आशा पारेख को आमिर खान की ताई कह सकते हैं ? - PICTURE PLUS Film Magazine पिक्चर प्लस फिल्म पत्रिका

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रविवार, 21 जुलाई 2019

आशा पारेख को आमिर खान की ताई कह सकते हैं ?

माधुरी के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से
जीवनीपरक सिनेवार्ता; भाग–92
कल फिर आऊंगी सायोनारा...
मुझे याद है वह शुद्ध निरामिष गुजराती लंच जो आशा पारेख ने मुझे, कुसुम, बेटे सुमित और बेटी मीता को खिलाया था। ऐसा नहीँ है कि वह निरामिष भोजी थी। शूटिंग के लिए अपना खाना घर से लाती थी। उसमें कभी होती फ़्राइड फ़िश तो कभी गोवानी फ़िश करी जो शम्मी कपूर, शशि कपूर और राजेश खन्ना बड़े चाव से खाते थे। मुझे वह शाम भी याद है जब मैं उससे पहली बार मिला। वह शाम थी निर्माता-निर्देशक नासिर हुसैन के घर गैट टुगैदर की। नासिर की देखरेख में वह हंसमुख, चंचल, मस्त लड़की बाल कलाकार से सुपर स्टार बन गई। उससे प्यार किया तो नासिर हुसैन से - जीवन भर प्यार किया और शादी नहीं की – नासिर का घर न टूट जाए। अगर इस अनाम रिश्ते को मानकर कहा जाए तो आशा आज के प्रसिद्ध कलाकार आमिर ख़ान की ताई और अभिनेता इमरान ख़ान की दादी हैं।
2 अक्तूबर 1942 को जन्मी आशा पारेख को फ़िल्मवाले टॉम बॉय और जुबली गर्ल कहते थे। (राजेंद्र कुमार को जुबली कुमार कहा जाता था।) आशा के पिता प्राणलाल पारेख मध्यमवर्गीय गुजराती जैन थे (यही कारण है जैन समाज संबंधी एक साइट पर मुझे आशा पारेख पर मुझे एक पेज पढ़ने को मिला।) मां सुधा पारेख मुसलमान थी। मां-बाप के जीवन की धुरी थी आशा। मां सुधा अंत तक बनी रही आशा के जीवन का संबल। मां गई तो बहुत दिन तक आशा समझ नहीं पाई कि आगे जीवन कैसे कटेगा। मां ने ही बच्ची आशा को डांस क्लास में दाख़िल कराया था।
बच्ची आशा इतना अच्छा नाचने लगी कि मंच प्रस्तुतियों में बुलाई जाने लगी। उन्हीं दिनों बिमल रॉय को बॉम्बे टॉकीज़ वालों ने कलकत्ते से बंबई बुलाया लिया था। किसी स्टेज शो में बिमल रॉय को दस साल की बच्ची आशा बहुत अच्छी लगी और उसे बंबई में अपनी पहली फ़िल्म मां (1952) में ले लिया। लीला चिटणीस मां थी, सह कलाकार थे भारत भूषण, श्यामा, नज़ीर हुसैन, महमूद और बी.एम. व्यास। उसी साल दलसुख पंचोली की फ़िल्म आसमान में नासिर ख़ां, श्यामा, वीना और अनवर के साथ दिखाई दी। इसमें ओ.पी. नैयर पहली बार संगीत निर्देशक बने थे।
दो साल बाद अपनी प्रोडक्शन कंपनी के अधीन बिमल दा ने बच्ची आशा पारेख को बाप बेटी फ़िल्म में पेश किया। सह कलाकार थे नलिनी जयवंत और तबस्सुम। फ़िल्म असफल हुई। आशा ने छोटे मोटे कुछ और रोल किए, उन में से कुछ थे निर्देशक विजय भट्ट के निर्देशन में। उन्हीं के भरोसे विजय भट्ट ने सोलह साल की आशा को गूंज उठी शहनाई (1959) के लिए चुना। शूटिंग हुई भी। पर निराश भट्ट ने फ़तवा पास कर दिया – लड़की में स्टार मैटीरियल नहीँ है!”
एक असफलता जीवन का अंत नहीं होती। उससे आने वाली सफलताओं का रास्ता बंद नहीं होता। यह मैंने स्वयं अपनी ज़िंदगी में भी देखा है। यही आशा के साथ हुआ। लगभग तत्काल फ़िल्मिस्तान के संचालक शशधर मुखर्जी की ओर से तैंतीस साल के नासिर हुसैन के निर्देशन में पंद्रह साल की उषा को शम्मी कपूर के साथ दिल दे के देखो (1959) में हीरोइन बनने का न्योता आ गया। कहानी थी लंदन से पढ़ कर आई नीता (आशा पारेख) और ड्रमर राजा (शम्मी कपूर) की। (फ़िल्म में प्रेमनाथ के छोटे भाई राजेंद्रनाथ को तो ब्रेक मिला ही था, संगीतकार उषा खन्ना की भी यह पहली फ़िल्म थी।)

