारिक दूरी बनाए रखता है। दीपा मन ही मन नवीन की दूरी के और संजय की निकटता के दृश्य देखती रहती है। प्रसिद्भ विज्ञापनकर्मी नवीन का मित्रमंडल विशाल है। एक बार उसे ले कर विज्ञापनकर्मियों के डिनर में ले गया। एक मित्र उसे अपनी किसी पार्टी में आने का न्योता देती है, कहती है अपनी गर्लफ़्रैंड को भी ले आना। दीपा का इंटरव्यू सफल रहा। अप्वाइंटमेंट लेटर आ गया। सब ख़ुश हैं। नवीन कहता है-पार्टी तो बनती है!” अगले दिन उसे लेने नवीन आने वाला है। दीपा तैयार हो रही है। याद आता है कि नवीन ने कभी कहा था-नीली साड़ी में तुम अच्छी लगती हो!” अटैची खोल कर वह नीली साड़ी पहनी। टैक्सी में बैठता नवीन बोला-तुम नीली साड़ी में सुंदर लग रही हो। दीपा को लगा उन का पुराना अपनापन लौट आएगा। मन ही मन उस में प्रीत की संभावना जागी।
टैक्सी में दोनों बैठे हैं – एक दूसरे दूसरी तरफ़ की खिड़कियों पर। सीट पर बीच में जो फ़ासला है उस पर दीपा की नीली साड़ी का पल्ला हिल रहा है। नवीन का हाथ पल्ले के पास आता है, दूर जाता है। दोनों के मन में चाहत है। कभी वे बाहर देखते हैं, कभी हम सीट के बीच साड़ी के पल्ले के नज़दीक आने से हिचकिचाता नवीन हाथ देखते हैं, कभी हम बाहर देखता दीपा का अनिश्चित सा चेहरा देखते हैं और सुन रहे हैं मुकेश की आवाज़ में इन दोनों के मन की ऊहापोह का गीत, कई बार यूं भी देखा है, यह जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है/ अनजानी प्यास के पीछे, अनजानी आस के पीछे, मन दौड़ने लगता है/ राहों में, राहों में, जीवन की राहों में, जो मिले वो फूल मुस्कुरा के/ कौन सा फूल चुरा के, रख लूं मन में सजा के/ जानूं ना, जानूं ना, उलझन ये जानूं ना, सुलझाऊं कैसे कुछ समझ न पाऊं/ किस को मीत बनाऊं, किसकी प्रीत भुलाऊं।
पूरी फ़िल्म में ये हैं सब से नाज़ुक पल, चाहत पर, लगन पर - संकोच की हिचक की टोक के पल। संकोच जीत जाता है, निर्णायक पल अनिर्णीत ही बीत जाता है। 
अन्य अनेक भावुक पलों की बात न कर के सीधे बंबई के रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर ले चलता हूं आप को। दिल्ली जाने वाली गाड़ी छूटने वाली है। खिड़की पर बैठी दीपा की बेचैन आंखें किसी इंतज़ार में हैं। भीड़ फांदता, बदहवास नवीन इसी तरफ़ आ रहा है – यही अंतिम पल है जब संकोच का बंधन टूट सकता है। टूट नहीं पा रहा। ट्रेन चलने लगती है। नवीन ट्रेन के साथ भागता है, पीछे छूट रहा है, इधर दीपा हाथ सिहर रहा है।

अरविंद कुमार
दिल्ली: दीपा का कमरा। दीपा आती है। गुलदान में रखे रजनीगंधा के पास जाती है। दीपा पत्र पढ़ रही है। इरा ने लिखा है कि नवीन के अनुसार दीपा को नौकर मिल गई है। मन में बंबई में नवीन के साथ के पल उभर रहे हैं। दीवान पर पसर कर वह नवीन को चिट्ठी लिख रही है। संजय की याद दिलाते रजनीगंधा के फूलों की तरफ़ पैर कर लेती है। नवीन का संक्षिप्त सा भावविहीन पत्र उसे रुला देता है। उस के मन का ऊहापोह समाप्त हो जाता है। उस ने संजय को चुन लिया है।
चिट्ठी लिखने का प्रयास कर रही है। फूल लिए संजय आता है। वह उस से चिपट जाती है। संजय का प्रमोशन हो गया है। पदोन्नति भी हो गई है। अब दीपा को बंबई जाने ज़रूरत नहीं है। दीपा का अनिश्चय समाप्त हो
गया है। अब वह भी बंबई जाना नहीं चाहती। वह तो शुरूआती दृश्यों में ही अपने अनुरागी मन पर संजय का अधिकार मान चुकी थी। उस गीत के बोल थे - रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूं ही जीवन में/जैसे महके प्रीत पिया की मेरे अनुरागी मन में रजनीगंधा…/ हर पल मेरी इन आंखों में बस रहते हैं सपने उनके/ मन कहता है मैं रंगों की /एक प्यार भरी बदली बनकर / बरसूं उनके जीवन में/रजनीगंधा…/अधिकार ये जबसे साजन का हर धड़कन पर माना मैंने/ मैं जबसे उनके साथ बंधी ये भेद तभी जाना मैंने /कितना सुख है बंधन में/ रजनीगंधा…”
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)      

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