दिल दे के देखो - शम्मी और आशा 
दिल देके देखो की नायिका नीता लंदन से पढ़ कर आई है, शरारती है, बहुत बड़ी संपत्ति की वारिस है। तीन लड़के उससे शादी करना चाहते हैं। बेहद पेचीदा कहानी को सात आठ वाक्यों में बता पाना मेरे बस का काम नहीं है। बस इतना कहूंगा कि घटनाक्रम के अंत में वह ड्रमर राजा (शम्मी कपूर) को चुनती है।

नासिर हुसैन लिखित डायलॉग कमाल के थे:
1) रूप (फ़िल्म में शम्मी रूप और राजा दोनों था) से नीता कहती है, मुझे अकेला छोड़ दीजिए।रूप कहता है, “एक शर्त पर। नीता, “क्या?” रूप, “मुझे अकेला मत छोड़िएगा।
2) राजा समझाता है, “इश्क और मोहब्बत में वही फ़र्क होता जो दूध की चाय और पावडर की चाय में होता है।
शम्मी कपूर के साथ आशा की तीन फ़िल्म आईं उन में आख़िरी थी 1966 की तीसरी मंज़िल। निर्माता थे वही नासिर हुसैन लेकिन निर्देशक थे विजय आनंद। मर्डर, मिस्टरी, रहस्य, रोमांच, प्रेम, घृणा, गीत, संगीत, अभिनय, निर्देशन कौशल से भरपूर यह फ़िल्म निस्संदेह आशा पारेख, शम्मी कपूर और नासिर हुसैन की सब से अच्छी फ़िल्म है। ...अंधेरी काली रात, मसूरी के पहाड़ों की बलखाती सड़कों के तीखे मोड़ों पर कार चलाती लड़की होटल के सामने रुकती है, भीतर जाती है। कुछ पल बाद- होटल के बाहर पड़ेउस की निर्जीव पड़े शरीर से लहू बह रहा है। तमाशबीनों की भीड़ बढ़ रही है। फ़िल्म की नामावली शुरू होती है। कैमरा ऊपर उठता है। तीसरी मंज़िल पर खिड़की के पीछे अधछिपा है एक शख़्स। यह लड़की कौन है? इस शख़्स से उस का क्या संबंध है

माधुरी के मुख्य पृष्ठ पर आशा पारेख
कई महीनों बाद – मृत लड़की (रूपा) की बहन शोकग्रस्त सुनीता (आशा पारेख) यह पता लगाने निकल पड़ती है कि उस रात हुआ क्या था। मसूरी जाने के लिए वह रेलगाड़ी से देहरादून जा रही है। सफ़र में सुंदर शरारती नौजवान अनिल (शम्मी कपूर) वह सुनीता का दीवाना हो जाता है। उसे पता चलता कि सुनीता उस रॉकी से बदला ले कर रहेगी जिस के कारण बहन ने आत्महत्या की थी। यह जो अनिल है, मंच पर उसी का नाम है रॉकी। रहस्य गहरा जाता है जब हमें पता चलता है कि रूपा अपने आप नहीं मरी थी, उसे मारा गया था। मारने वाला कौन था, कब उस पर से परदा हटेगा, कैसे सुनीता और अनिल एक होंगे – यह बात अंत में पता होना सही होता है, और ऐसा ही होता है।
नासिर हुसैन और विजय आनंद की सभी फ़िल्मों में गीत संगीत का स्तर ऊंचा होता था। तीसरी मंज़िल में आर. डी. बर्मन ने उसे पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया। छहों के छहों गाने 1) ओ मेरे सोना रे सोना, 2) ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली, 3) तुमने मुझे देखा होकर मेहरबान, 4) आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा, 5) मैं इन पे मरता हूं और 6) दीवाना मुझ सा नहीँ एक से बढ़ कर एक थे। मुझे आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा सब से अच्छा लगता है। आशा पारेख के सात स्मरणीय गीत और नृत्यों में से दो तीसरी मंज़िल से ही हैं।
-1. ‘सौ साल पहले मुझे तुम से (जब प्यार किसी से होता है – 1961): लता मंगेशकर, मोहम्म रफ़ी. संगीतकार: शंकर जयकिशन. नासिर हुसैन की अपनी कंपनी की पहली फ़िल्म. मस्त देव आनंद गा रहा है और नई नकोर हिपगर्ल आशा पारेख दिलफ़रेब अदाओं से जवाब दे रही है। एक समालोचक का कहना है, इसकी ऐक्सपायरी डेट भी सौ साल है!”
-2. अआअआ आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा’ (तीसरी मंज़िल): मोहम्मद रफ़ी, आशा भोंसले. संगीकार: आरडी बर्मन. स्टेज पर लड़के लड़कियां नाच रहे हैं। आशा आती है, अपनी सीट पर बैठती है, उधर से शम्मी बुलाता है। आशा मुस्कराती है, इनकार करती है, सहली को आंख मारती है। सहेली शम्मी को नाच के लिए ले आती है। शम्मी मस्त है तो आशा भी कम नहीं है। कौन ऐक्सट्रैस है जो शम्मी के साथ ऐसे नाच में शामिल होना नहीँ चाहेगी।
-3. ‘ओ मेरे सोना रे सोना (तीसरी मंज़िल): मोहम्मद रफ़ी, आशा भोंसले. संगीकार: आरडी बर्मन। पहाड़ी ढलान पर घास पर बैठी सोना जाने से इनकार किए जा रही है, शम्मी को ग़ुस्सा आ रहा है। अचानक आशा उसे खींच लेती है, गाती है, शम्मी समझ नहीं पाता। आरडी ने इसकी कंपोज़ीशन में कमाल कर दिया था।
-4. ‘क्या जानूं सनम होती है क्या ग़म की शाम’– ‘बहारों के सपने (1967): लता मंगेशकर. संगीकार: आरडी बर्मन। राजेश खन्ना को सुपर स्टार बनाने वाली फ़िल्म में पहली बार नासिर हुसैन ले आए संगीत की अपनी भावी जोड़ी मजरूह सुलतानपुरी और आरडी बर्मन। ब्लैक ऐंड वाइट फ़िल्म में यह स्वप्न दृश्य रंगीन था। रहस्यमय वातावरण। गीत क्या है पुकार है। रात के अंधेरे उजाले में पूरा सीक्वैंस। ग़रीब रमैया (राजेश खन्ना) को पुकार रहा है, बुला रहा है यह गीत। रमैया खिंचा आ रहा है - गीता (आशा पारेख) की ओर। फ़िल्म का हर गीत बेहतरीन था, इन में से एक और था ‘आजा पिया तोहे प्यार दूं /गोरी बईया तोपे वार दूं/ किस लिए तू इतना उदास/ सूखे सूखे होंठ/अंखियों मे प्यास किस लिए किस लिए’…
-5. ‘परदे में रहने दो (शिकार 1968). आशा भोंसले. संगीकार: शंकर जयकिशन। अरबी ट्यून पर यह गीत अपने आप में सनसनी बन गया। आत्माराम निर्देशित रहस्य-रोमांच-हत्या से पूर्ण फ़िल्म में किरण (आशा पारेख) का जादुई आकर्षण दर्शकों पर छा गया था। किरण कौन है, क्या है यह अपने आप में बड़ी गुत्थी था। ऐस्टेट का मैनेजर अजय सिंह (धर्मेंद्र) रहस्य से परदा उठा कर ही रहता है।
-6. अच्छा तो हम चलते हैँ’. (‘आन मिलो सजना 1970). लता मंगेशकर किशोर कुमार . संगीकार: लक्ष्मीकांत प्यारेलालआराधना में बूढ़ी औरत की भूमिका करने से आशा पारेख ने इनकार कर दिया था। बाद में वह राजेश के साथ बहारों के सपने में आई, तो राजेश के साथ आन मिलो सजना में भी वह सफल रही थी।
-7. ‘बंगले के पीछे (‘समाधि 1972). लता मंगेशकर. संगीकार: आरडी बर्मन। तीस साल की होने के बावजूद प्रकाश मेहरा निर्मित-निर्देशित समाधि में आशा टॉप पर थी। बंगले के पीछे तेरी बैरी के नीचे कांटा लगा में उस ने जान ही निकाल कर रख दी। इस गीत के ढेरों रीमिक्स होते रहते हैं।

आशा और जॉय - लव इन टोकियो 
-लव इन टोकियो
शचिन भौमिक लिखित प्रमोद चक्रवर्ती निर्मित-निर्देशित मज़ेदार लव इन टोकियो में आया आशा पारेख का मनमोहक पात्र आशा – लव इन शिमला वाले जॉय मुखर्जी के साथ। पूरी तरह फ़ॉर्मूला फ़िल्म होते हुए भी यह हर वर्ग के दर्शक को मोहने में सफल हुई थी। पहली बार किसी हिंदी फ़िल्म की शूटिंग जापान के मनमोहक स्थलों पर शूटिंग की गई थी।
फ़िल्म शुरू होती है महेश (महमूद) से। वह नायक अशोक (जॉय मुखर्जी) का दोस्त है। अनचाही लड़की के साथ होने वाली सगाई से भाग कर अशोक महेश के पीछे बाइक पर सवार होता है। घर: गायत्री देवी (ललिता पवार)। अशोक की सगाई की तैयारियां कर रही हैं। जापान से पत्र आया है – आप का अनाथ पोता चीकुसोन कठिनाई में है, उसे मंगवा लिया जाए। सगाई खटाई में पड़ गई। अशोक को जापान जाना होगा। महेश से बचाने के लिए शीलू (शुभा खोटे) का पिता (धूमल) बेटी के साथ जापान जा रहा है, जहां उसका एक स्टोर है। महेश भी जापान जाना चाहता है। अशोक की सहायता के लिए गायत्री देवी उसे भी जापान भेज देती है।
जापानी मार्शल आर्ट जीजुत्सू का मास्टर चीकुसोन अशोक को मिला तो पर बार बार निकल भागता है। जापान में किसी शोरूम में अशोक ने आशा (आशा पारेख) की नृत्य प्रस्तुति क्या देखी वह दिल खो बैठा। उधर आशा का अंकल (मदन पुरी) दुष्ट प्राण (प्राण) से उसकी शादी इस शर्त पर करा रहा है कि दोनों उसकी जायदाद आधी आधी बांट लेंगे। जापानी मार्शल आर्ट का मास्टर चीकुसोन अशोक को मिला पर बार बार निकल भागता है। 
तमाम तरह की घटनाओं के बाद बंबई में अशोक और आशा की शादी हो जाती है। फ़िल्म की जान हैं आशा के मोहक नृत्य – ख़ासकर लता मंगेशकर की आवाज़ में सायोनारा (अल्विदा)।
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-कटी पतंग (1971)
गुलशन नंदा की कहानी पर आधारित शक्ति सामंत की कटी पतंग’‘लव इन टोकियोसे बिल्कुल उल्टी है। अभागिन माधवी (आशा पारेख) अपने को विधवा बता कर जीवन काट रही है। राजेश खन्ना के साथ यह आशा की दूसरी फ़िल्म थी।
मामाजी अनाथ माधवी की शादी करा रहे हैं। शादी से वह भाग निकली। प्रेमी कैलाश (प्रेम चोपड़ा) के घर पहुंची तो पाया कि वह किसी और की बांहों में मस्त है। घर लौटी, लेकिन ग्लानि से मामाजी आत्महत्या कर चुके थे। शहर छोड़ कर भटक रही आशा को बचपन की सहेली विधवा पूनम अपने बच्चे मुन्ना के साथ मिली। रेल दुर्घटना में मरती मरती पूनम अपना बच्चा मुन्ना उसे सौंप गई। अब माधवी विधवा पूनम बन गई। टैक्सी वाला पूनम को लूट रहा था कि फ़ॉरेस्ट रेंजर कमल (राजेश खन्ना) ने बचा लिया। जल्दी ही उसे पता चला कि मामाजी इसी कमल से उस का ब्याह रचा रहे थे। आगे की कहानी भी गुलशन नंदा की सभी कहानियों की तरह अनेक असंभव संयोगों से भरपूर है, तो आशा पारेख और राजेश खन्ना को अभिनय कौशल दिखाने के अवसरों से भी भरपूर है।
राजेश और आशा - कटी पतंग

-कारवाँ
तीसरी मंज़िल के विपरीत यहां कार बेक़ाबू है। उसे चलाती लड़की सुनीता (आशा पारेख) पहाड़ी रास्तों पर उसे नियंत्रित नहीं कर पा रही। कार एक खड्ड में गिरती है। अब हम पहुंच जाते हैं उस घटना चक्र में जिसकी वज़ह से सुनीता को घर से भागना पड़ा। हुआ यह था कि उसके धनी व्यवसायी मोहनदास (मुराद) को पता चला कि विश्वासपात्र राजन (क्रिशन महता) भारी रक़म का ग़बन करता रहा है। राजन को ललकारा तो वह मोहनदास को मारने पर उतारू हो गया। धकेलता धकेलता उन्हें खिड़की तक ले गया और उलट कर बाहर गिरा दिया। पुलिस ने समझा कि मोहनदास की मौत दुर्घटना मात्र थी। एकमात्र बेटी अब राजन के निशाने पर थी अब मृतक की इकलौती बेटी सुनीता। राजन ने उस से शादी कर ली। जल्दी ही सुनीता की आंखें सुल गईं। वह समझ गई कि शादी तो उस की संपत्ति हड़पने का साधन मात्र है। राजन की असली प्रेमिका तो मोनिका (हेलेन) है। अब राजन ने सुनीता को कमरे में बंद कर दिया। जैसे तैसे वह बच निकली। अब तीखे मोड़ वाले पहाड़ी रास्तों पर गहरी रात में बेक़ाबू कार में है। कार खड्ड में गिरती है।
नीचे सड़क पर एक अजब सी खटारा वैन रुकी है। नाम है तूफ़ान मेल। उस के हर तरफ़ नाचने वालियों के कटआउट लगे हैं। यह वैन है मोहन (जितेंद्र) की। उस के साथ है पियक्कड़ जॉनी (रवींद्र कपूर) और लड़का मोंटो (महमूद जूनियर)। तीनों की मस्त टिकड़ी है। सुनीता वैन में छिप जाती है। धीरे धीरे मोहन से मिलती है और फिर क्या है! जब क़बीले के लोगों से मिली और चाक़ूफेंक निशा (अरुणा ईरानी) ने उस पर निशाना साधा तो.... जितेंद्र और आशा पारेख के नाच तो होने ही थे। उधर राजन को विश्वास था कि सुनीता मरी नहीं है। समस्याएं भी बढ़नी थीं और अंत भी सुखांत होना था।
आशा और नूतन - मैं तुलसी तेरे आंगन की 

मैं तुलसी तेरे आंगन की
राज खोसला ने बनाई 1978 में मैं तुलसी तेरे आंगन की। मान्यता है कि तुलसी का पौधा घर में नहीं आंगन में रखा जाता है। यह प्रतीक है अमान्य सौतन अथवा पति की वेश्या रखैल का जिस का घर में प्रवेश वर्जित होता है। फ़िल्म आधारित थी मराठी लेखक चंद्रकांत काकोडकर के उपन्यास अशी तुझी प्रीत पर। तुलसी नाम की वेश्या (आशा पारेख) को बचाया ठाकुर राजनाथ सिंह चौहान (विजय आनंद) ने। कोठे की संचालिका को बड़ी रक़म दे संतुष्ट कर ठाकुर साहब महल ले आए। दोनों प्रेम में रम गए। ठाकुर साहब की मां उनका विवाह कराना चाहती हैं बड़े घराने की संयुक्ता से। विवाह के लिए ठाकुर को सहमत कराती है तुलसी और अपने आप बाहर वाले आंगन मॆं रहने लगती है।  


वहां चौरा बना कर तुलसी का पौधा लगाती है। ठाकुर साहब उसी में रमे हैँ। वह गर्भवती हो जाती है। साथ साथ पत्नी संयुक्ता को आश्वस्त करती है कि वह ठाकुर साहब को उस के पास भेज कर रहेगी और सफल भी होती है। पुत्र का जन्म होता है। बेटे को लेकर संयुक्ता के पास जाती है वादा करवाती है वह उसे अपने बेटे समान पालेगी। इस के पीछे तुलसी की त्यागमयी योजना थी। उस ने आत्महत्या कर ली। संयुक्ता बाहर के आंगन में लगे तुलसी के पौधे को अपने आंगन में रोप दिया। ठाकुर साहब क्षय रोग से मर गए। अब संयुक्ता के पास दो बेटे हैं – तुलसी का अजय (बड़ा हो कर विनोद खन्ना) और अपना प्रताप (बड़ा हो कर देव मुखर्जी)। अजय घर पर नहीं पला बढ़ा बल्कि होस्टल से लौटा पढ़ाई पूरी कर के। संयुक्ता को वह अपने प्रताप से ज़्यादा प्यारा है। कहानी का मुख्य भाग है अजय को सामाजिक मान्यता दिलाने का संघर्ष।
अरविंद कुमार
हमारे लिए महत्वपूर्ण तत्त्व है तुलसी का आंगन की तुलसी न बने रह कर आत्महत्या कर लेना। फ़िल्म की शूटिंग में आशा को बार बार अपना और नासिर हुसैन का रिश्ता याद आता रहा होगा और यह ख़ुशी होती रही होगी कि उस ने नासिर की दूसरी बीवी ने बन कर अविवाहित रह कर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखा।
सिनेवार्ता जारी है...
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संपर्क-arvind@arvindlexicon.com / pictureplus2016@gmail.com
(नोट : श्री अरविंद कुमार जी की ये शृंखलाबद्ध सिनेवार्ता विशेष तौर पर 'पिक्चर प्लस' के लिए तैयार की गई है। इसके किसी भी भाग को अन्यत्र प्रकाशित करना कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा। 
संपादक - पिक्चर प्लस)      

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